
रीवा।
संजय गांधी अस्पताल में मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) के पदों और उनकी कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि अस्पताल में पहले से ही 12 से अधिक सीएमओ पदस्थ हैं, इसके बावजूद सेवानिवृत्त डॉ. अतुल सिंह को दोबारा नौकरी पर रखकर प्रभारी सीएमओ की जिम्मेदारी सौंप दी गई। इस नियुक्ति को लेकर अस्पताल प्रबंधन और चिकित्सा शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। खास तौर पर वर्ष 2014 में डॉ. अतुल सिंह से जुड़ा बताया जा रहा स्टिंग और एमएलसी रिपोर्ट बदलने के लिए कथित रूप से पैसे मांगने का मामला फिर चर्चा में आ गया है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, संजय गांधी अस्पताल चिकित्सा शिक्षा विभाग के अधीन संचालित होता है। बताया गया है कि क्षेत्रीय संचालक ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के पद से डॉ. अतुल सिंह की नियुक्ति की और उन्हें संजय गांधी अस्पताल में पदस्थ किया। इसके बाद अस्पताल अधीक्षक डॉ. प्रियंक सिंह ने उन्हें प्रभारी सीएमओ बना दिया। इस फैसले को लेकर सवाल उठाया जा रहा है कि जब अस्पताल में पहले से ही बड़ी संख्या में सीएमओ मौजूद हैं, तो फिर एक सेवानिवृत्त डॉक्टर को दोबारा नियुक्त कर प्रभारी पद की जिम्मेदारी देने की जरूरत क्यों पड़ी।
सीएमओ की संख्या और कामकाज पर उठे सवाल
आरोप है कि संजय गांधी अस्पताल में 12 से अधिक सीएमओ पदस्थ हैं, लेकिन उनके कामकाज को लेकर असंतोष है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि इनमें से कई सीएमओ मरीजों को देखने और चिकित्सकीय सेवाएं देने के बजाय कार्यालयीन जिम्मेदारियों तक सीमित रहते हैं। यह भी आरोप लगाया गया है कि कुछ सीएमओ की भूमिका मुख्य रूप से कुर्सी पर बैठने और मेडिकल लीगल केस (एमएलसी) से जुड़े कामों तक सीमित है।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि के लिए अस्पताल में पदस्थ सीएमओ की आधिकारिक सूची, उनकी जिम्मेदारियों, ड्यूटी रोस्टर और मरीजों को देखने से संबंधित रिकॉर्ड की जांच जरूरी है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि अस्पताल में सीएमओ के पदों का निर्धारण किस आधार पर किया गया है और प्रत्येक अधिकारी को कौन-कौन से कार्य सौंपे गए हैं। यदि किसी अधिकारी के कामकाज को लेकर शिकायत है, तो उसका मूल्यांकन विभागीय रिकॉर्ड और जांच के आधार पर किया जाना चाहिए।
मरीजों और उनके परिजनों के लिए अस्पताल में उपलब्ध चिकित्सकीय सेवाएं सबसे महत्वपूर्ण होती हैं। ऐसे में यदि अस्पताल में पर्याप्त संख्या में अधिकारी मौजूद होने के बावजूद मरीजों को अपेक्षित सेवाएं नहीं मिल रही हैं, तो यह प्रबंधन के लिए गंभीर समीक्षा का विषय हो सकता है। दूसरी ओर, केवल पदों की संख्या के आधार पर किसी अधिकारी की उपयोगिता या कार्यक्षमता का निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं होगा। इसके लिए वास्तविक कार्यविभाजन और सेवा संबंधी आंकड़ों की जरूरत है।
डॉ. अतुल सिंह की नियुक्ति पर क्यों उठ रहे सवाल?
डॉ. अतुल सिंह की दोबारा नियुक्ति और उन्हें प्रभारी सीएमओ बनाए जाने को लेकर मुख्य सवाल उनके पूर्व कार्यकाल से जुड़े आरोपों के कारण उठाए जा रहे हैं। आरोप लगाने वालों का कहना है कि अस्पताल प्रबंधन को वर्ष 2014 में सामने आए कथित स्टिंग और उससे जुड़ी शिकायत की जानकारी थी। इसके बावजूद उन्हें फिर से अस्पताल में जिम्मेदारी सौंप दी गई।
प्रस्तुत विवरण में दावा किया गया है कि वर्ष 2014 में डॉ. अतुल सिंह को एमएलसी रिपोर्ट बदलने के लिए कथित तौर पर 40 से 45 हजार रुपये मांगने के मामले में कैमरे में रिकॉर्ड किया गया था। उस समय भी वे संजय गांधी अस्पताल में सीएमओ के पद पर पदस्थ थे। आरोप के अनुसार, कथित बातचीत के दौरान उन्होंने पहले कुछ राशि लेने और बाकी रकम बाद में देने की बात कही थी। इस मामले को लेकर शिकायत किए जाने और जांच कमेटी गठित होने का भी उल्लेख किया गया है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि उपलब्ध सामग्री में जांच कमेटी की अंतिम रिपोर्ट, किसी विभागीय दंडात्मक आदेश या न्यायिक निर्णय का विवरण नहीं है। इसलिए कथित स्टिंग और पैसे मांगने के आरोपों को प्रमाणित अपराध या अंतिम रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। मामले की वास्तविक स्थिति जानने के लिए उस समय की शिकायत, जांच रिपोर्ट और विभागीय कार्रवाई का रिकॉर्ड सामने आना आवश्यक है।

आरटीआई कार्यकर्ता संजय सिंह ने क्या बताया?
आरटीआई कार्यकर्ता संजय सिंह के हवाले से वर्ष 2014 की घटना का विवरण दिया गया है। उनके अनुसार, उस समय नयागांव से जुड़ा एक मामला सामने आया था, जिसमें एक व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति को चाकू मार दिया था। बताया गया कि चाकू से घायल व्यक्ति के जख्म गहरे थे और घटना के पीछे संबंधित व्यक्ति की बहन को परेशान किए जाने की बात कही गई थी।
संजय सिंह के मुताबिक, इसी मामले में एमएलसी रिपोर्ट बदलवाने के संबंध में वे पीयूष त्रिपाठी के साथ डॉ. अतुल सिंह से मिले थे। उनके अनुसार, डॉक्टर ने एक पर्ची पर फोन नंबर लिखकर दिया और फोन पर बात करने को कहा। संजय सिंह का दावा है कि 10 फरवरी 2014 को फोन पर बातचीत हुई, जिसमें कथित तौर पर 40 से 45 हजार रुपये की मांग की गई और उन्हें घर बुलाया गया।
संजय सिंह के बयान के मुताबिक, अगले दिन यानी 11 फरवरी को वे पूरी तैयारी के साथ गोड़हर स्थित डॉ. अतुल सिंह के घर पहुंचे। उनका आरोप है कि वहां उनसे 10 से 15 हजार रुपये अग्रिम राशि के रूप में मांगे गए। उनके पास उस समय केवल तीन हजार रुपये थे, जो उन्होंने दे दिए। शेष रकम जल्द देने को कहा गया। संजय सिंह के अनुसार, बातचीत के दौरान यह भी कहा गया कि इस काम में तीन-चार अन्य डॉक्टरों को भी रकम देनी होगी।
यह पूरा घटनाक्रम संजय सिंह के बयान और उपलब्ध कराए गए विवरण पर आधारित है। इस कथित स्टिंग की मूल रिकॉर्डिंग, शिकायत की प्रति और जांच के निष्कर्ष उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए आरोपों की पुष्टि के लिए संबंधित दस्तावेजों का परीक्षण जरूरी है।
जांच और विभागीय कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक करने की मांग
मामले में जांच कमेटी गठित होने की बात कही गई है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि कमेटी ने क्या निष्कर्ष निकाले थे। क्या जांच पूरी हुई थी? क्या किसी अधिकारी या डॉक्टर के खिलाफ कार्रवाई की गई? क्या शिकायत को निराधार माना गया या कोई विभागीय निर्देश जारी हुआ? इन सवालों का जवाब संबंधित विभाग के रिकॉर्ड से ही मिल सकता है।
यदि वर्ष 2014 में दर्ज शिकायत पर जांच हुई थी, तो उसकी रिपोर्ट और कार्रवाई की स्थिति सार्वजनिक किए जाने से वर्तमान नियुक्ति को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब मिल सकता है। इसी तरह डॉ. अतुल सिंह की वर्तमान नियुक्ति के आदेश, पदस्थापना का आधार और प्रभारी सीएमओ बनाए जाने से संबंधित आदेश भी स्पष्टता ला सकते हैं।
अस्पताल प्रबंधन के सामने यह भी महत्वपूर्ण प्रश्न है कि सीएमओ के पदों पर तैनात अधिकारियों के कार्यों का निर्धारण किस प्रकार किया गया है। यदि मरीजों को देखने, एमएलसी प्रक्रिया और अन्य चिकित्सकीय जिम्मेदारियों के निर्वहन में कोई कमी है, तो उसकी पहचान कर सुधारात्मक कदम उठाए जाने चाहिए। शिकायतों की निष्पक्ष जांच और रिकॉर्ड आधारित कार्रवाई से ही अस्पताल के कामकाज को लेकर उठ रहे संदेह दूर हो सकते हैं।
पारदर्शिता से ही दूर होंगे सवाल
संजय गांधी अस्पताल में सीएमओ की संख्या, उनके कामकाज और डॉ. अतुल सिंह की पुनर्नियुक्ति को लेकर उठे सवालों का समाधान आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि दस्तावेजों और स्पष्ट जवाबदेही से संभव है। वर्ष 2014 के कथित स्टिंग और जांच की स्थिति सामने आने से यह पता चल सकेगा कि उस मामले में क्या निष्कर्ष निकले थे। वहीं वर्तमान नियुक्ति और कार्यविभाजन के आदेश सार्वजनिक होने से यह स्पष्ट होगा कि डॉ. अतुल सिंह को किस आधार पर जिम्मेदारी दी गई।
अस्पताल प्रशासन और संबंधित विभाग की ओर से इन मुद्दों पर आधिकारिक पक्ष सामने आना महत्वपूर्ण है। इससे न केवल नियुक्ति और कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब मिलेगा, बल्कि मरीजों को मिलने वाली सेवाओं के मूल्यांकन में भी मदद मिलेगी। फिलहाल उपलब्ध विवरण में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और विभागीय जांच के अंतिम निष्कर्ष शामिल नहीं हैं। ऐसे में पूरे मामले की वास्तविक स्थिति जानने के लिए संबंधित पक्षों का जवाब और आधिकारिक रिकॉर्ड सामने आना जरूरी है।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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