Died in Bengaluru : पद्मश्री विजेता और पर्यावरणविद् वृक्षमते सालूमरदा थिमक्का का 114 वर्ष की आयु में बेंगलुरु में निधन

सालूमरदा थिमक्का, जिन्हें प्यार से ‘वृक्षमते’ या ‘वृक्षों की माँ’ कहा जाता था, वह नाम है जो भारत में पर्यावरण संरक्षण का पर्याय बन गया। कर्नाटक की इस महान हस्ती ने बिना किसी औपचारिक शिक्षा के केवल अपनी लगन से सैकड़ों पेड़ लगाए और उन्हें अपने बच्चों की तरह पाला। उनका निधन एक युग का अंत है, लेकिन प्रकृति के प्रति उनका अटूट प्रेम और अद्भुत कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य प्रेरणा है।
नही रहीं वृक्षमते सालूमरदा थिमक्का
- प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित सालूमरदा थिमक्का का शुक्रवार को बेंगलुरु के एक निजी अस्पताल में 114 वर्ष की आयु में निधन हो गया। पारिवार के लोगों ने बताया कि वह पिछले कुछ समय से अस्वस्थ थीं और उनका इलाज चल रहा था। थिमक्का का जाना देश के पर्यावरण आंदोलन के लिए एक बड़ी क्षति है। उन्हें विशेष रूप से 385 बरगद के पेड़ लगाने और उनकी देखभाल करने के लिए जाना जाता है, जिससे उन्हें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।
एक साधारण जीवन से असाधारण विरासत
- थिमक्का का जन्म 30 जून, 1911 को कर्नाटक में हुआ था। उन्होंने कोई औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी, लेकिन वह ज़मीनी स्तर पर काम करने वाली पर्यावरण कार्यकर्ताओं की एक मिसाल बन गईं। उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य कर्नाटक के रामनगर जिले में हुलिकल और कुदुर के बीच 4.5 किलोमीटर लंबे रास्ते पर बरगद के पेड़ लगाना था।
- कन्नड़ भाषा में ‘सालूमरदा’ का अर्थ है “वृक्षों की पंक्ति” और यह उपाधि उन्हें उनके अद्भुत काम के लिए लोगों ने प्यार से दी थी। निःसंतान होने के कारण थिमक्का और उनके पति ने इन पेड़ों को ही अपने बच्चों की तरह पालने का फैसला किया। उन्होंने न केवल पेड़ लगाए बल्कि उन्हें बड़ा करने के लिए पानी और सुरक्षा भी प्रदान की। प्रकृति के प्रति उनका यह गहरा जुड़ाव निजी दुःख से उत्पन्न हुआ और एक महान मिशन में बदल गया।

Died in Bengaluru : पद्मश्री विजेता और पर्यावरणविद् वृक्षमते सालूमरदा थिमक्का का 114 वर्ष की आयु में बेंगलुरु में निधन ?
सम्मान और प्रेरणा का स्रोत
- अपने जीवनकाल में थिमक्का को उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए कई बड़े सम्मानों से नवाज़ा गया। इनमें सबसे महत्वपूर्ण 2019 में मिला पद्मश्री पुरस्कार था जो भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कारों में से एक है। इसके अलावा उन्हें 1997 में इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्षमित्र पुरस्कार और 1995 में राष्ट्रीय नागरिक पुरस्कार भी मिला। हम्पी विश्वविद्यालय ने उन्हें 2010 में प्रतिष्ठित नादोजा पुरस्कार से भी सम्मानित किया था। उनके कार्यों ने न केवल स्थानीय लोगों को, बल्कि देश और दुनिया भर की कई पीढ़ियों को पर्यावरण के महत्व को समझने और उसकी रक्षा करने के लिए प्रेरित किया।
नेताओं ने जताया शोक
- थिमक्का के निधन पर देश भर के राजनीतिक नेताओं, पर्यावरणविदों और सार्वजनिक हस्तियों ने गहरा शोक व्यक्त किया है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने उन्हें ‘वृक्षमते’ (वृक्षों की माँ) कहते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा, “सैकड़ों पेड़ लगाने और उन्हें अपने बच्चों की तरह पालने वाली थिमक्का ने अपना अधिकांश जीवन पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित कर दिया। हालांकि आज वह हमें छोड़कर चली गई हैं, लेकिन प्रकृति के प्रति उनके प्रेम ने उन्हें अमर बना दिया है।”
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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