The Rupee’s First Challenge : मध्य पूर्व में तनाव का असर! डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 93 के पार ?

The Rupee’s First Challenge : मध्य पूर्व में तनाव का असर! डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 93 के पार

The Rupee's First Challenge : मध्य पूर्व में तनाव का असर! डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 93 के पार
The Rupee’s First Challenge : मध्य पूर्व में तनाव का असर! डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 93 के पार

मुंबई: वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक दबावों के बीच भारतीय रुपया शुक्रवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अब तक के अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। शुरुआती कारोबार में रुपया 0.55 प्रतिशत की गिरावट के साथ 93.12 के स्तर तक फिसल गया, जो पहली बार है जब घरेलू मुद्रा ने 93 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार किया है। इससे पहले बुधवार को रुपया 92.63 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था।

विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के दिनों में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, विशेष रूप से ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच जारी संघर्ष ने वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ा दी है। इस स्थिति ने निवेशकों को सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर झुकने के लिए प्रेरित किया है, जिसके चलते डॉलर की मांग मजबूत हुई है और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं, खासकर रुपये पर दबाव बढ़ा है। बताया जा रहा है कि संघर्ष शुरू होने के बाद से रुपया लगभग 2 प्रतिशत तक कमजोर हो चुका है।

मुद्रा बाजार के जानकारों के अनुसार, रुपया लगातार 92.80 के ऊपर कारोबार कर रहा है, जो इस बात का संकेत है कि उस पर दबाव अभी भी बना हुआ है। इसके पीछे मुख्य कारण कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और वैश्विक स्तर पर जोखिम से बचने की प्रवृत्ति (रिस्क-ऑफ सेंटिमेंट) है। भारत, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से सीधे प्रभावित होता है। तेल महंगा होने पर आयात बिल बढ़ता है, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है।

एनरिच मनी के सीईओ पोनमुडी आर के मुताबिक, यदि रुपया 93 के स्तर से ऊपर बना रहता है, तो इसमें और कमजोरी देखने को मिल सकती है। उनका कहना है कि 93.20 से 93.40 के बीच मजबूत प्रतिरोध (रेजिस्टेंस) देखा जा रहा है, जबकि 92.70 और 92.50-92.40 के स्तर को समर्थन (सपोर्ट) माना जा सकता है। यह तकनीकी विश्लेषण इस ओर इशारा करता है कि निकट भविष्य में मुद्रा में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।

हालांकि मुद्रा बाजार में कमजोरी देखने को मिल रही है, लेकिन घरेलू शेयर बाजारों ने सकारात्मक रुख दिखाया है। शुक्रवार को सेंसेक्स में 900 अंकों से अधिक की तेजी दर्ज की गई, जो लगभग 1 प्रतिशत की बढ़त है। वहीं, निफ्टी भी करीब 300 अंकों यानी 1.35 प्रतिशत तक चढ़ा। इस तेजी का कारण घरेलू निवेशकों की खरीदारी और कुछ सेक्टरों में मजबूत प्रदर्शन को माना जा रहा है।

The Rupee's First Challenge : मध्य पूर्व में तनाव का असर! डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 93 के पार
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इसके विपरीत, विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) लगातार भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं। एक्सचेंज के आंकड़ों के अनुसार, गुरुवार को एफआईआई ने 7,558.19 करोड़ रुपये की इक्विटी की बिकवाली की। विदेशी निवेशकों की यह लगातार निकासी भी रुपये पर दबाव का एक प्रमुख कारण है, क्योंकि इससे डॉलर की मांग बढ़ती है।

कच्चे तेल के बाजार की बात करें तो हाल के दिनों में इसमें कुछ नरमी देखने को मिली है। खबर लिखे जाने तक डब्ल्यूटीआई क्रूड की कीमत 1.67 प्रतिशत गिरकर 93.65 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई, जबकि ब्रेंट क्रूड 1.20 प्रतिशत की गिरावट के साथ 107.3 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था। यह गिरावट उस बयान के बाद आई जिसमें संकेत दिया गया कि वैश्विक कीमतों को कम करने के लिए ईरानी तेल पर लगे प्रतिबंधों में आंशिक ढील दी जा सकती है।

इसके बावजूद, व्यापक परिदृश्य में कच्चे तेल की कीमतें अभी भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के 21वें दिन तक पहुंचते-पहुंचते ब्रेंट क्रूड की कीमतों में लगभग 40 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। 2 मार्च को जहां इसकी कीमत 77.74 डॉलर प्रति बैरल थी, वहीं 19 मार्च तक यह बढ़कर 108.65 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई।

इस पूरे घटनाक्रम का भारतीय अर्थव्यवस्था पर बहुआयामी प्रभाव पड़ रहा है। एक ओर रुपये की कमजोरी आयात को महंगा बनाती है, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है। दूसरी ओर, निर्यातकों को इससे कुछ राहत मिलती है क्योंकि उन्हें डॉलर में अधिक मूल्य प्राप्त होता है। हालांकि, यदि गिरावट अत्यधिक हो जाए तो यह आर्थिक स्थिरता के लिए चिंता का विषय बन सकती है।

आगे की दिशा काफी हद तक वैश्विक परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। यदि भू-राजनीतिक तनाव कम होता है और कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता आती है, तो रुपये को कुछ राहत मिल सकती है। वहीं, यदि विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी रहती है और डॉलर मजबूत बना रहता है, तो घरेलू मुद्रा पर दबाव बना रह सकता है।

कुल मिलाकर, वर्तमान स्थिति यह दर्शाती है कि भारतीय रुपया बाहरी कारकों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बना हुआ है। निवेशकों और नीति निर्माताओं दोनों के लिए यह समय सतर्कता बरतने का है, ताकि संभावित जोखिमों को संतुलित किया जा सके और आर्थिक स्थिरता बनाए रखी जा सके।

News Editor- (Jyoti Parjapati)

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