Crematorium case : श्मशान में भी भेदभाव: हिसार में अनुसूचित जाति के लिए अलग श्मशान का मामला

भारतीय समाज में जातिगत भेदभाव की जड़ें इतनी गहरी हैं कि
- यह जीवन के हर पहलू में दिखाई देती हैं। दुखद तथ्य यह है कि यह भेदभाव केवल जीवित लोगों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि मृत्यु के बाद भी इंसान का पीछा नहीं छोड़ता। हरियाणा के हिसार जिले के खासा महाजनान गांव से सामने आया मामला इसी सच्चाई को उजागर करता है, जहां अनुसूचित जाति के लोगों के लिए अलग श्मशान बनाए जाने की बात सामने आई है। इस गंभीर मामले पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने स्वतः संज्ञान लेते हुए जिला प्रशासन से दो सप्ताह के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट तलब की है।
घटना का विवरण
- खासा महाजनान गांव में कथित तौर पर श्मशान घाट को जाति के आधार पर विभाजित किया गया है। गांव में एक श्मशान तथाकथित उच्च जाति के लोगों के लिए है, जबकि अनुसूचित जाति के लोगों के अंतिम संस्कार के लिए अलग स्थान निर्धारित किया गया है। यह व्यवस्था न केवल सामाजिक समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन है, बल्कि भारतीय संविधान की मूल भावना के भी खिलाफ है, जो सभी नागरिकों को समानता और गरिमा का अधिकार देता है।
- स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार, अनुसूचित जाति के लोगों को लंबे समय से इस भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। कई बार विरोध के बावजूद स्थिति में कोई ठोस बदलाव नहीं हुआ। अंततः यह मामला मीडिया और मानवाधिकार संगठनों के संज्ञान में आया, जिसके बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस पर हस्तक्षेप किया।
संविधान और कानून की दृष्टि से
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता का अधिकार देता है। अनुच्छेद 15 जाति के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। इसके अलावा, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई का प्रावधान करता है।
- श्मशान घाट जैसे सार्वजनिक स्थान पर जातिगत भेदभाव न केवल सामाजिक अपराध है, बल्कि यह कानूनी अपराध भी है। अंतिम संस्कार हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है, और उसमें किसी भी प्रकार का भेदभाव मानव गरिमा के खिलाफ माना जाता है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की भूमिका
- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले को गंभीर मानते हुए जिला प्रशासन से दो सप्ताह में विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। आयोग ने यह स्पष्ट किया है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित अधिकारियों और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। NHRC का यह कदम दर्शाता है कि मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में संवैधानिक संस्थाएं सतर्क हैं, हालांकि सवाल यह भी उठता है कि ऐसे मामलों को सामने आने से पहले ही क्यों नहीं रोका जा सका।
सामाजिक मानसिकता पर सवाल
- यह मामला केवल प्रशासनिक या कानूनी विफलता नहीं है, बल्कि यह समाज की सामूहिक मानसिकता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। आज़ादी के 75 वर्षों से अधिक समय बाद भी यदि किसी गांव में जाति के आधार पर श्मशान अलग हों, तो यह सामाजिक सुधार के दावों की पोल खोलता है। शिक्षा, जागरूकता और कानून के बावजूद जातिगत भेदभाव का बने रहना इस बात का संकेत है कि बदलाव केवल कागजों तक सीमित है।
दलित समुदाय की पीड़ा
- अनुसूचित जाति के लोगों के लिए यह भेदभाव केवल एक व्यवस्था नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के अपमान और असमानता का प्रतीक है। जीवन भर सामाजिक भेदभाव झेलने के बाद मृत्यु के समय भी समानता न मिलना उनकी पीड़ा को और गहरा कर देता है। कई दलित परिवारों का कहना है कि वे इस व्यवस्था को मजबूरी में स्वीकार करते आए हैं, क्योंकि विरोध करने पर सामाजिक बहिष्कार या हिंसा का डर रहता है।
प्रशासन की जिम्मेदारी
- जिला प्रशासन की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह गांवों में सार्वजनिक स्थलों पर समानता सुनिश्चित करे। श्मशान घाट पंचायत या सरकारी भूमि पर बने होते हैं, इसलिए वहां किसी भी प्रकार का भेदभाव सीधे तौर पर प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाता है। यदि समय रहते निगरानी और हस्तक्षेप किया गया होता, तो यह मामला इस हद तक नहीं पहुंचता।
समाधान और आगे की राह
- इस तरह के मामलों से निपटने के लिए केवल जांच और रिपोर्ट ही पर्याप्त नहीं है। जरूरत है ठोस सामाजिक और प्रशासनिक कदमों की।
- श्मशान घाटों और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर समान उपयोग सुनिश्चित किया जाए।
- दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो, ताकि यह एक उदाहरण बन सके।
- गांव स्तर पर सामाजिक जागरूकता अभियान चलाए जाएं।
- पंचायतों और स्थानीय निकायों को जवाबदेह बनाया जाए।
निष्कर्ष
- हिसार के खासा महाजनान गांव का यह मामला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम वास्तव में एक समान और समावेशी समाज की ओर बढ़ रहे हैं। जब श्मशान जैसी जगह भी जाति से मुक्त नहीं हो पाती, तो यह हमारे सामाजिक ढांचे की गंभीर विफलता को दर्शाता है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की कार्रवाई उम्मीद की एक किरण जरूर है, लेकिन असली बदलाव तब आएगा जब समाज स्वयं इस भेदभाव को पूरी तरह नकार देगा। जाति से ऊपर उठकर मानवता को प्राथमिकता देना ही इस समस्या का स्थायी समाधान है।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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