Kolkata : जब तक सूरज चांद रहेगा गोपाल खटीक और पहलवान जुगल चंद तेरा नाम रहेगा, कोलकाता के रखवालों के साहस को नमन ?

Kolkata : जब तक सूरज चांद रहेगा गोपाल खटीक और पहलवान जुगल चंद तेरा नाम रहेगा, कोलकाता के रखवालों के साहस को नमन
Kolkata : जब तक सूरज चांद रहेगा गोपाल खटीक और पहलवान जुगल चंद तेरा नाम रहेगा, कोलकाता के रखवालों के साहस को नमन

उस समय अछूत बिरादरी ने सुहरावर्दी और जिन्ना लीग के दंगाइयों से जमकर बदला लिया और सिर्फ़ एक दिन में ही बाज़ी पलट दी – यही वजह है कि सात दशक के बाद भी देश के लोग उसे नहीं भूले आज भी उन्हें कोलकतार रखकरता यानी कोलकाता के रखवालें कहते हैं।

नई दिल्ली, संजय सिंह। 1946 डायरेक्ट एक्शन डे के उस समय पुलिस में 80% जिन्ना के लोग थे और बाक़ी 20% एलीट क्लास के थे। कलकत्ता के हिंदुओं को न पुलिस से, न तो सरकार से मदद मिल रही थी। ऐसे में, हिंदुओं को बचाने के लिए वे लोग सामने आए जिनसे कलकत्ता का ‘भद्रलोक’ (एलीट क्लास) भयंकर जातिवाद के कारण बहुत घृणा करता था, उन्हें कभी भी मान सम्मान नहीं देता था ऊपर से उन्हें अछूत नीच बोलता था। वे उन्हें अछूत नीच गुंडा मबाली कहके बदनाम करते थे। लेक़िन कठिन समय में ऐसे ही दो देशभक्त गोपाल खटीक और पहलवान जुगल चंद्र थे जिनको इतिहास के झरोखे से आज़ भी उनके ऐतिहासिक साहस को नमन किया जाता हैं।

गोपाल खटीक और पहलवान जुगल चंद्र के ऐतिहासिक साहस को नमन करते हुए मजदूर वर्ग ने बताया कि गोपाल पाठा यानी गोपाल खटीक का नाम गोपाल मुखर्जी नहीं था। गोपाल पाठा खटीक जाति से ताल्लुक रखते थे। उसका नाम गोपाल खटीक था, लेकिन मीट शॉप चलाने की वजह से उसके नाम के आगे ‘पाठा’ जुड़ गया। बंगाली में बकरे को पाठा कहा जाता है। अगर आप कांग्रेसी मानसिकता के तहत गोपाल खटीक को मुखर्जी यानी पंडित साबित करना चाह रहे है, तो यह मत भुलिये पंडित कभी भी जानवर नहीं कटके बेचते। तो दूसरों के कामों का ख़ुद झूठा श्रय लेना बंद कर दीजिए, आधुनिक नए भारत में कांग्रेस के जातिवादी काले कऊओं को अपनी पुरानी बुरी आदतों को अब छोड़ देना चाहिए। क्युकी खटीक जाति के लोगों का कामकाज मांस बेचना है। जो जिस जानवर का मांस बेचते वहीं उनकी जाति के नाम के साथ लग जाता है। जैसे बकरा या पाठा काटके बेचने वाले बकरा खटीक या पाठा और मछली एवं सुअर काटके बेचने वाले सोनकर या पासवान खटीक और मुर्गा काट बेचने वाले मुर्गा या चक खटीक कहलाते हैं। गोपाल खटीक के साथ समाज में नीच समझे जाने वाली अछूत बिरादरी ने डायरेक्ट एक्शन डे की ख़ूनी दिनों में जिन्ना लीग के दंगाइ गुंडों से जमकर बदला लिया। सच्चें वीर गोपाल पर खटीक समाज गर्व‌ करता है। बंगाल ही नहीं, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और राजस्थान में भी वीर गोपाल खटीक की खटीकपाडा (खटीको के मोहल्ले) में कई जगह मुर्ति लगा है, यहां उनको नमन किया जाता हैं। सच्चें वीर गोपाल पर खटीक समाज गर्व‌ करता है।

उन्होंने आगे बताया कि जब पूरा बंगाली ‘भद्रलोक’ डर के मारे अपने घरों में जा छुपा था तब लोगों की चीख पुकार बेशुमार लासे और ख़ूनी मंजर के मची चारों तरफ हाहाकार के समय अछूत बिरादरी के लोगों ने बेबस हिंदुओं की रक्षा और अत्याचारी दंगाइयों से हिसाब चुकता करने का फैसला किया। कलकत्ता की एक बस्ती बेलियाघाट में अखाड़ा चलाने वाले अछूत जुगलचंद्र खुद एक पहलवान थे। बस्ती के युवाओं पर उसकी जबरदस्त धाक थी। दंगों के अगले दिन जब वह कलकत्ते की सड़कों पर निकलें, तो उन्होंने अपने दर्द और गुस्से को कुछ यूं बयां किया कि मैंने बेशुमार लाशें देखीं, हिंदुओं की लाशें। एक जगह चार ट्रक खड़े थे, सभी में कम से कम तीन से पांच फीट ऊंचाई तक लाशें भरी हुई थीं। गुड़ की बोरियों की तरह वो ट्रकों पर लदे पड़े थे और उनसे खून टपक रहा था। इस पूरे दृश्य ने मेरे ऊपर बहुत बुरा असर डाला था।

यह भयानक मंजर देख पहलवान जुगल चन्द ने बेलियाघाट में ऐलान कर दिया कि सभी हिंदुओं की असहनीय हत्या का बदला लिया जाएगा। उसने और उसके लड़कों ने आसपास के पूरे इलाके में दंगाइयों और जिन्ना लीग के गुंडों को ढूंढ ढूंढ के उन्हीं की स्टाइल में बहुत ही दिल दहला देने बाले तरीके से ठिकाने लगाना शुरू कर दिया। लेक़िन छोटे कद के गोपाल खटीक तो जुगल चंद से भी दो कदम आगे निकल गए। जैसे वो रोज़ बकरों को काटते उसी तरह उन्होंने पिछले एक साल से सुहरावर्दी और लीग की बिछाई पूरी बिसात सिर्फ़ एक दिन में उलट दी। अछूत बिरादरी के इस प्रतिकार में गोपाल और पहलवान जुगल चंद्र को स्थानीय पूरबिया (बिहार और यूपी के रहनेवाले) लोहार, मोची, मजदूरों, खलासी और खोमचेवालों का भरपूर साथ मिला। अछूत बिरादरी ने जिन्ना लीग के गुंडों से जमकर बदला लिया और पूरी तरह से सिर्फ़ एक ही दिन में बाज़ी पलट दी। यही वजह है कि सात दशक के बाद भी कलकत्ता के लोग लोग उसे नहीं भूले हैं। आज भी कुछ बंगाली उसे कोलकतार रखकरता यानी कोलकाता के रखवालें कहते हैं।

ब्रिटिश इतिहासकार और ऑक्सफोर्ड में प्रोफेसर ने अछूत गोपाल खटीक के बारे में लिखा है, कलकत्ता के कुछ बड़े पठाओं की तरह गोपाल पाठा की भी धाक थी। सड़कों पर जिन्ना के दंगाई उनसे डरते थे। नौजवान उन्हें बहादुर और बाहुबली जैसे उपनामों से पुकारते थे। जिन्ना लीग द्वारा कराये गए दंगों में उन्होंने कई हज़ार या उससे भी ज्यादा दंगाइयों का सफाया सिर्फ़ एक दिन में ही कर किया था। गोपाल पाठा ने यह सब याद करते हुए उस समय कहा था कि ‘देश के लिये बड़ा ही नाजुक समय हैं, हमने सोचा कि अगर ये पूरा इलाका पाकिस्तान बन गया तो सभी हिन्दुओं के लिए बड़ी मुश्किल होगी। इसीलिए मैंने अपने अछूत बिरादरी के लोगों को बुलाया और कहा कि अब पलटवार करने का समय आ गया है। गोपाल ने इसे अपना राष्ट्रधर्म माना। उनका कहना था कि हम आम रिक्शावालों, खोमचेवालों, औरतों और बच्चों को क्यों मारते? आखिर उनका जिन्ना लीग की ख़ूनी राजनीति से क्या लेना-देना था? हमने तो सिर्फ उन्हें मारा, जिन्होंने हिन्दुओं और बहन बेटियों पर हमला और अमानवीय अत्याचार किये थे हमने सिर्फ़ उन्हें मारा।

नज़ीमुद्दीन ने उस रोज मैदान में ज़हरीली खतरनाक नफ़रती आग बरसाता हुआ भाषण दिया था उसने साफ-साफ कह दिया कि हमारी लड़ाई अंग्रेजों से नहीं, बल्कि सभी हिंदुओं से है। 16 अगस्त 1946 डायरेक्ट एक्शन डे – रमजान का 17वां दिन था जिन्ना लीग के रोज़ा रखे नेताओं ने बहुत ही शातिर तरीके से डायरेक्ट एक्शन डे को बद्र की जंग, जिहाद और काफिरों से जोड़ दिया था। इतना ही नहीं, जिन्ना लीग ने पर्चों के जरिए कलकत्ता जिन्ना लीग के दंगाई और गुंडों को भी सत्ता का ख्वाब दिखाकर अपनी तरफ खींच लिया था। सिर्फ पर्चे और पोस्टर ही नहीं, जिन्ना लीग के अखबार डॉन DAWN के पहले पन्ने पर इसी तरह का विज्ञापन भी छापा गया था। लेकिन कलकत्ता के मैदान में असली आग तो जहरीली एवं नफ़रती जुबान से लगाई जाने वाली थी। दोपहर तीन बजे तक मैदान में करीब 2 लाख जिन्ना के दंगाइयों की भीड़ जमा हो चुकी थी। भीड़ में शामिल ज्यादातर रोजे रखे हुए थे। इस उमस भरी दोपहर में सुबह से भूखे-प्यासे जिन्ना लीग के लोगों को अपने नेताओं के भाषण का इंतजार था। बंगाल लीग के बहुत बड़े नेता ख्वाजा नज़ीमुद्दीन जब मंच पर आए तो उनके नाम के नारे लगने लगे।

उन्होंने उस रोज क्या कहा, यह जानने से पहले आपको पता होना चाहिए कि ख्वाजा नज़ीमुद्दीन कितने बड़े कद के नेता थे। जिन्ना की मौत के बाद उनकी जगह नज़ीमुद्दीन को ही आतंकी पाकिस्तान का दूसरा गवर्नर जनरल बनाया गया था। नज़ीमुद्दीन ने उस रोज मैदान में ज़हरीली खतरनाक नफ़रती आग बरसाता हुआ भाषण दिया था। उन्होंने साफ-साफ कह दिया कि हमारी लड़ाई अंग्रेजों से नहीं, बल्कि सिर्फ़ और सिर्फ़ सभी वर्ग के हिंदुओं से है। नज़ीमुद्दीन के बाद मैदान पर मौजूद 2 लाख की भीड़ अब उस शख्स की बातें सुनने को बेताब थी, जिसे जिन्ना लीग में जिन्ना का सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी माना जाता था और उस शख्स का नाम हुसैन शहीद सुहरावर्दी था। बंगाल का सबसे बडा कसाई – बंगाल के मुख्यमंत्री सुहरावर्दी और जिन्ना में बैरिस्टर होने के अलावा कोई समानता नहीं थी। जिन्ना जहां सफेदपोश राजनीति करता था वहीं सुहरावर्दी के अंदर नफ़रती और फाड़काऊ राजनीति की हर गंदगी कूट-कूटकर भरी थी। हाईकोर्ट जज का यह बेटा भले ही ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से वकालत पढ़कर आया था लेकिन कानून के लिए उसके मन में कत्तई सम्मान नहीं था।

पैसे और सत्ता के लालच के चलते ये अपनों के भी नहीं हुए
उन्होंने बताया कि दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान सुहरावर्दी बंगाल का खाद्य आपूर्ति मंत्री था। इसी दौरान 1943 में बंगाल में भयंकर अकाल पड़ा जिसमें 30 लाख लोगों की भुखमरी के कारण दर्दनाक मौत हुई। सुहरावर्दी इन मौतों के लिए बराबरी से जिम्मेदार था। सुहरावर्दी ने दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान लाखों मछुआरों की नावें इसलिए जलाने का हुक्म दे दिया था कि उसे लगता था कि इन नावों की मदद से जापानी सेना बंगाल तक पहुंच जाएगी। सुहरावर्दी के इस फैसले से बंगाल के इनके अपने लोगों पर दोहरी मार पड़ी। अनाज तो पहले ही खत्म हो चुका था और अब उनके लिए मछली के भी लाले पड़ गए। वायसराय वेवल के अनुसार, अकाल पीड़ितों के लिए जो सरकारी अनाज भेजा जाता था उसे सुहरावर्दी ब्लैक मार्केट में बेच देता था। इस तरह अकाल के कठिन समय में भी में सुहरावर्दी ने जमकर माल काटा था और इसी पैसे के दम पर वह कलकत्ता के सारे जिन्ना लीग के गुंडे-बदमाशों और दंगाइयों से जिन्ना लीग के झंडे के नीचे ग़लत काम करवाता था। 1946 में बंगाल का मुख्यमंत्री बनने के बाद सुहरावर्दी और भी ज्यादा बेलगाम हो गया। जिस कलकत्ता में उसने दाढ़ी बढ़ाकर, मजहब के नाम पर वोट मांगे थे, उसी शहर में उसकी रातें क्लब में कैबरे डांसरों के आगोश में गुजरती थीं। डोमिनिक लैपिएर ने फ्रीडम एट मिडनाइट में लिखा है, सुहरावर्दी कलकत्ता की हर मशहूर कैबरे डांसर और हर हाई प्रोफाइल कॉलगर्ल के साथ हमबिस्तर होना चाहता था। वहीं मशहूर ब्रिटिश पत्रकार लियोनार्ड मोसले ने अपनी मशहूर किताब द लास्ट डेज ऑफ द ब्रिटिश राज में लिखा है, सुहरावर्दी को दौलत, शराब और सुंदर औरतों से प्यार था।

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बाहर से मिलनसार लेकिन अंदर से क्रूर सुहरावर्दी के लिए डायरेक्ट एक्शन डे एक मौका था ताकि वह दुनिया को दिखा सके कि बंगाल के जिन्ना के दंगाई पर उसकी कितनी पकड़ है। जस्टिस जी.डी. खोसला (जिन्होंने बाद में नाथूराम गोडसे को फांसी की सजा सुनाई थी) ने अपनी किताब स्टर्न रेकनिंग में लिखा है कि सुहरावर्दी ने सारी दुनिया को यह दिखाने का फैसला किया था कि अगर अल्पसंख्यक अपनी हिंसा और गुंडागर्दी पर उतर आते हैं तो वह सबकुछ हासिल कर सकते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि उस रोज जब सुहरावर्दी ने मैदान में माइक संभाला तो भीड़ के नारों ने पूरे आसमान को चीरकर रख दिया। इस तरह के मौके को गवां देना सुहरावर्दी की फितरत नहीं थी। उसने अपनी खरखराती आवाज़ में जो कहा, वह किसी भी समझदार के लिए साफ इशारा था – जाइए, आपके इफ्तार का वक्त हो रहा है। मैं ब्रिटिश फौज और पुलिस पर लगाम लगाने की हैसियत रखता हूं। पाकिस्तान बनाने के लिए आपके पास अगले 24 घंटे हैं। फौज और पुलिस में अब सब अपने ही लोग हैं। इस दौरान जो चाहो वो कर लो खुली छूट हैं तुम्हें कोई नहीं रोकेगा।

सुहरावर्दी जब अपना जहरीला भाषण दे रहा था तब इस नजारे को 21 साल के छात्र सैयद नज़ीमुद्दीन हाशिम ने अपनी आंखों से देखा था। कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में पढ़ने वाला यह नौजवान बाद में जाकर 1982 में बांग्लादेश का सूचना मंत्री बना। इस नौजवान ने दंगों का वो नजारा देखा उसका वर्णन हम यहां सेंसर कर रहें हैं, क्योंकि हमारा मकसद दंगों में जिन्ना लीग के दंगाइयों ने उस समय अपना अलग देश पाकिस्तान बनाने के लिए हिंदुओं को कैसे मारा बहन बेटियों पर कैसे कैसे इंसानियत से परे अमानवीय अत्याचार किये वो दृश्य बताने लायक नहीं है। इस दंगों की इंसानियत को शर्मिंदा करने वाली विभीषिका का वर्णन अगर आपको समझना है तो Leonard Mosley की किताब THE LAST DAY OF BRITISH RAJ में मिल जायेगा। भारतीय इतिहास में उन सबसे महत्वपूर्व दिनों में मौजूद था और जो इसने लिखा है। वो हमारे इतिहास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

चलिए दंगों के वर्णन को एडिट करते हुए आगे बढ़ते हैं डायरेक्ट एक्शन डे पर 16 अगस्त की शाम को बंगाल का मुख्यमंत्री सुहरावर्दी पुलिस कंट्रोल रूम पर कब्जा करके बैठ गया था। उसकी पूरी कोशिश था कि हिंदुओं तक कोई भी कैसी भी मदद न पहुंचे। सुहरावर्दी को पता था कि अब हिंदू भी बदला ले सकते हैं, जिसके लिए उसने पहले से ही पूरी तैयारी कर ली थी। जस्टिस जी. डी. खोसला ने लिखा है, सुहरावर्दी पुलिस कंट्रोल रूम में व्यवधान पैदा कर रहा था। उसने आदेश दिया कि हमारे हर धार्मिक स्थल की सुरक्षा का विशेष इंतजाम करते हुए पुलिस का पहरा बैठाया जाए। लेकिन हिंदू मंदिरों की पवित्रता की रक्षा और उनसे जुड़े लोगों की जिंदगी और संपत्ति की सुरक्षा के लिए उसने कुछ नहीं किया। और वो करता भी क्यों उसका मंसूबा तों ख़ूनी अराजकता फैलाना था और जबरई से लाखों निर्दोषों की लाशों पर अपना अलग देश पाकिस्तान बनना था। शाम को जब पेट्रोलिंग के दौरान यूरोपियन इंस्पेक्टर वेड ने मलिक बाजार में लूटपाट करने वाले 8 जिन्ना लीग के दंगाइयों को रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया, तो सुहरावर्दी ने खुद थाने जाकर दंगाइयों को छोड़ने का आदेश दिया। सुहरावर्दी ने कलकत्ता के हिंदुओं को सबक सिखाने के लिए बहुत पहले से ही योजना तैयार कर ली थी।

लीग के सत्ता में आने के बाद बड़े पैमाने पर कलकत्ता पुलिस में पंजाबी गैर हिन्दू और पठानों की भर्ती की गई थी। ये लोग पूरी तरह जिन्ना लीग के वफादार थे। वहीं डायरेक्ट एक्शन डे के पहले सुहरावर्दी ने कलकत्ते के सभी 24 थानों से सभी हिंदू पुलिस अधिकारी हटा दिए थे, इनमें से 22 में अपने इंस्पेक्टर तैनात कर दिए गए थे, वहीं बाकी बचे दो थानों का जिम्मा एंग्लो-इंडियन इंस्पेक्टर पर था। जिन्ना लीग के खास पुलिस अधिकारी शम्स-उद-दोहा को कलकत्ता की डीसीपी की कुर्सी पर बिठा दिया गया था। इन खतरनाक हालात में हिंदू नेताओं ने जब शहर को सेना के हवाले करने की मांग की तो सुहरावर्दी ने एक और चाल चली। 16 अगस्त की रात बंगाल के गवर्नर सर फ्रेडरिक जॉन बरोज़ को शहर के हालात दिखाने के लिए वह अपने साथ लेकर गया। सुहरावर्दी और गवर्नर के काफिले के गंतव्य की जानकारी पहले ही दंगाइयों तक पहुंचा दी जाती थी और वे छुप जाते थे। काफिले के आगे निकलते ही एक बार फिर दंगा-फसाद शुरू हो जाता था। सुहरावर्दी ने गवर्नर बरोज़ को भरोसा दिला दिया कि शहर के हालात इतने खराब नहीं है, जितने बताये जा रहे हैं। इसीलिए जब राज्य के चीफ सेक्रेटरी ने गवर्नर बरोज़ को सेना बुलाने का सुझाव दिया तो बरोज़ ने कहा कि जब तक सुहरावर्दी की सरकार इसकी मांग नहीं करेगी, सेना को नहीं बुलाया जा सकता।

हिंदुओं के इस प्रतिकार में गोपाल पाठा और जुगल चंद्र को स्थानीय पूरबिया ( बिहार और यूपी के रहने वाले ) लोहार, मोची, मजदूरों, खलासी और खोमचे वालों का ऐसे कठिन समय में भरपूर साथ दिया और देखते ही देखते गोपाल पाठा और जुगल चंद्र इतने ताकतवर बन गए कि जब ख़ुद अहिंसा के पुजारी गांधी कलकत्ता आए, तो इन दोनों से मिले और इन दोनों के बीच मुलाकात में अहिंसा के पुजारी ने दोनों से जिन्ना लीग के दंगाइयों को ना मारने और अपने हथियार डालकर अहिंसा पर चलने पर जोर देते हुए आगे ऐसी बाते कही की हम उन्हें दोहरा भी नहीं सकते और बता भी नहीं सकते, इसलिए आगे बढ़ते हैं। अछूत विरादरी की इस जबरदस्त प्रतिक्रिया को देखकर सुहरावर्दी ने 17 अगस्त की शाम गवर्नर के सामने सेना बुलाने की सिफारिश कर दी। ब्रिटिश फौज की इस्टर्न कमांड की एक टुकड़ी शहर में ही मौजूद थी, उसने अब सड़कों पर मोर्चा संभाल लिया था। फिर भी अगले तीन दिनों तक कलकत्ता में हिंसा नहीं रुकी, इनमें से कई जगहों पर हिंदू भारी पड़ रहे थे।

जिन्ना लीग के दंगाई जब तक कत्लेआम मचा रहे थे तब तक तो जिन्ना चुप रहे, लेकिन जैसे ही बाजी पलटी तो जिन्ना ने भी अपनी जेब से जन्मजात झूठी चालाकी दिखाते हुए तुरन्त विक्टिम कार्ड निकाल लिया। उन्होंने 17 अगस्त को एसोसिएटेड प्रेस को दिए एक इंटरव्यू में इन दंगों के लिए लीग के दुश्मनों को जिम्मेदार ठहराया। जिन्ना की तरह ही सोचने वाले और भी लोग थे। इन्हीं में से एक था कलकत्ता के इस्लामिया कॉलेज में पढ़ने वाला एक पतल दुबला लंबा नौजवान, जिसका नाम मुजीब था। यह लड़का मुस्लिम लीग की यूथ विंग का नेता था। डायरेक्ट एक्शन डे को सफल बनाने में इसने भी खूब मेहनत की थी। अब जिन्ना लीग ने उसकी ड्यूटी दंगों से पीड़ित दंगाइयों और उनके परिवारों की मदद के लिए लगा दी थी। जब उसने एक अस्पताल में सैकड़ों दंगाइयों की लाशें और घायलों को देखा तो वह अंदर से हिल गया। इसके बाद मुजीब ने मौके पर मौजूद सैयद नज़ीमुद्दीन हाशिम से कहा, मैदान में पहले हिंदुओं ने हमारे लोगों की रैली पर हमला किया था, जिसके बाद दंगे भड़के? नज़ीमुद्दीन ने जवाब दिया, “तुम्हें क्या लगता है कि जहां 2 लाख की भीड़ जमा हो, वहां कोई हिंदू उन पर हमला कर सकता है? अपने एक इंटरव्यू में नज़ीमुद्दीन ने बताया कि उनका यह जवाब मुजीब को कुछ खास पसंद नहीं आया। मुजीब नाम का यह नौजवान बाद में जाकर 1971 में बांग्लादेश का जनक, उसका राष्ट्रपिता, ‘बंग-बंधु’ शेख मुजीब-उर-रहमान बना, जिनकी बेटी शेख हसीना बांग्लादेश की प्रधानमंत्री थी।

उधर अछूत बिरादरी ने सिर्फ़ तीन दिन के अंदर ही सुहरावर्दी और जिन्ना लीग की सारी हेकड़ी निकल दी
18 अगस्त की रात जब वह पुलिस कंट्रोल रूम पहुंचे तो उन्होंने देखा कि इस बार हिंदू नहीं, बल्कि जिन्ना के गुंडे और दंगाई रोते और चीखते हुए पुलिस को फोन लगा लगा कर मदद की गुहार कर रहे हैं। वायरलैस सेट पर भी उल्टा जिन्ना के दंगाइयों की बस्तियों के जलने की लगातार खबरें आ रही थीं। यह देखकर सुहरावर्दी और जिन्ना के होश फाख्ता हो गए और काँपते पैरे से धडाम से कुर्सी पर बैठ गए। आसपास मौजूद लोग इतने ताकतबर आदमी की डर से पतली हालत देख दंग रह गए। पूर्व आइसीएस अधिकारी अशोक ने बताया था कि उस दिन लाल बाज़ार के पुलिस कंट्रोल रूम में सुहरावर्दी बुदबुदाते हुए खुद से बोल रहा था, उफ मेरे बेचारे बेगुनाह भाइयों। इस घटना से उधर दिल्ली में सरदार पटेल और डॉ अम्बेडकर भी जान गये कि अछूत बिरादरी ने जिन्ना और सुहरावर्दी का दांव उल्टा पड़ गया है। उन्हें इस बात का अहसास था कि दंगे खत्म होते-होते अछूत हिंदुओं ने जिन्ना लीग के गुंडों को अच्छा सबक सिखाया है। हालांकि यह बात उन्होंने सार्वजनिक तौर पर तो नहीं की, लेकिन राज गोपालाचारी को 21 अगस्त, 1946 को लिखे एक पत्र में उन्होने अपनी यही भावनाएं प्रकट की थीं। उन्होंने लिखा, ये जिन्ना लीग के लिए एक अच्छा सबक होगा। क्योंकि मैंने सुना है कि बहुत बड़ी तादाद में जिन्ना लीग की आबादी को अचानक मौत का सामना करना पड़ा है।

बस इन्सान, इंसानियत और दंगाइयों में यही फर्क होता है।
आखिर में उन्होंने कहा कि दंगाइयों और इंसानों में एक बेसिक फर्क है। इंसान हर बुराई के खिलाफ बोलता है, लेकिन दंगाई सिर्फ तब बोलता है जब उसके साथ या फिर जब उसके गुनाहों की सजा उसे किसी दूसरे मुल्क में दूसरी हूकूमत में मिलती है। दरअसल दंगाइयों की पूरी तारीख ऐसे मामलों से भरी हुई है, जिसपर दंगाई बिलकुल मुंहबंद रखते हैं। वो सिर्फ कहने भर को शांति कि बात करते है, दंगाई सिर्फ दिखाबे को अमन के अलंबरदार है, लेक़िन मौका मिलते ही पीछे से धोखे से वार करते हैं। इतिहास गवाह हैं इन्होने अब तक करोड़ों निर्दोष जिंदगीयों को लूटा और संसाधनों को जलाकर अमानवीय और इंसानियत से परे जाकर ख़ूनी खेल को अंजाम दिया हैं। आज के मार्डन जमाने की किताबों जैसे ह्यूग कैनेडी की – द आर्मीज ऑफ द कलीफेट्स से साबित होता है, जिसे शक हो पढले। जिनमें तमाम बातें लिखी हुई है‌ कि दंगाई समय समय सत्ता के लिए और दूसरे कि सत्ता का तख्ता पलट के लिए दंगा करते रहें। बस इन्सान, इंसानियत और दंगाइयों में यही फर्क होता है।

लेक़िन करोड़ों निर्दोषों लोगों के साथ कत्लेआम और आगजनी करने के बाद निर्दोष लोगों के खून से कलंकित और मासूमों के ख़ून से सापित जमीन पर ज़ोर जबरई से पाकिस्तान और बंगलादेश बनाया हैं। आखिर मिला क्या? अबतक मारे गए करोड़ों निर्दोष की चिखों और बद्दुओं से दंगाइयों को हासिल हुआ भीख का कटोरा और भुखमरी, साथ में पूरी दुनियां में ख़ुद फटने एवं धमाका करने की जिल्ल्त? क्या सफ़ेद झूठ बोलना, ज़रूरत से ज्यादा चालाकी करना, मनमानी करना, क़ानून का पालन ना करना, जिस काम की मनाही हैं उसे ही करना, धोखा देना, बेईमानी करना, चोरी चकारी करना, लड़ाई झगड़ा करना, जिस थाली में खाना उसी में छेद करना, पत्थर फेकना, बम्ब फेकना, धोखे से पीछे हमला करना, कब्ज़ा करना, आतंकबाद फैलाना और निर्दोषों को अपनी सनक के लिए मारना – आज़ पूरी दुनियां में इनकी यही शाही पहचान बन गई हैं। आखिर यही ज़िल्ल्त हासिल करने के लिए ही करोड़ों निर्दोषों का कत्लेआम किया ?

News Editor- (Jyoti Parjapati)

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