The nation’s prosperity : उर्से शम्शी में चादरपोशी कर मुल्क की खुशहाली, अमन और भाईचारे की मांगी दुआ

जौनपुर। सूफी परंपरा, धार्मिक आस्था और आपसी भाईचारे के प्रतीक उर्से शम्शी का आयोजन इस वर्ष भी पूरे श्रद्धा, सम्मान और अकीदत के साथ संपन्न हुआ। जिला कारागार के पीछे स्थित शेखपुर मोहल्ले में महान इस्लामी विद्वान और आलिमे दीन हजरत मौलाना काजी मोहम्मद शमसुद्दीन जाफरी की याद में आयोजित 46वें उर्से शम्शी में हजारों अकीदतमंदों ने शिरकत कर उनकी मजार पर चादरपोशी की और मुल्क में अमन-चैन, खुशहाली तथा भाईचारे के लिए दुआएं मांगीं।
हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी आयोजित हुए उर्से शम्शी में जौनपुर सहित पूर्वांचल के विभिन्न जनपदों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। वाराणसी, गाजीपुर, आजमगढ़, प्रयागराज, सुल्तानपुर, अमेठी, श्रावस्ती तथा आसपास के कई जिलों से आए अकीदतमंदों ने कार्यक्रम में भाग लेकर हजरत मौलाना शमसुद्दीन जाफरी को श्रद्धांजलि अर्पित की। उर्स के दौरान धार्मिक और आध्यात्मिक वातावरण देखने को मिला तथा पूरे क्षेत्र में आस्था का अद्भुत संगम दिखाई दिया।
उर्स की शुरुआत मदरसा हनीफिया आलम खां से चादर लेकर की गई। वहां से श्रद्धालुओं का काफिला नारे-तकबीर और दरूदो-सलाम पढ़ते हुए शेखपुर स्थित काजी मोहम्मद शमसुद्दीन जाफरी की मजार पर पहुंचा। मजार पर पहुंचने के बाद विधिवत चादरपोशी की गई और फातिहा पढ़ी गई। इसके साथ ही देश की तरक्की, समाज में सौहार्द, इंसानियत और शांति के लिए विशेष दुआएं की गईं।
कार्यक्रम के दौरान धार्मिक विद्वानों और उलेमाओं ने अपने विचार व्यक्त करते हुए इस्लाम की शिक्षाओं तथा समाज में प्रेम और भाईचारे की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। वक्ताओं ने कहा कि सूफी संतों और महान उलेमाओं की शिक्षाएं आज भी समाज को सही दिशा प्रदान कर रही हैं। उनका जीवन मानवता, सेवा, प्रेम और सहिष्णुता का संदेश देता है।
इस अवसर पर मदरसा हनीफिया के हजरत मौलाना अलहाज मोहिउद्दीन अहमद एहशाम जाफरी ने अस्वस्थ होने के बावजूद कुल शरीफ और दुआ में शिरकत की। उनकी उपस्थिति ने कार्यक्रम में पहुंचे लोगों को विशेष उत्साह प्रदान किया। उपस्थित उलेमाओं ने उनके स्वास्थ्य एवं दीर्घायु के लिए भी दुआ की।
धार्मिक सभा को संबोधित करते हुए उलेमाओं ने हजरत मौलाना शमसुद्दीन जाफरी के जीवन, व्यक्तित्व और उनके धार्मिक योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। वक्ताओं ने बताया कि उन्होंने इस्लामी शिक्षा और समाज सुधार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किए थे। उनकी लिखी प्रसिद्ध पुस्तक कानून ए शरियत आज भी देश और दुनिया के विभिन्न मदरसों एवं धार्मिक संस्थानों में पढ़ाई जाती है।

उलेमाओं ने कहा कि यह पुस्तक इस्लामी जीवन शैली, सामाजिक व्यवहार, धार्मिक कर्तव्यों तथा पारिवारिक जीवन के विभिन्न पहलुओं पर मार्गदर्शन प्रदान करती है। विशेष रूप से मुस्लिम परिवारों में विवाह के अवसर पर यह पुस्तक बेटियों को भेंट स्वरूप दी जाती है, ताकि वे इस्लामी शिक्षाओं के अनुरूप अपने जीवन का संचालन कर सकें। वक्ताओं ने कहा कि हजरत मौलाना शमसुद्दीन जाफरी की यह विरासत आज भी लाखों लोगों को मार्गदर्शन प्रदान कर रही है।
कार्यक्रम में उपस्थित धार्मिक विद्वानों ने अपने संबोधन में आपसी प्रेम, सौहार्द और राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि समाज की मजबूती का आधार आपसी सम्मान और भाईचारा है। धर्म का उद्देश्य लोगों को जोड़ना और मानवता की सेवा करना है। यदि समाज में प्रेम, सहयोग और सद्भाव बना रहेगा तो देश निरंतर प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ता रहेगा।
उर्स के दौरान नातिया महफिल का भी आयोजन किया गया, जिसमें हामिद रजा और सरफुद्दीन सर्रफ ने अपनी मधुर आवाज में नात-ए-पाक पेश कर श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। उनकी प्रस्तुतियों को उपस्थित लोगों ने काफी सराहा। नातिया कलामों से पूरा वातावरण आध्यात्मिक रंग में रंग गया और श्रद्धालु रसूल-ए-पाक की शान में पढ़े गए कलामों को सुनकर भावुक हो उठे।
इसके बाद हजरत मौलाना मोहिउद्दीन अहमद एहशाम साहब के साहबजादे अहमद रजा जाफरी ने सामूहिक दुआ कराई। दुआ में देश की सुरक्षा, समाज में शांति, युवाओं के उज्ज्वल भविष्य, किसानों की समृद्धि और मानवता की भलाई के लिए विशेष प्रार्थना की गई। उपस्थित हजारों लोगों ने हाथ उठाकर दुआ में हिस्सा लिया और अमन-चैन की कामना की।
दुआ के पश्चात सलाम पेश किया गया तथा श्रद्धालुओं के बीच तबर्रुक का वितरण किया गया। लोगों ने बड़े सम्मान और श्रद्धा के साथ तबर्रुक ग्रहण किया। कार्यक्रम के दौरान अनुशासन और धार्मिक गरिमा का विशेष ध्यान रखा गया।
उर्स में मौलाना कुद्दूस, मौलाना शरीफुल हक, मौलाना अहमद रजा जाफरी, मौलाना शब्बाल, मौलाना कयामुद्दीन, मौलाना साबिर, मौलाना फुजैल, जफर शेरू, शकील मंसूरी, अतीक, शहजादे सहित अनेक गणमान्य लोग और धर्मगुरु उपस्थित रहे। सभी ने कार्यक्रम की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
स्थानीय लोगों के अनुसार उर्से शम्शी केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है। यह आयोजन वर्षों से लोगों को जोड़ने और आध्यात्मिक मूल्यों को बढ़ावा देने का कार्य कर रहा है। हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचकर सूफी परंपरा और धार्मिक विरासत से जुड़ते हैं।
कार्यक्रम के अंत में अहमद रजा जाफरी ने दूर-दराज से आए सभी उलेमाओं, मेहमानों और अकीदतमंदों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि लोगों का प्रेम और सहयोग ही इस आयोजन की सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने सभी के लिए दुआ करते हुए कहा कि अल्लाह तआला सबको स्वस्थ, सुरक्षित और खुशहाल जीवन प्रदान करे।
उर्से शम्शी का यह आयोजन एक बार फिर धार्मिक आस्था, सूफी परंपरा, सामाजिक सौहार्द और मानवता के संदेश को मजबूत करने में सफल रहा। हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी ने यह साबित कर दिया कि महान संतों और उलेमाओं की शिक्षाएं आज भी समाज में प्रेम, शांति और भाईचारे की भावना को जीवित रखे हुए हैं।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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