Amazing incident : जानिये हनुमान जी और भगवान श्रीराम के पहली मुलाक़ात की अद्भुत घटना

भगवान राम और हनुमान जी का मिलन न केवल पवित्रता और भक्ति का प्रतीक है,
- बल्कि भगवान और उनके सबसे बड़े भक्त के बीच के अनन्य प्रेम और विश्वास को भी दर्शाता है। उन दोनों की मुलाक़ात सतयुग के विलक्षण क्षणों में से एक है। इस मुलाक़ात के बारे में चौपाई में लिखा गया है कि – “आगें चले बहुरि रघुराया।
रिष्यमूक पर्बत निअराया॥
तहँ रह सचिव सहित सुग्रीवा।
आवत देखि अतुल बल सींवा”॥1॥ - इसका अर्थ है कि ‘श्री रघुनाथ जी आगे चले और ऋष्यमूक पर्वत निकट आ गया, जहां मंत्रियों सहित सुग्रीव रहते हैं। अतुलनीय बल की सीमा श्री रामचंद्रजी और लक्ष्मणजी को आते देखकर सुग्रीव भयभीत हो गए’। असल में, जब माता सीता का हरण रावण द्वारा किया गया, तो भगवान राम और उनके छोटे भाई लक्ष्मण सीता की खोज में वन-वन भटक रहे थे। इस यात्रा में वे ऋष्यमूक पर्वत पर पहुंचे, जहाँ सुग्रीव और उनके वानर साथी शरण लिए हुए थे। सुग्रीव, जो अपने बड़े भाई बाली से डरकर ऋष्यमूक पर्वत पर रह रहे थे, ने राम और लक्ष्मण को वन में देखा।
- उन्हें संदेह हुआ कि ये लोग बाली द्वारा भेजे गए दूत तो नहीं हैं। सुग्रीव ने हनुमान को राम और लक्ष्मण के बारे में जानकारी लाने के लिए भेजा।हनुमान जी का भगवान राम से परिचय
सुग्रीव के कहने पर हनुमान जी ब्राह्मण का वेश धारण करके राम और लक्ष्मण के पास पहुंचे। उन्होंने विनम्रता से भगवान राम से पूछा कि वे कौन हैं और इस वन में क्या कर रहे हैं।

भगवान राम ने अपनी पूरी कथा सुनाई,
- जिसमें सीता का हरण और रावण का अपहरण शामिल था। उन्होंने हनुमान जी से कहा कि –‘कोसलेस दशरथ के जाए, हम पितु वचन मानि वन आए।
नाम राम लछिमन दोऊ भाई, संग नारि सुकुमारि सुहाई’।।
- इसका अर्थ है कि ‘कोशल नरेश दशरथ के हम पुत्र हैं और पिता के वचन को मानकर हम वन में आए हैं। मेरा नाम राम है और ये लक्ष्मण हैं हम दोनों भाई हैं। हमारे साथ एक सुकुमारी स्त्री भी थी’। जब हनुमान ने भगवान राम की बात सुनी, तो उन्हें तुरंत समझ में आ गया कि वे विष्णु के अवतार और उनके आराध्य हैं। उन्होंने भगवान राम के चरणों में गिरकर उनकी सेवा में समर्पण प्रकट किया। भगवान राम ने हनुमान को गले लगाया और उनका आशीर्वाद दिया।
हनुमान जी की भक्ति की शुरुआत
- हनुमान जी भगवान राम और लक्ष्मण को कंधे पर बिठाकर सुग्रीव के पास ले गए। सुग्रीव और राम जी के बीच मित्रता का संधि हुई। सुग्रीव ने सीता की खोज में वानरों की मदद का वचन दिया और भगवान राम ने बाली का वध कर सुग्रीव को किष्किंधा का राजा बनाने का वादा किया। भगवान राम के साथ इस प्रथम मिलन के बाद, हनुमान ने अपना जीवन राम की सेवा और उनके कार्य को पूरा करने के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने माता सीता की खोज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और राम-रावण युद्ध में भी राम का साथ दिया।
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