Including the Minister of State : पूर्व माध्यमिक शिक्षा चयन आयोग अध्यक्ष ने जताई जान को खतरे की आशंका, राज्यमंत्री समेत अन्य पर लगाए गंभीर आरोप ?

Including the Minister of State : पूर्व माध्यमिक शिक्षा चयन आयोग अध्यक्ष ने जताई जान को खतरे की आशंका, राज्यमंत्री समेत अन्य पर लगाए गंभीर आरोप ?
Including the Minister of State : पूर्व माध्यमिक शिक्षा चयन आयोग अध्यक्ष ने जताई जान को खतरे की आशंका, राज्यमंत्री समेत अन्य पर लगाए गंभीर आरोप ?

जौनपुर। पूर्व माध्यमिक शिक्षा चयन आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) आशाराम ने 12 सितंबर 2026 को अपने साथ कथित मारपीट की घटना के बाद अपनी जान को खतरा बताते हुए सुरक्षा की चिंता जताई है। उन्होंने 29 सितंबर को जारी प्रेसवार्ता संबंधी पत्र में आरोप लगाया कि घटना के बाद पुलिस को सूचना देने और अधिकारियों से संपर्क करने के बावजूद उनकी शिकायत पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं की गई। पूर्व अध्यक्ष ने पुलिस पर मुकदमा दर्ज न करने और मेडिकल परीक्षण नहीं कराए जाने का भी आरोप लगाया है।

प्रो. आशाराम की ओर से लगाए गए आरोपों में राज्यमंत्री गिरीश चन्द्र यादव समेत कुछ अन्य लोगों का नाम भी सामने आया है। उन्होंने घटना को पूर्व में दर्ज कराए गए मुकदमों से जोड़ते हुए कथित साजिश का आरोप लगाया है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित राज्यमंत्री, अन्य नामित व्यक्तियों तथा पुलिस की ओर से इस मामले में पक्ष सामने आना अभी बाकी है।

मॉर्निंग वॉक के दौरान हमले का आरोप

प्रो. आशाराम के अनुसार, 12 सितंबर 2026 की सुबह करीब छह बजे वह जफराबाद थाना क्षेत्र के एक गांव में मॉर्निंग वॉक के लिए निकले थे। इसी दौरान कथित रूप से एक व्यक्ति ने उन पर हमला कर दिया।

पूर्व अध्यक्ष का आरोप है कि हमलावर ने उनके साथ मारपीट की और उन्हें पूर्व में दर्ज मुकदमा वापस लेने की धमकी दी। उनके अनुसार, घटना के दौरान आसपास मौजूद कुछ लोगों ने हस्तक्षेप किया और बीच-बचाव कर स्थिति को संभाला।

उन्होंने अपने बयान में घटना को गंभीर बताते हुए कहा कि हमले के पीछे पूर्व में दर्ज मुकदमों को लेकर विवाद होने की आशंका है। उनका कहना है कि घटना के बाद उन्होंने पुलिस से शिकायत कर मामले में कार्रवाई की मांग की।

पुलिस पर कार्रवाई न करने का आरोप

प्रो. आशाराम ने आरोप लगाया कि घटना की जानकारी पुलिस को दिए जाने के बावजूद तत्काल अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। उनका कहना है कि उन्होंने जफराबाद थानाध्यक्ष से संपर्क किया और घटना के संबंध में शिकायत दर्ज कराने का प्रयास किया।

पूर्व अध्यक्ष के मुताबिक, जब स्थानीय स्तर पर उन्हें अपेक्षित कार्रवाई नहीं मिली तो उन्होंने पुलिस अधीक्षक और जिलाधिकारी से भी संपर्क किया। उन्होंने दावा किया कि वह दोनों अधिकारियों से दो बार मिलकर अपनी शिकायत और सुरक्षा संबंधी चिंता से अवगत करा चुके हैं।

उनका आरोप है कि इसके बावजूद उनकी शिकायत पर मुकदमा दर्ज नहीं किया गया। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि घटना के बाद उनका मेडिकल परीक्षण नहीं कराया गया। यदि ये आरोप सही हैं तो पुलिस की कार्रवाई और शिकायत निस्तारण की प्रक्रिया पर सवाल उठ सकते हैं। हालांकि, इसकी वास्तविक स्थिति संबंधित पुलिस रिकॉर्ड और अधिकारियों के आधिकारिक बयान से ही स्पष्ट होगी।

पूर्व मुकदमों से जोड़कर साजिश का आरोप

प्रो. आशाराम ने घटना के पीछे कथित साजिश की आशंका जताई है। उन्होंने कहा कि उनके द्वारा पूर्व में कुछ लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज कराए गए थे और इसी पृष्ठभूमि में उनके साथ यह घटना कराए जाने की आशंका है।

उन्होंने प्रेसवार्ता संबंधी पत्र में राज्यमंत्री गिरीश चन्द्र यादव समेत कुछ अन्य लोगों पर घटना के पीछे साजिश में शामिल होने का आरोप लगाया है। उनका दावा है कि पूर्व में दर्ज कराए गए मुकदमों के कारण उनके खिलाफ कथित रूप से यह हमला कराया गया।

हालांकि, किसी व्यक्ति के खिलाफ साजिश या हमले में शामिल होने का आरोप अपने आप में अपराध सिद्ध नहीं करता। ऐसे आरोपों की पुष्टि के लिए पुलिस जांच, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, मेडिकल रिपोर्ट, उपलब्ध वीडियो या अन्य साक्ष्यों की आवश्यकता होगी। संबंधित लोगों का पक्ष भी इस मामले में महत्वपूर्ण रहेगा।

सुरक्षा को लेकर जताई चिंता

पूर्व अध्यक्ष ने अपनी सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि यदि कथित हमले की शिकायत के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं होती है तो भविष्य में उनकी जान को और अधिक खतरा हो सकता है।

उन्होंने आशंका जताई कि ऐसी परिस्थितियों में उनकी हत्या भी की जा सकती है। यह बयान सामने आने के बाद मामला केवल मारपीट की शिकायत तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसमें सुरक्षा का मुद्दा भी जुड़ गया है।

ऐसी स्थिति में पुलिस प्रशासन के सामने शिकायत की निष्पक्ष जांच करने के साथ-साथ संबंधित व्यक्ति की सुरक्षा संबंधी मांग का भी परीक्षण करना महत्वपूर्ण हो जाता है। सुरक्षा उपलब्ध कराने का निर्णय संबंधित अधिकारियों द्वारा खतरे के आकलन और निर्धारित नियमों के आधार पर लिया जाता है।

Including the Minister of State : पूर्व माध्यमिक शिक्षा चयन आयोग अध्यक्ष ने जताई जान को खतरे की आशंका, राज्यमंत्री समेत अन्य पर लगाए गंभीर आरोप ?
Including the Minister of State : पूर्व माध्यमिक शिक्षा चयन आयोग अध्यक्ष ने जताई जान को खतरे की आशंका, राज्यमंत्री समेत अन्य पर लगाए गंभीर आरोप ?

29 सितंबर को जारी किया पत्र

प्रो. आशाराम की ओर से 29 सितंबर 2026 को प्रेसवार्ता संबंधी पत्र जारी किया गया। इसी पत्र के माध्यम से उन्होंने 12 सितंबर की घटना का विवरण सार्वजनिक किया और अपने ऊपर कथित हमले तथा पुलिस की कार्रवाई को लेकर सवाल उठाए।

पत्र में उन्होंने अपने आरोपों और सुरक्षा संबंधी चिंता को सामने रखा। उन्होंने यह भी कहा कि मामले को लेकर वह संबंधित अधिकारियों से संपर्क कर चुके हैं।

पत्र जारी होने के बाद यह मामला स्थानीय स्तर पर चर्चा में आया है। अब इस पूरे प्रकरण में पुलिस प्रशासन की ओर से आधिकारिक स्थिति सामने आने की प्रतीक्षा है।

मेडिकल परीक्षण और मुकदमा दर्ज करने का मुद्दा

प्रो. आशाराम द्वारा लगाए गए आरोपों में दो प्रमुख बिंदु हैं—पहला, कथित हमले के बाद मुकदमा दर्ज नहीं किया जाना और दूसरा, मेडिकल परीक्षण नहीं कराया जाना।

यदि किसी व्यक्ति के साथ मारपीट की शिकायत होती है तो घटना की प्रकृति के अनुसार पुलिस द्वारा शिकायत दर्ज कर जांच की प्रक्रिया शुरू की जाती है। चोटों की स्थिति में मेडिकल परीक्षण भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है। इस मामले में मेडिकल परीक्षण हुआ या नहीं, शिकायत किस स्तर पर लंबित रही और पुलिस ने अब तक क्या कार्रवाई की, यह संबंधित अभिलेखों से स्पष्ट हो सकता है।

इसी तरह, यदि शिकायत में गंभीर आरोप लगाए गए हैं तो पुलिस को आरोपों की जांच कर तथ्यों की पुष्टि करनी होगी। जांच के दौरान घटना के समय मौजूद लोगों के बयान, घटनास्थल की जानकारी और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों की भी जांच की जा सकती है।

राज्यमंत्री और अन्य आरोपित पक्ष का बयान महत्वपूर्ण

मामले में राज्यमंत्री गिरीश चन्द्र यादव समेत अन्य लोगों पर लगाए गए आरोप गंभीर प्रकृति के हैं। ऐसे में जिन लोगों के नाम पूर्व अध्यक्ष ने अपने पत्र में लिए हैं, उनका पक्ष सामने आना जरूरी होगा।

फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर इन लोगों की संलिप्तता की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए आरोपों को आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए। यदि संबंधित पक्ष आरोपों से इनकार करता है या घटना के संबंध में कोई तथ्य सामने रखता है तो वह मामले की पूरी तस्वीर समझने के लिए महत्वपूर्ण होगा।

इसी प्रकार पुलिस प्रशासन की ओर से भी यह स्पष्ट किया जाना अपेक्षित है कि 12 सितंबर की शिकायत के संबंध में क्या कार्रवाई की गई, कोई प्रार्थना पत्र प्राप्त हुआ था या नहीं, मेडिकल परीक्षण क्यों नहीं कराया गया और मुकदमा दर्ज करने के संबंध में क्या स्थिति है।

निष्पक्ष जांच से सामने आएगी वास्तविक स्थिति

पूरे मामले की वास्तविक स्थिति निष्पक्ष जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है। यदि हमला हुआ है तो उसके जिम्मेदार लोगों की पहचान और घटना की परिस्थितियों का पता लगाना जांच का विषय होगा। वहीं यदि साजिश के आरोप लगाए गए हैं तो उनके समर्थन में उपलब्ध साक्ष्यों की भी जांच आवश्यक होगी।

पुलिस प्रशासन के सामने एक ओर पूर्व अध्यक्ष की शिकायत की जांच करने की जिम्मेदारी है, वहीं दूसरी ओर जिन लोगों पर आरोप लगाए गए हैं, उनके अधिकारों और पक्ष को भी जांच में शामिल करना होगा। किसी भी व्यक्ति की दोषसिद्धि केवल आरोपों के आधार पर नहीं बल्कि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही निर्धारित होती है।

फिलहाल प्रो. आशाराम ने अपनी जान को खतरा बताते हुए पुलिस प्रशासन से कार्रवाई और सुरक्षा की मांग से जुड़े सवाल उठाए हैं। 12 सितंबर की कथित घटना से लेकर 29 सितंबर को जारी उनके पत्र तक का घटनाक्रम अब पुलिस कार्रवाई और संबंधित पक्षों के आधिकारिक बयानों पर निर्भर करेगा। मामले में निष्पक्ष जांच और सभी पक्षों के तथ्यों के सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि घटना की वास्तविक परिस्थितियां क्या थीं और लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है।

News Editor- (Jyoti Parjapati)

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