Ambiguous State of Democracy : नागरिकता के दस्तावेजों पर अस्पष्ट स्थिति लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय

यदि पासपोर्ट, आधार, मतदाता पहचान पत्र और पैन कार्ड भी नागरिकता के अंतिम प्रमाण नहीं हैं, तो आखिर एक आम ग़रीब भारतीय अपनी नागरिकता किस दस्तावेज़ से सिद्ध करेगा?
पासपोर्ट, आधार, पैन और मतदाता पहचान पत्र पर उठे सवालों के बीच वरिष्ठ समाजसेवी मुसरफ ख़ान, एडवोकेट अरविन्द पुष्कर, समाजसेवी पंकज जैन और समाजसेवी राजू शर्मा ने कि स्पष्ट नीति की अपेक्षा – कहा, कानून और आमजन की समझ के बीच की दूरी मिटाना समय की मांग
नई दिल्ली, संजय साग़र सिंह। पासपोर्ट, आधार, पैन और मतदाता पहचान पत्र पर उठे सवालों के बीच वरिष्ठ समाजसेवी मुसरफ ख़ान, एडवोकेट अरविन्द पुष्कर, समाजसेवी पंकज जैन और समाजसेवी राजू शर्मा ने स्पष्ट नीति की अपेक्षा करते हुए कहा कि नागरिकता केवल एक कानूनी विषय नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय के सम्मान, अधिकार और पहचान से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। ऐसे में जब पासपोर्ट, आधार कार्ड, पैन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र जैसे व्यापक रूप से स्वीकार किए जाने वाले दस्तावेजों को नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाता, तो स्वाभाविक रूप से आम नागरिकों के मन में असमंजस पैदा होता है।
उन्होंने बताया कि हाल ही में पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा यह कहा गया कि भारतीय पासपोर्ट नागरिकता का नहीं, बल्कि केवल विदेश यात्रा का दस्तावेज है, जिसके बाद देशभर में बहस तेज हो गई। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक एक ही प्रश्न गूंजने लगा यदि पासपोर्ट, आधार, मतदाता पहचान पत्र और पैन कार्ड भी नागरिकता के अंतिम प्रमाण नहीं हैं, तो आखिर एक आम ग़रीब भारतीय अपनी नागरिकता किस दस्तावेज़ से सिद्ध करेगा?
उन्होंने आगे कहा कि कानूनी दृष्टि से देखा जाए तो यह बयान पूरी तरह निराधार नहीं है। भारतीय पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 20 केंद्र सरकार को विशेष परिस्थितियों में गैर-भारतीय नागरिक को भी जनहित में पासपोर्ट जारी करने का अधिकार देती है। इसी प्रकार आधार अधिनियम, 2016 आधार को केवल पहचान और निवास का प्रमाण मानता है, नागरिकता का नहीं। वहीं पैन कार्ड का उद्देश्य कर व्यवस्था से जुड़ा है, न कि नागरिकता का निर्धारण।

उन्होंने कहा कि इसके बावजूद आम नागरिक की धारणा अलग है। वर्षों से यही दस्तावेज उसकी पहचान और सरकारी मान्यता के सबसे मजबूत आधार रहे हैं। इसलिए जब इन्हें नागरिकता का अंतिम प्रमाण मानने से इनकार किया जाता है, तो लोगों में असुरक्षा और अविश्वास की भावना पैदा होना स्वाभाविक है।
उनका मानना है कि कानून की भाषा और आमजन की समझ के बीच बढ़ती दूरी ही ऐसे विवादों की जड़ है। कानूनी प्रावधान अपनी जगह सही हो सकते हैं, लेकिन यदि उनकी स्पष्ट और सरल व्याख्या समय पर न हो, तो उचित जानकारी ना होना तय है। यही कारण है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान भी ऐसे ही सवाल उठे थे और अब पासपोर्ट को लेकर वही स्थिति दोहराई जा रही है।
उन्होंने सवाल उठाया है कि जब पासपोर्ट जारी करने से पहले पुलिस सत्यापन किया जाता है, तो वह किस आधार पर होता है? वहीं आम नागरिक भी यह जानना चाहता है कि नागरिकता सिद्ध करने के लिए आखिर किन दस्तावेजों को अंतिम रूप से मान्यता प्राप्त है।
वर्ष 2019 में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) से जुड़े एक सरकारी स्पष्टीकरण में संकेत दिया गया था कि जन्म तिथि और जन्म स्थान से संबंधित विभिन्न दस्तावेज नागरिकता के प्रमाण के रूप में स्वीकार किए जा सकते हैं। इनमें जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल रिकॉर्ड, भूमि संबंधी दस्तावेज, पासपोर्ट, मतदाता पहचान पत्र, आधार, ड्राइविंग लाइसेंस तथा अन्य सरकारी अभिलेख शामिल हो सकते हैं। हालांकि इन दस्तावेजों की अंतिम सूची पर अब तक स्पष्ट और व्यापक दिशा-निर्देश जारी नहीं हुए हैं।
आखिर में उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती केवल कानून बनाने से नहीं, बल्कि नागरिकों के विश्वास से सुनिश्चित होती है। इसलिए आवश्यक है कि नागरिकता संबंधी वैध दस्तावेजों पर स्पष्ट, सरल और आधिकारिक मार्गदर्शन जारी हो, ताकि असमंजस की स्थिति साफ़ हो और किसी भी भारतीय नागरिक को परेशानी ना हो।
कानून की जटिल भाषा और आमजन की सहज समझ के बीच संतुलन ही सुशासन की वास्तविक पहचान है। जब तक यह दूरी कम नहीं होगी, तब तक अस्पष्ट असमंजस की स्थिति बनी रहेगी। आम नागरिकों के विश्वास को मजबूत करना ही लोकतांत्रिक व्यवस्था की बड़ी जिम्मेदारी है।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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