The deadly game of Chinese kite string : उत्तर प्रदेश, इंदौर और दिल्ली के बाद अब कर्नाटक में भी चाइनीज मांझे का खूनी खे

दम तोड़ने से पहले बेटी को आखिरी फोन
- बीदर (कर्नाटक)। पतंगबाजी का शौक, जो कभी बच्चों की मासूम खुशियों और त्योहारों की रौनक का प्रतीक हुआ करता था, आज कई परिवारों के लिए मौत का पैगाम बनता जा रहा है। प्रतिबंधित चाइनीज मांझा (नायलॉन की डोर) देश के अलग-अलग हिस्सों में लगातार जिंदगियाँ लील रहा है। उत्तर प्रदेश, दिल्ली और इंदौर के बाद अब कर्नाटक में भी इस जानलेवा मांझे का खूनी खेल सामने आया है।
- कर्नाटक के बीदर जिले में स्थित तलामदगी ब्रिज के पास हुई एक दिल दहला देने वाली घटना ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया। यहां 48 वर्षीय संजू कुमार होसामणि की गर्दन पतंग की तेज धार वाली नायलॉन डोर की चपेट में आ गई। कुछ ही पलों में यह हादसा एक हँसते-खेलते परिवार के लिए जीवनभर का दर्द बन गया।
एक आखिरी फोन, जो जिंदगी भर रुलाएगा
- प्रत्यक्षदर्शियों और पुलिस के अनुसार, संजू कुमार होसामणि रोज़ की तरह अपने काम से लौट रहे थे। जैसे ही वे तलामदगी ब्रिज के पास पहुंचे, हवा में लटक रही चाइनीज मांझे की धारदार डोर अचानक उनके गले में फँस गई। बाइक की रफ्तार और मांझे की तीखी धार ने उनके गले को बुरी तरह काट दिया।
- खून से लथपथ संजू कुमार ने किसी तरह बाइक रोकी और कांपते हाथों से अपनी बेटी को फोन किया। फोन पर उन्होंने कहा—
“बेटी… मुझे कुछ हो गया है, जल्दी आ जाओ…”
ये उनके आखिरी शब्द साबित हुए। बेटी जब तक मौके पर पहुंची, तब तक संजू कुमार ने दम तोड़ दिया था।
प्रतिबंध के बावजूद क्यों बिक रहा है चाइनीज मांझा?
- चाइनीज मांझा नायलॉन और अन्य सिंथेटिक पदार्थों से बना होता है। यह बेहद मजबूत, पतला और लगभग अदृश्य होता है। इसकी धार इतनी तेज होती है कि यह इंसान की गर्दन, हाथ या शरीर के अन्य हिस्सों को ब्लेड की तरह काट देता है। यही कारण है कि भारत के कई राज्यों में इस पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जा चुका है।
- इसके बावजूद यह मांझा हर साल चोरी-छिपे बाजारों में बिकता है। त्योहारों के मौसम में इसकी मांग बढ़ जाती है और कुछ लोग मुनाफे के लालच में कानून को ताक पर रखकर इसकी बिक्री कर देते हैं। नतीजा यह होता है कि सड़क पर चलने वाले राहगीर, बाइक सवार, बच्चे और यहां तक कि पक्षी भी इसकी चपेट में आ जाते हैं।

देशभर में बन चुका है जानलेवा ट्रेंड
- यह पहली घटना नहीं है।
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उत्तर प्रदेश में बीते कुछ वर्षों में कई बाइक सवारों और बच्चों की गर्दन चाइनीज मांझे से कट चुकी है।
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दिल्ली में हर साल पतंगबाजी के मौसम में अस्पतालों में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ जाती है।
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इंदौर में भी चाइनीज मांझे से मौत और गंभीर चोटों के कई मामले सामने आ चुके हैं।
अब कर्नाटक के बीदर जिले में हुई यह घटना बताती है कि यह समस्या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे देश में फैल चुकी है।
प्रत्यक्षदर्शियों की जुबानी हादसे की दहशत
- घटनास्थल पर मौजूद लोगों का कहना है कि उन्होंने अचानक एक व्यक्ति को सड़क पर तड़पते हुए देखा। पहले किसी को समझ नहीं आया कि मामला क्या है। जब लोगों ने पास जाकर देखा, तो उनके गले से खून बह रहा था। मांझा इतनी बारीकी से गले में फँसा हुआ था कि उसे तुरंत हटाना भी संभव नहीं हो पा रहा था।
- स्थानीय लोगों ने बताया कि पुलों और ऊँची जगहों के आसपास पतंग उड़ाने के बाद मांझा अक्सर हवा में लटकता रह जाता है, जो आने-जाने वालों के लिए मौत का जाल बन जाता है।
प्रशासन की भूमिका पर सवाल
- इस दर्दनाक हादसे के बाद एक बार फिर प्रशासन और कानून व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं।
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जब चाइनीज मांझा प्रतिबंधित है, तो इसकी बिक्री कैसे हो रही है?
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आखिर कौन लोग इसे बाजार में पहुंचा रहे हैं?
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हर साल मौतों के बावजूद सख्त कार्रवाई क्यों नहीं होती?
स्थानीय प्रशासन ने मामले की जांच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का आश्वासन दिया है, लेकिन लोगों का कहना है कि ऐसी घोषणाएं हर हादसे के बाद होती हैं, जबकि जमीनी स्तर पर बदलाव नजर नहीं आता।
एक परिवार, जो हमेशा के लिए टूट गया
- संजू कुमार होसामणि अपने परिवार के लिए एकमात्र सहारा थे। उनकी असमय मौत ने परिवार को आर्थिक और मानसिक रूप से तोड़ दिया है। बेटी के लिए पिता का वह आखिरी फोन जिंदगी भर का दर्द बन गया है।
- परिवार का कहना है कि अगर चाइनीज मांझे पर सख्ती से रोक लगाई जाती, तो आज संजू कुमार जिंदा होते। यह केवल उनके परिवार का नहीं, बल्कि पूरे समाज का नुकसान है।
समाधान क्या है?
विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए सिर्फ प्रतिबंध ही काफी नहीं है।
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चाइनीज मांझे की पूरी सप्लाई चेन को खत्म करना होगा।
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ऑनलाइन और ऑफलाइन बिक्री पर कड़ी निगरानी जरूरी है।
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केवल सूती और सुरक्षित धागे को ही बढ़ावा दिया जाए।
एक चेतावनी, एक सवाल
- चाइनीज मांझा सिर्फ एक डोर नहीं, बल्कि लापरवाही और लालच का खतरनाक नतीजा है। सवाल यह है कि क्या हम अगली मौत का इंतजार करेंगे, या समय रहते इस खूनी खेल को रोकेंगे?
- संजू कुमार की बेटी का वह आखिरी फोन आज पूरे समाज से एक ही सवाल पूछ रहा है—
“क्या हमारी खुशी, किसी की जान से ज्यादा जरूरी है?”
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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