Bail denied : दिल्ली दंगा मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला, उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत खारिज

दिल्ली दंगों से जुड़े कथित “बड़ी साजिश” मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए उमर खालिद और शरजील इमाम को बड़ा झटका दिया है। शीर्ष अदालत ने दोनों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं, जिसके बाद यह साफ हो गया है कि फिलहाल दोनों आरोपियों को जेल में ही रहना होगा। इस फैसले को न सिर्फ कानूनी बल्कि राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कुल सात आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की। इनमें उमर खालिद और शरजील इमाम के अलावा गुलफिशा, शादाब, शिफा उर रहमान, मीरान हैदर और सलीम शामिल थे। लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने दो अलग-अलग रुख अपनाए। जहां उमर खालिद और शरजील इमाम को राहत नहीं दी गई, वहीं बाकी पांच आरोपियों को जमानत दे दी गई।
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि उमर खालिद और शरजील इमाम का मामला अन्य आरोपियों से अलग प्रकृति का है। कोर्ट ने कहा कि इन दोनों पर लगे आरोपों की गंभीरता और मामले में उनकी कथित भूमिका को देखते हुए उन्हें इस स्तर पर जमानत नहीं दी जा सकती। सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को जांच एजेंसियों के लिए एक बड़ी वैधता के रूप में देखा जा रहा है।
दिल्ली दंगों का यह मामला फरवरी 2020 की हिंसा से जुड़ा है, जिसमें राजधानी के कई इलाकों में सांप्रदायिक झड़पें हुई थीं। इन दंगों में 50 से अधिक लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों घायल हुए थे। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने इसे एक सुनियोजित साजिश बताते हुए कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्रों और संगठनों से जुड़े लोगों को आरोपी बनाया था।
उमर खालिद और शरजील इमाम पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए के तहत गंभीर आरोप लगाए गए हैं। पुलिस का आरोप है कि दोनों ने कथित तौर पर दंगों से पहले भड़काऊ भाषण दिए और हिंसा फैलाने की साजिश में अहम भूमिका निभाई। हालांकि, दोनों आरोपी लगातार इन आरोपों से इनकार करते रहे हैं और खुद को निर्दोष बताते आए हैं।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने दलील दी कि आरोपियों को लंबे समय से जेल में रखा गया है और उनके खिलाफ ठोस सबूत नहीं हैं। उन्होंने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति की आवाज को दबाने का मामला बताया। वहीं, दिल्ली पुलिस और सरकारी वकीलों ने तर्क दिया कि यह सामान्य दंगा नहीं, बल्कि देश की एकता और सुरक्षा को चुनौती देने वाली साजिश थी।
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह स्पष्ट किया कि यूएपीए जैसे कानूनों में जमानत के मानदंड अलग होते हैं। कोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर सबूतों का गहन मूल्यांकन नहीं किया जा सकता, लेकिन आरोपों की प्रकृति को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी गईं।

दूसरी ओर, बाकी पांच आरोपियों को राहत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उनके मामलों में जमानत के लिए अलग परिस्थितियां मौजूद हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत देना आरोपों से बरी करना नहीं है और मुकदमे की सुनवाई आगे जारी रहेगी। इन आरोपियों को सशर्त जमानत दी गई है और उन्हें कानून द्वारा तय नियमों का पालन करना होगा।
इस फैसले के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज हो गई हैं। कुछ लोग इसे कानून और व्यवस्था की जीत बता रहे हैं, तो वहीं कुछ इसे चयनात्मक न्याय का उदाहरण कह रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर तीखी बहस देखने को मिल रही है। समर्थक इसे “राष्ट्र विरोधी गतिविधियों” पर सख्ती के रूप में देख रहे हैं, जबकि आलोचक इसे नागरिक अधिकारों पर चोट बता रहे हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में यूएपीए मामलों की दिशा तय कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि कुछ आरोपियों का मामला “अन्य कैदियों से अलग” है, एक महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी मानी जा रही है। इससे निचली अदालतों को भी यह संकेत मिलता है कि हर आरोपी को एक ही पैमाने पर नहीं तौला जा सकता।
फिलहाल, उमर खालिद और शरजील इमाम के लिए कानूनी विकल्प सीमित हो गए हैं। वे आगे ट्रायल कोर्ट में अपनी बेगुनाही साबित करने की कोशिश करेंगे। वहीं, जमानत पाने वाले पांच आरोपियों के लिए यह राहत अस्थायी है, क्योंकि मामला अभी अदालत में लंबित है और अंतिम फैसला आना बाकी है।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला दिल्ली दंगों के मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। यह न सिर्फ इस केस की आगे की सुनवाई को प्रभावित करेगा, बल्कि देश में दंगों, साजिश और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में जमानत की बहस को भी नई दिशा देगा। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि ट्रायल के दौरान अदालतें किन तथ्यों और सबूतों के आधार पर अंतिम निर्णय तक पहुंचती हैं।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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