Conference on ‘Good Governance’ : मुख्यमंत्री योगी जी ने दोनों डिप्टी CM के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ‘सुशासन’ का ढोल पीटा ?

Conference on ‘Good Governance’ : मुख्यमंत्री योगी जी ने दोनों डिप्टी CM के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ‘सुशासन’ का ढोल पीटा

Conference on 'Good Governance' : मुख्यमंत्री योगी जी ने दोनों डिप्टी CM के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ‘सुशासन’ का ढोल पीटा ?
Conference on ‘Good Governance’ : मुख्यमंत्री योगी जी ने दोनों डिप्टी CM के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ‘सुशासन’ का ढोल पीटा ?

कोडीन कफ सिरप कांड और सत्ता के गलियारों में दिखती तस्वीरें

  • उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा दोनों उपमुख्यमंत्रियों के साथ की गई हालिया प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक बार फिर ‘सुशासन’ के दावों को प्रमुखता से रखा गया। सरकार ने कानून-व्यवस्था, अपराध नियंत्रण और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती की बात दोहराई। लेकिन इसी बीच कोडीन कफ सिरप कांड से जुड़े एक आरोपी विभोर राणा की तस्वीरें जब सार्वजनिक हुईं, जिनमें वह सत्तारूढ़ दल के वरिष्ठ नेताओं के साथ दिखाई देता है, तो राजनीतिक और सामाजिक हलकों में कई असहज सवाल खड़े हो गए।
  • यह सवाल केवल किसी एक व्यक्ति या पार्टी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि व्यवस्था, जवाबदेही और सत्ता के साथ अपराध के संभावित गठजोड़ पर भी हैं।

कोडीन कफ सिरप कांड: मामला क्या है?

  • कोडीन युक्त कफ सिरप का अवैध कारोबार लंबे समय से देश के कई हिस्सों में एक गंभीर समस्या रहा है। स्वास्थ्य से जुड़े इस उत्पाद का नशे के रूप में दुरुपयोग, युवाओं और सीमावर्ती क्षेत्रों में सामाजिक संकट पैदा करता रहा है। जांच एजेंसियों के अनुसार, इस तरह के मामलों में अक्सर संगठित नेटवर्क काम करते हैं, जिनकी जड़ें कई राज्यों और कभी-कभी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं तक फैली होती हैं।
  • प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा इस कांड से जुड़े मामलों में करीब 200 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त किए जाने की खबरें सामने आ चुकी हैं। साथ ही, जांच में नेटवर्क के तार बांग्लादेश तक फैले होने की बात भी कही जा रही है। ये तथ्य अपने आप में इस बात की गंभीरता को दर्शाते हैं कि मामला केवल छोटे स्तर की तस्करी का नहीं, बल्कि एक संगठित और बड़े पैमाने के नेटवर्क का है।

तस्वीरें और सवाल

  • विवाद तब और गहरा गया जब गिरफ्तार आरोपी विभोर राणा की तस्वीरें सार्वजनिक हुईं, जिनमें वह भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं के साथ दिखाई देता है। इनमें राष्ट्रीय स्तर के पदाधिकारियों और प्रदेश सरकार के एक उपमुख्यमंत्री के साथ ली गई तस्वीरों का भी उल्लेख किया जा रहा है।
  • यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी के साथ तस्वीर होना अपने आप में अपराध का प्रमाण नहीं होता। राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन में अनेक लोग विभिन्न कार्यक्रमों, आयोजनों और मुलाकातों में तस्वीरें खिंचवाते हैं। लेकिन जब वही व्यक्ति बाद में एक बड़े आपराधिक और आर्थिक अपराध के मामले में गिरफ्तार होता है, तब सवाल उठना स्वाभाविक है।

जनता यह जानना चाहती है कि:

  • क्या इस नेटवर्क को किसी प्रकार का राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था?
  • यदि नहीं, तो इतने बड़े पैमाने पर अवैध कारोबार कैसे फलता-फूलता रहा?
  • क्या स्थानीय प्रशासन और नियामक एजेंसियों की आंखें बंद थीं, या फिर उन्हें बंद कर दी गई थीं?
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‘सुशासन’ और जमीनी हकीकत

  • मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का प्रशासन ‘जीरो टॉलरेंस’ और ‘सुशासन’ के नारों के लिए जाना जाता है। कई मामलों में त्वरित कार्रवाई और कठोर निर्णयों के उदाहरण भी दिए जाते रहे हैं। लेकिन कोडीन कफ सिरप जैसे मामलों में जब जांच एजेंसियां इतने बड़े आर्थिक लेन-देन और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की बात करती हैं, तो यह सवाल उठता है कि यह सब इतने लंबे समय तक कैसे चलता रहा।
  • यदि सरकार वास्तव में सुशासन के मॉडल पर काम कर रही है, तो फिर:
  • ड्रग और नशीली दवाओं से जुड़े नेटवर्क समय रहते क्यों नहीं पकड़े गए?
  • संबंधित विभागों—ड्रग कंट्रोल, पुलिस, आबकारी और स्थानीय प्रशासन—की भूमिका क्या रही?
  • क्या किसी स्तर पर लापरवाही, मिलीभगत या राजनीतिक दबाव काम कर रहा था?

जिम्मेदारी तय होगी या नहीं?

  • भारतीय लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत जनता का सवाल पूछने का अधिकार है। जब कोई घोटाला या कांड सामने आता है, तो केवल आरोपी की गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं मानी जाती। असली परीक्षा तब होती है, जब यह पता लगाया जाए कि:
  • ऐसे अपराधों को संरक्षण कौन देता है?
  • सिस्टम में मौजूद कमजोर कड़ियां कौन-सी हैं?
  • और भविष्य में ऐसे मामलों को रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे?

यदि जांच एजेंसियां निष्पक्ष हैं और सरकार वास्तव में पारदर्शिता के पक्ष में है, तो उसे चाहिए कि वह पूरे मामले पर स्पष्ट, तथ्यात्मक और सार्वजनिक जवाब दे।

जनता को जवाब चाहिए, नारे नहीं

  • आज सोशल मीडिया, टीवी डिबेट और आम चर्चाओं में एक ही बात बार-बार उठ रही है—“कफ सिरप का असली माफिया कौन है?” और “वे किनकी कृपा-दृष्टि से इतने बड़े नेटवर्क खड़े कर पाए?”
  • ‘सीटी बजाते रहिए’ या विपक्ष पर तंज कसने से जनता का भरोसा नहीं बनता। भरोसा तब बनता है, जब सत्ता में बैठी सरकार कठिन सवालों का सामना करती है और बिना किसी राजनीतिक भेदभाव के कार्रवाई सुनिश्चित करती है।

निष्कर्ष

कोडीन कफ सिरप कांड केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि शासन, जवाबदेही और नैतिक राजनीति की कसौटी है। मुख्यमंत्री और सरकार के लिए यह अवसर है कि वे केवल सुशासन के दावे न करें, बल्कि यह भी दिखाएं कि कानून सभी के लिए समान है—चाहे वह कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो।

News Editor- (Jyoti Parjapati)

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