Trapped childhood : बच्चों की डिजिटल दुनिया पर खतरा: एल्गोरिदम, मुनाफ़ा और सुरक्षा के बीच फंसा बचपन

भारत में इंटरनेट और सोशल मीडिया का दायरा जिस तेजी से बढ़ा है, उसी तेजी से बच्चों की ऑनलाइन मौजूदगी भी बढ़ी है। मोबाइल फोन, टैबलेट और सस्ते इंटरनेट ने बच्चों के लिए ज्ञान, मनोरंजन और संवाद के नए रास्ते खोले हैं। लेकिन इसी डिजिटल दुनिया का एक स्याह पक्ष भी है, जो धीरे-धीरे सामने आ रहा है। विशेषज्ञों और हालिया रिपोर्ट्स का कहना है कि बच्चों को सोशल मीडिया पर बढ़ता हुआ सेक्सुअलाइज्ड कंटेंट सिर्फ़ किसी “गलती” या संयोग का नतीजा नहीं है, बल्कि यह कई डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स के एल्गोरिदम की डिज़ाइन से जुड़ी गंभीर समस्या है।
एल्गोरिदम क्या हैं और ये कैसे काम करते हैं
एल्गोरिदम दरअसल वे तकनीकी सिस्टम होते हैं जो यह तय करते हैं कि किसी यूज़र को स्क्रीन पर क्या दिखेगा। आप क्या देखते हैं, कितना समय किसी वीडियो या पोस्ट पर रुकते हैं, क्या लाइक या शेयर करते हैं—इन सबका डेटा एल्गोरिदम इकट्ठा करता है। फिर उसी के आधार पर वह अगला कंटेंट सुझाता है।
समस्या तब शुरू होती है जब यह सिस्टम बच्चों और बड़ों के बीच फर्क नहीं कर पाता या जानबूझकर नहीं करता। विशेषज्ञों का कहना है कि कई प्लेटफ़ॉर्म्स के एल्गोरिदम “एंगेजमेंट” यानी यूज़र को ज्यादा देर तक स्क्रीन से जोड़े रखने को सबसे ऊपर रखते हैं। जो कंटेंट ज्यादा ध्यान खींचता है, वही आगे बढ़ाया जाता है। इसी दौड़ में कई बार बच्चों तक ऐसा कंटेंट पहुंच जाता है, जो उनकी उम्र और मानसिक विकास के लिए बिल्कुल भी उपयुक्त नहीं होता।
बच्चों की जिज्ञासा नहीं, उनकी कमजोरी बन रही है निशाना
बचपन स्वाभाविक जिज्ञासा का समय होता है। बच्चे सवाल पूछते हैं, नई चीजें जानना चाहते हैं। लेकिन जब एल्गोरिदम इस जिज्ञासा को समझने के बजाय “vulnerability” यानी कमजोरी के रूप में देखने लगते हैं, तो खतरा पैदा होता है। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि कुछ प्लेटफ़ॉर्म बच्चों के व्यवहार को इस तरह पढ़ते हैं कि उन्हें धीरे-धीरे ज्यादा उत्तेजक या अनुचित कंटेंट की ओर धकेल दिया जाता है।
रिपोर्ट्स बताती हैं कि एक सामान्य वीडियो या पोस्ट से शुरुआत होती है, लेकिन कुछ ही समय में सुझावों का स्तर बदलने लगता है। यह बदलाव बच्चों के लिए न केवल भ्रम पैदा करता है, बल्कि उनकी सोच, भावनाओं और आत्म-छवि पर भी असर डालता है।
मानसिक सेहत और बचपन पर गहरा असर
बाल मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि कम उम्र में ऐसे कंटेंट के संपर्क में आना बच्चों की मानसिक सेहत के लिए बेहद नुकसानदेह हो सकता है। इससे बच्चों में डर, भ्रम, अपराधबोध या गलत धारणाएं पैदा हो सकती हैं। कई बार बच्चे यह समझ ही नहीं पाते कि जो वे देख रहे हैं, वह वास्तविकता से कितना अलग या भ्रामक है।
इसके अलावा, लगातार स्क्रीन पर ऐसा कंटेंट देखने से बच्चों का ध्यान पढ़ाई, खेल और रचनात्मक गतिविधियों से हट सकता है। उनका आत्मविश्वास, सामाजिक व्यवहार और रिश्तों को समझने का तरीका भी प्रभावित हो सकता है। विशेषज्ञ इसे “डिजिटल बचपन की चोरी” तक कह रहे हैं।

मुनाफ़ा बनाम सुरक्षा
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म बच्चों की सुरक्षा को उतनी प्राथमिकता दे रहे हैं, जितनी उन्हें देनी चाहिए? विशेषज्ञों का आरोप है कि कई कंपनियां मुनाफ़े के लिए सुरक्षा से समझौता कर रही हैं। जितना ज्यादा समय यूज़र प्लेटफ़ॉर्म पर बिताता है, उतना ज्यादा विज्ञापन दिखाए जा सकते हैं—और इससे कमाई बढ़ती है।
इस मॉडल में बच्चों को भी एक “यूज़र” के रूप में देखा जाता है, न कि एक संवेदनशील वर्ग के रूप में। उम्र सत्यापन, कंटेंट फिल्टरिंग और पैरेंटल कंट्रोल जैसे उपाय मौजूद तो हैं, लेकिन अक्सर वे या तो कमजोर होते हैं या ठीक से लागू नहीं किए जाते।
भारत में सख्त गाइडलाइन की कमी
विशेषज्ञों और डिजिटल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि भारत में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर अभी भी ठोस और सख्त कानूनों की कमी है। कुछ नियम और दिशा-निर्देश जरूर हैं, लेकिन वे तेजी से बदलती तकनीक और एल्गोरिदम आधारित सिस्टम के सामने कमजोर पड़ते नजर आते हैं।
जब तक सरकार की ओर से स्पष्ट और कड़े नियम नहीं होंगे, तब तक कंपनियां अपने ही बनाए नियमों के तहत काम करती रहेंगी। रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि एल्गोरिदम कैसे काम करते हैं, यह अक्सर “ब्लैक बॉक्स” बना रहता है—यानि आम लोगों और यहां तक कि सरकार को भी इसकी पूरी जानकारी नहीं होती।
विशेषज्ञों की मांग: मजबूत कानून और जवाबदेही
इस बढ़ते खतरे को देखते हुए विशेषज्ञों ने भारत सरकार से तुरंत कदम उठाने की मांग की है। उनकी प्रमुख मांगों में शामिल हैं:
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बच्चों के लिए बनाए गए कंटेंट और एल्गोरिदम पर सख्त निगरानी
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डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स की जवाबदेही तय करना
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एल्गोरिदम में पारदर्शिता लाना
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उम्र सत्यापन और पैरेंटल कंट्रोल को मजबूत करना
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बच्चों की मानसिक सेहत को ध्यान में रखकर नियम बनाना
विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ तकनीकी या कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी का सवाल भी है।
माता-पिता और समाज की भूमिका
सरकार और कंपनियों के साथ-साथ माता-पिता और समाज की भूमिका भी बेहद अहम है। बच्चों के साथ खुलकर संवाद करना, उनकी ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखना और उन्हें सुरक्षित इंटरनेट उपयोग के बारे में समझाना आज की जरूरत बन गया है। डर या सख्ती के बजाय विश्वास और बातचीत से बच्चों को बेहतर तरीके से सुरक्षित किया जा सकता है।
निष्कर्ष
भारत में बच्चों का डिजिटल भविष्य एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है। सोशल मीडिया और इंटरनेट उनके लिए अवसर भी हैं और खतरे भी। लेकिन जब एल्गोरिदम मुनाफ़े के लिए बच्चों की सुरक्षा से समझौता करने लगें, तब यह सिर्फ तकनीक की समस्या नहीं रह जाती, बल्कि पूरे समाज की चिंता बन जाती है।
जरूरत है कि सरकार, डिजिटल कंपनियां, माता-पिता और विशेषज्ञ—सभी मिलकर ऐसे मजबूत और जिम्मेदार कदम उठाएं, ताकि बच्चों का बचपन स्क्रीन के पीछे नहीं, बल्कि सुरक्षित, स्वस्थ और सम्मानजनक माहौल में आगे बढ़ सके।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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