Healthcare system : कल्पना मिश्रा और नवजात की मौत के बाद उठे सवाल, धरना खत्म होते ही फिर पुराने ढर्रे पर रीवा की स्वास्थ्य व्यवस्था ?

Healthcare system : कल्पना मिश्रा और नवजात की मौत के बाद उठे सवाल, धरना खत्म होते ही फिर पुराने ढर्रे पर रीवा की स्वास्थ्य व्यवस्था
Healthcare system : कल्पना मिश्रा और नवजात की मौत के बाद उठे सवाल, धरना खत्म होते ही फिर पुराने ढर्रे पर रीवा की स्वास्थ्य व्यवस्था

रीवा।

कल्पना मिश्रा और उसके नवजात की मौत के बाद रीवा में उठे आक्रोश ने स्वास्थ्य व्यवस्था, प्रशासनिक कार्रवाई और जिम्मेदारी को लेकर कई सवाल खड़े किए थे। घटना के बाद कल्पना के पिता सिरमौर चौराहा पर धरने पर बैठ गए थे। यह धरना लगातार 14 दिन तक चला। परिवार की पीड़ा और न्याय की मांग के बीच धरना धीरे-धीरे व्यापक चर्चा का विषय बन गया। लोगों को उम्मीद थी कि इस विरोध के बाद प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग मामले को गंभीरता से लेते हुए व्यवस्था में सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाएंगे।

धरने के दौरान कल्पना के पिता अपनी मांगों को लेकर डटे रहे। उनके साथ कई लोग समर्थन में पहुंचे। घटना को लेकर लोगों में नाराजगी थी और स्वास्थ्य सेवाओं की जवाबदेही पर सवाल उठाए जा रहे थे। धरना समाप्त होने से पहले 17 सितंबर को मुख्यमंत्री का जन्मदिन मनाया जाना था। इसी दौरान उपमुख्यमंत्री के रीवा आने का कार्यक्रम भी प्रस्तावित था। आरोप है कि उनके आगमन से पहले ही धरना स्थल पर लगा तंबू उखाड़ दिया गया। कल्पना के पिता को जबरन अस्पताल में भर्ती कराए जाने की बात भी सामने आई, जबकि धरने का समर्थन कर रहे कुछ लोगों को जेल भेजे जाने का दावा किया गया। इसके बाद धरना समाप्त हो गया और मामला धीरे-धीरे शांत पड़ गया।

धरना खत्म होने के बाद भले ही सार्वजनिक स्तर पर हलचल कम हो गई हो, लेकिन इससे जुड़े सवाल खत्म नहीं हुए। लोगों को उम्मीद थी कि इस पूरे घटनाक्रम से उपमुख्यमंत्री, रीवा प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को सबक मिलेगा। यह अपेक्षा की जा रही थी कि अस्पतालों में मरीजों को बेहतर इलाज और सुविधाएं उपलब्ध कराने पर ध्यान दिया जाएगा तथा चिकित्सकीय सेवाओं में जवाबदेही सुनिश्चित होगी। लेकिन आरोप है कि धरना हटते ही व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर लौट गई और जिन सवालों को लेकर विरोध हुआ था, वे अब भी अनुत्तरित हैं।

राजनीतिक कार्यक्रम के बीच अस्पताल पहुंचने पर सवाल

इसी पृष्ठभूमि में रीवा के राजनीतिक और प्रशासनिक घटनाक्रम ने एक बार फिर चर्चा को जन्म दिया। राजनीतिक खींचतान के बीच अपनी स्थिति को मजबूत दिखाने के प्रयास के तौर पर देखे जा रहे कार्यक्रम में उपमुख्यमंत्री राजेन्द्र शुक्ला ने विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर को रीवा आमंत्रित किया। उनके रीवा प्रवास के दौरान दोनों नेता कई कार्यक्रमों में साथ-साथ शामिल हुए। इसी क्रम में वे समान तिराहा स्थित बालाजी मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल भी पहुंचे।

अस्पताल पहुंचने को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं कि दोनों नेताओं का वहां जाना किस उद्देश्य से था और इस दौरान क्या गतिविधियां हुईं। उपलब्ध विवरण में अस्पताल दौरे के उद्देश्य, वहां हुई बातचीत या किसी प्रशासनिक निर्णय की स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है। ऐसे में इस दौरे को लेकर कोई निश्चित निष्कर्ष निकालने के बजाय यह सवाल उठता है कि क्या इस अवसर पर अस्पताल की कार्यप्रणाली, मरीजों को मिल रही सुविधाओं और चिकित्सकीय जिम्मेदारियों की समीक्षा भी की गई थी।

Healthcare system : कल्पना मिश्रा और नवजात की मौत के बाद उठे सवाल, धरना खत्म होते ही फिर पुराने ढर्रे पर रीवा की स्वास्थ्य व्यवस्था
Healthcare system : कल्पना मिश्रा और नवजात की मौत के बाद उठे सवाल, धरना खत्म होते ही फिर पुराने ढर्रे पर रीवा की स्वास्थ्य व्यवस्था

निजी प्रैक्टिस और सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था पर बहस

इस दौरे के बाद सबसे बड़ा सवाल सरकारी अस्पतालों में सेवाओं और चिकित्सकों की निजी प्रैक्टिस को लेकर उठ रहा है। आरोप है कि उपमुख्यमंत्री और प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री निजी प्रैक्टिस के मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से सख्त बातें करते हैं और कार्रवाई की बात भी करते हैं, लेकिन बालाजी मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल पहुंचने से उनके रुख को लेकर विरोधाभास का सवाल खड़ा हुआ है।

प्रस्तुत विवरण के अनुसार, बालाजी मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल संजय गांधी अस्पताल (एसजीएमएच) के दो डॉक्टर मिलकर संचालित करते हैं। इसी आधार पर यह चिंता जताई जा रही है कि यदि सरकारी अस्पताल से जुड़े चिकित्सक निजी अस्पताल भी संचालित कर रहे हैं, तो सरकारी अस्पताल में उपलब्ध सेवाओं और मरीजों को मिलने वाले समय पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है। हालांकि, इस संबंध में किसी नियम उल्लंघन, चिकित्सकों की ड्यूटी में लापरवाही या मरीजों के इलाज पर प्रत्यक्ष असर का कोई दस्तावेजी विवरण उपलब्ध नहीं कराया गया है। इसलिए इन सवालों की पुष्टि संबंधित रिकॉर्ड और विभागीय जांच से ही हो सकती है।

सरकारी अस्पतालों में बेहतर सुविधाओं की मांग लंबे समय से मरीजों और उनके परिजनों के लिए अहम मुद्दा रही है। जब मरीज सरकारी संस्थान में इलाज के लिए पहुंचते हैं, तो उनसे अपेक्षा होती है कि उन्हें समय पर चिकित्सकीय परामर्श, आवश्यक जांच और उचित उपचार मिल सके। यदि सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस को लेकर संदेह या शिकायतें हैं, तो स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी है कि नियमों और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर स्थिति स्पष्ट करे। इससे न केवल मरीजों का भरोसा मजबूत होगा, बल्कि चिकित्सकों और संस्थानों पर लगने वाले आरोपों की वास्तविकता भी सामने आ सकेगी।

धरना खत्म, लेकिन जवाबदेही के सवाल बाकी

कल्पना मिश्रा और उसके नवजात की मौत के बाद हुआ धरना केवल एक परिवार की मांगों तक सीमित नहीं रहा; इसने स्वास्थ्य सेवाओं की जवाबदेही और प्रशासन की भूमिका को लेकर भी बहस खड़ी की। धरना स्थल हटने और विरोध समाप्त होने से यह जरूरी नहीं कि लोगों की चिंताएं भी समाप्त हो गई हों। परिवार को न्याय मिला या नहीं, घटना की जांच में क्या प्रगति हुई, संबंधित चिकित्सकीय और प्रशासनिक जिम्मेदारियों की समीक्षा की गई या नहीं—इन सवालों पर स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक होना महत्वपूर्ण है।

इसी तरह बालाजी मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल के दौरे को लेकर भी पारदर्शिता की अपेक्षा की जा रही है। यदि यह दौरा किसी औपचारिक कार्यक्रम का हिस्सा था, तो उसके उद्देश्य और निष्कर्ष स्पष्ट किए जा सकते हैं। यदि अस्पताल की व्यवस्था या चिकित्सकीय सेवाओं से संबंधित कोई समीक्षा हुई, तो उससे जुड़े तथ्यों को सार्वजनिक करना उपयोगी होगा। इससे राजनीतिक कार्यक्रम और स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच उठ रहे सवालों का जवाब मिल सकेगा।

रीवा में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर उठ रही बहस का केंद्र अंततः मरीजों को मिलने वाला इलाज और संस्थानों की जवाबदेही है। कल्पना मिश्रा की मौत के बाद परिवार ने जिस पीड़ा और आक्रोश के साथ धरना दिया, उसके बाद लोगों की अपेक्षा थी कि व्यवस्था में सुधार दिखाई देगा। अब जरूरत है कि प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग आरोपों तथा आशंकाओं के बजाय तथ्यों, जांच और स्पष्ट कार्रवाई के माध्यम से स्थिति सामने रखें। निजी प्रैक्टिस से जुड़े नियमों का पालन, सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की उपलब्धता और मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं की निष्पक्ष समीक्षा ही इन सवालों का ठोस जवाब दे सकती है।

News Editor- (Jyoti Parjapati)

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