
नोएडा प्रकरण को लेकर आकृति चौधरी की गिरफ्तारी को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिखाया
- डीएम समेत दूसरे अफसरों को आइना नई दिल्ली। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आकृति चौधरी के मामले में नोएडा की डीएम समेत अन्य अफसर जो आकृति की कथित अवैध हिरासत से ताल्लुक रखते हैं उनको लेकर कठोर लहजे में टिप्पणी की। कोर्ट ना केवल कठोर टिप्पणी की है बल्कि एक तरह से इन अफसरों पर जुर्माना भी लगाया है। यह जुर्माना इन अफसरों को अपनी पॉकेट से भरना है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नोएडा में दिल्ली विश्वविद्यालय की 24 वर्षीय लॉ स्टूडेंट और सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी को हिरासत में लिए जाने को लेकर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों पर जुर्माना लगाया है। जस्टिस सचदेव और श्रीधरन की दो सदस्यीय बेंच ने आकृति चौधरी को पाँच लाख रुपये का मुआवज़ा देने का आदेश दिया है।
अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड का हिस्सा बनेगा
- जस्टिस अचल सचदेव और जस्टिस अतुल श्रीधरन की बेंच ने ‘साफ़ तौर पर तथ्य गढ़ने’ की बात कही है और निर्देश दिया है कि उनके फ़ैसले को इन अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड का हिस्सा बनाया जाए। दो सितंबर को सुनाए गए फ़ैसले को सात सितंबर को अदालत की वेबसाइट पर अपलोड किया गया है, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (एनएसए) के तहत आकृति चौधरी की हिरासत को ग़लत बताया गया है। एनएसए के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए ख़तरे से जुड़े मामलों में किसी व्यक्ति को बिना मुक़दमे के हिरासत में रखने की अनुमति है, लेकिन अदालत ने ये भी स्पष्ट किया कि एनएसए के तहत एहतियातन हिरासत एक अपवाद है, और इसका इस्तेमाल सामान्य क़ानून के विकल्प के तौर पर नहीं किया जा सकता।

जुर्माना होगा भरना
- जस्टिस सचदेव और श्रीधरन की दो सदस्यीय बेंच ने आकृति चौधरी को पाँच लाख रुपये का मुआवज़ा देने का आदेश दिया है। अदालत ने आदेश दिया कि यह रक़म गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) की ज़िलाधिकारी और हिरासत का आदेश जारी करने के लिए ज़िम्मेदार अन्य अधिकारियों के वेतन से वसूली जाए। आकृति चौधरी इस समय वह नोएडा की कासना जेल में हैं और उन पर कुल 11 मुक़दमे दर्ज किए गए हैं। बेंच ने उनकी हिरासत से जुड़े दस्तावेज़ों में भी कई अनियमितताएं पाईं। नोएडा के अधिकारियों ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 130 के तहत आकृति को जारी किया गया एक नोटिस पेश किया, जिसके मुताबिक़ उनसे अच्छे व्यवहार के लिए बॉन्ड भरने को कहा गया था। इस नोटिस में जनरल डायरी एंट्री नंबर 37 का ज़िक्र था। अदालत ने पाया कि यह एंट्री 12 अप्रैल को सुबह 10:20 बजे दर्ज की गई थी, जबकि नोटिस जारी करने का समय नहीं बताया गया था।
दिखावटी कार्रवाई दिया करार
- अदालत ने माना कि नोटिस आकृति की गिरफ़्तारी के बाद तैयार किया गया था जो ‘महज़ दिखावटी काग़ज़ी कार्रवाई’ थी। जजों ने कहा कि रिकॉर्ड में ‘साफ़ तौर पर की गई हेराफेरी’ की सफ़ाई देने में प्रशासन नाकाम रहा। अदालत ने सरकार के वकील से ऐसे सबूत भी पेश करने को कहा, जिनसे यह साबित हो कि आकृति ने लोगों को दंगा करने, संपत्ति जलाने या सरकारी अधिकारियों पर हमला करने के लिए उकसाया था। अदालत को व्हाट्सऐप बातचीत या किसी वीडियो क्लिप में ऐसा एक भी संदेश नहीं मिला, जो इस तरह के उकसावे को साबित करता हो। सरकारी अधिकारी जिन वीडियो को सुबूत बता रहे थे, उनमें बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ दिखाई दे रही थी। इसमें पारंपरिक ग्रामीण कपड़े पहने पुरुष और महिलाएं और भीड़ को संबोधित करता हुआ एक व्यक्ति नज़र आ रहा था। अदालत ने कहा कि फुटेज में कोई हथियारबंद या हिंसक भीड़ नहीं दिख रही थी, बल्कि ऐसा लग रहा था कि मज़दूर वेतन और काम की परिस्थितियों को लेकर विरोध करने के अपने संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल कर रहे थे। अदालत ने कहा, “अभिव्यक्ति और भाषण की स्वतंत्रता का दायरा सड़कों और आंदोलनों तक जाता है।” केवल इस आशंका के आधार पर शांतिपूर्ण सभाओं को नहीं रोका जा सकता कि इससे शांति भंग हो सकती है। हाई कोर्ट ने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन की तुलना प्रेशर कुकर के सेफ्टी वॉल्व से की. उसका तर्क था कि लोगों को अपनी शिकायतें और असंतोष व्यक्त करने की अनुमति देने से तनाव को उस स्तर तक पहुँचने से रोका जा सकता है, जहाँ हिंसा को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाए।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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