
उनके हाथ में डिग्री हो तो उसके साथ कोई उपयोगी हुनर भी हो: राष्ट्रवादी सामाजिक चिंतक मुसरफ ख़ान डिग्री नहीं, हुनर भी चाहिए – बच्चों को नौकरी नहीं, जीवन के लिए तैयार करे शिक्षा आज़ भारत को ऐसी शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें बच्चा यह न पूछे कि पढ़ाई पूरी होने के बाद नौकरी कहां मिलेगी? बल्कि वह यह भी सोच सके कि मैं अपने ज्ञान और हुनर से कौन-सी समस्या हल कर सकता हूं? दिमाग में ज्ञान हो तो उसके साथ विवेक भी हो; नौकरी का विकल्प हो तो उसके साथ स्वरोजगार और उद्यमिता का रास्ता भी खुला हो। किताबी ज्ञान के साथ व्यावहारिक कौशल, वित्तीय समझ और आत्मनिर्भरता की शिक्षा जरूरी; अच्छे इंजीनियर के साथ कुशल इलेक्ट्रिशियन, प्लंबर, मैकेनिक और कारीगर भी देश की जरूरत क्या हमारे स्कूल और कॉलेज बच्चों को केवल परीक्षा पास करने के लिए तैयार कर रहे हैं या उन्हें जीवन की वास्तविक चुनौतियों का सामना करने योग्य भी बना रहे हैं?
नई दिल्ली, संजय साग़र सिंह। मौजूदा शिक्षा व्यवस्था पर चिंता व्यक्त करते हुए राष्ट्रवादी सामाजिक चिंतक मुसरफ ख़ान ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अच्छे अंक, हाथ में डिग्री और किसी कंपनी में नौकरी हासिल करना नहीं हो सकता। शिक्षा का वास्तविक अर्थ तब पूरा होता है, जब वह व्यक्ति को ज्ञान के साथ विवेक, डिग्री के साथ हुनर और नौकरी के साथ आत्मनिर्भरता का विकल्प दे। आज बदलते रोजगार बाजार और युवाओं के सामने खड़ी चुनौतियों ने देश की शिक्षा व्यवस्था से यही सबसे बड़ा सवाल पूछा है क्या हमारे स्कूल और कॉलेज बच्चों को केवल परीक्षा पास करने के लिए तैयार कर रहे हैं या उन्हें जीवन की वास्तविक चुनौतियों का सामना करने योग्य भी बना रहे हैं?
देश में बेरोजगारी पर होने वाली बहस के बीच यह सवाल लगातार महत्वपूर्ण हो रहा है कि क्या केवल डिग्री रोजगार की गारंटी है?
वास्तविकता यह है कि समाज को इंजीनियर, डॉक्टर, शिक्षक, बैंककर्मी और प्रशासनिक अधिकारी जितने आवश्यक हैं, उतने ही कुशल इलेक्ट्रिशियन, प्लंबर, कारपेंटर, मोटर मैकेनिक, वेल्डर, ड्राफ्ट्समैन, तकनीशियन और अन्य दक्ष कामगार भी जरूरी हैं। किसी घर की बिजली खराब हो, पानी की पाइप टूट जाए, वाहन खराब हो या निर्माण कार्य करना हो तब समाज को डिग्री नहीं, दक्ष हाथों की जरूरत पड़ती है।
डिग्री और हुनर की लड़ाई नहीं, दोनों का संतुलन जरूरी
हालांकि इस बहस को केवल यह कहकर समाप्त नहीं किया जा सकता कि डिग्री बेकार है और केवल स्किल ही पर्याप्त है। देश को अच्छे इंजीनियर भी चाहिए और अच्छे इलेक्ट्रिशियन भी। जरूरत इस बात की है कि शिक्षा व्यवस्था में अकादमिक ज्ञान के साथ व्यावहारिक प्रशिक्षण का मजबूत संतुलन बनाया जाए। आज अनेक युवा वर्षों तक पढ़ाई करने के बाद भी सामान्य जीवन की छोटी-छोटी समस्याओं को स्वयं हल करने में असहज महसूस करते हैं। बिजली की मामूली मरम्मत, घरेलू उपकरणों की बुनियादी समझ, वित्तीय प्रबंधन, प्राथमिक तकनीकी जानकारी, खेती-बागवानी, संवाद-कौशल या छोटे स्तर पर व्यवसाय शुरू करने जैसी क्षमताएं भी जीवन को आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
स्कूल की चारदीवारी से बाहर निकलकर जीवन की पाठशाला तक पहुंचे शिक्षा
शिक्षा में इतिहास, भूगोल, भाषा, गणित, विज्ञान और अन्य विषयों का अपना महत्व है। लेकिन इनके साथ बच्चों को यह भी सिखाया जाना चाहिए कि ज्ञान का इस्तेमाल वास्तविक जीवन में कैसे किया जाए। स्कूलों में उम्र और रुचि के अनुसार बिजली एवं इलेक्ट्रॉनिक्स की बुनियादी समझ, बढ़ईगीरी, कृषि, मशीनों की जानकारी, डिजिटल कौशल, वित्तीय साक्षरता, प्राथमिक स्वास्थ्य-जागरूकता, मरम्मत-कौशल, संवाद-कौशल और उद्यमिता जैसे विषयों को व्यावहारिक रूप में शामिल किया जाना चाहिए। बच्चे को यह पता होना चाहिए कि बैंक खाता कैसे संचालित होता है, बजट कैसे बनाया जाता है, बचत और निवेश क्या हैं, किसी छोटी समस्या का समाधान कैसे खोजा जाता है और अपने हुनर को रोजगार या व्यवसाय में कैसे बदला जा सकता है। यही शिक्षा उसे केवल नौकरी तलाशने वाला नहीं, बल्कि अवसर पैदा करने वाला व्यक्ति बना सकती है।
स्किल वाले काम को सम्मान कब मिलेगा?
इस बहस का एक और महत्वपूर्ण पक्ष भारतीय समाज की मानसिकता से जुड़ा है। हमारे यहां अक्सर डिग्री वाले पेशों को अधिक प्रतिष्ठा और हाथ से काम करने वाले पेशों को कमतर समझने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। यही सोच युवाओं को पारंपरिक और तकनीकी कौशल से दूर कर केवल सफेदपोश नौकरियों की दौड़ में धकेलती है। जबकि सच्चाई यह है कि समाज का पहिया हर प्रकार के कामगार के योगदान से चलता है। इलेक्ट्रिशियन केवल तार नहीं जोड़ता, वह घरों और संस्थानों की व्यवस्था को चलाता है। कारपेंटर केवल लकड़ी नहीं काटता, वह उपयोगी वस्तुएं तैयार करता है। मैकेनिक केवल वाहन नहीं सुधारता, वह लोगों की रोजमर्रा की गतिशीलता बनाए रखता है। इसलिए काम की गरिमा उसके सामाजिक स्टेटस से नहीं, उसके महत्व और दक्षता से तय होनी चाहिए।

गरीब परिवारों के बच्चों के लिए व्यावहारिक शिक्षा बने सहारा
शिक्षा के बढ़ते खर्च ने आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के सामने भी गंभीर चुनौतियां खड़ी की हैं। हर परिवार महंगी प्रोफेशनल डिग्री का खर्च वहन नहीं कर सकता। ऐसे में 10वीं या 12वीं के बाद यदि किसी युवा के पास प्रमाणित और रोजगार परक कौशल है, तो वह सम्मानजनक रोजगार या अपना छोटा व्यवसाय शुरू कर सकता है। इसीलिए व्यावसायिक शिक्षा को मुख्यधारा की शिक्षा से अलग या कमतर समझने के बजाय उसे समान सम्मान और अवसर मिलना चाहिए। कौशल शिक्षा गरीबी से जूझ रहे परिवारों के बच्चों के लिए आत्मनिर्भरता का मजबूत रास्ता बन सकती है।
स्कूल बच्चों को फीस का ग्राहक नहीं, भविष्य का निर्माता समझें
शिक्षा के क्षेत्र में अभिभावकों और विद्यार्थियों की कुछ शिकायतें ऐसी भी सामने आती हैं, जिनमें स्कूलों की अतिरिक्त गतिविधियों और फीस को लेकर सवाल उठते हैं। सह- पाठ्यक्रम गतिविधियां बच्चों के व्यक्तित्व विकास के लिए उपयोगी हो सकती हैं, लेकिन उनका उद्देश्य केवल अतिरिक्त शुल्क वसूलना नहीं होना चाहिए। किसी भी गतिविधि की सार्थकता इस बात से तय होनी चाहिए कि वह बच्चे में रचनात्मकता, अनुशासन, आत्मविश्वास, टीमवर्क, नेतृत्व, संवाद या कोई उपयोगी क्षमता विकसित कर रही है या नहीं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के बच्चे को केवल शुल्क न दे पाने के कारण शिक्षा से दूर करना किसी भी संवेदनशील शिक्षा व्यवस्था के उद्देश्य के विपरीत होगा। विद्यालयों को विद्यार्थियों की आर्थिक परिस्थितियों के प्रति मानवीय और जिम्मेदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
असली बदलाव की जरूरत शिक्षा की सोच में है
आज जरूरत डिग्री को खारिज करने की नहीं, बल्कि डिग्री की उपयोगिता को कौशल से जोड़ने की है। एक बीटेक विद्यार्थी यदि तकनीकी दक्षता के साथ किसी समस्या का समाधान करना जानता है तो उसकी शिक्षा सार्थक है। उसी तरह एक इलेक्ट्रिशियन यदि आधुनिक तकनीक, सुरक्षा मानकों और डिजिटल उपकरणों की जानकारी रखता है तो उसका कौशल भी उतना ही मूल्यवान है।
आज़ भारत को ऐसी शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें बच्चा यह न पूछे कि पढ़ाई पूरी होने के बाद नौकरी कहां मिलेगी?, बल्कि वह यह भी सोच सके कि मैं अपने ज्ञान और हुनर से कौन-सी समस्या हल कर सकता हूं?
शिक्षा का अंतिम लक्ष्य – सक्षम इंसान बनाना
डिग्री और कौशल को एक-दूसरे का विरोधी बनाना समस्या का समाधान नहीं है। ज्ञान दिशा देता है और कौशल उस ज्ञान को धरातल पर उतारता है। डिग्री अवसरों के द्वार खोल सकती है, जबकि कौशल व्यक्ति को उन अवसरों का उपयोग करने की क्षमता देता है। इसलिए आज की शिक्षा को ऐसी दिशा देने की जरूरत है, जहां बच्चे पढ़ें भी, समझें भी, बनाएं भी और कमाएं भी। उनके हाथ में डिग्री हो तो उसके साथ कोई उपयोगी हुनर भी हो; दिमाग में ज्ञान हो तो उसके साथ विवेक भी हो; नौकरी का विकल्प हो तो उसके साथ स्वरोजगार और उद्यमिता का रास्ता भी खुला हो। क्योंकि शिक्षा की सफलता केवल इस बात में नहीं है कि बच्चा कितने अंक लेकर निकला, बल्कि इस बात में है कि वह जीवन की चुनौतियों के सामने कितना सक्षम, आत्मनिर्भर, जिम्मेदार और समस्या-समाधान करने वाला इंसान बनकर खड़ा होता है। यही वह बदलाव है, जो शिक्षा को किताबों से जीवन तक और डिग्री से आत्मनिर्भरता तक ले जा सकता है।.
News Editor- (Jyoti Parjapati)
सभी समाचार देखें सिर्फ अनदेखी खबर सबसे पहले सच के सिवा कुछ नहीं ब्यूरो रिपोर्टर :- अनदेखी खबर ।
YouTube Official Channel Link:
https://youtube.com/@atozcrimenews?si=_4uXQacRQ9FrwN7q
YouTube Official Channel Link:
https://www.youtube.com/@AndekhiKhabarNews
Facebook Official Page Link:
https://www.facebook.com/share/1AaUFqCbZ4/
Whatsapp Group Join Link:
https://chat.whatsapp.com/KuOsD1zOkG94Qn5T7Tus5E?mode=r_c
अनदेखी खबर न्यूज़ पेपर भारत का सर्वश्रेष्ठ पेपर और चैनल है न्यूज चैनल राजनीति, मनोरंजन, बॉलीवुड, व्यापार और खेल में नवीनतम समाचारों को शामिल करता है। अनदेखी खबर न्यूज चैनल की लाइव खबरें एवं ब्रेकिंग न्यूज के लिए हमारे चैनल को Subscribe, like, share करे।
