
श्रद्धालुओं की जान इतनी सस्ती क्यों? 17 वर्षों में 15 हेलीकॉप्टर हादसे, 46 से अधिक मौतें… चारधाम यात्रा की हवाई सुरक्षा पर गंभीर सवाल; यूकाडा की जवाबदेही तय करने की उठी मांग सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव कुमार सिंह ने उठाए तीखे सवाल, बोले- आस्था के नाम पर श्रद्धालुओं की जिंदगी से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं; हादसों की निष्पक्ष जांच के साथ जिम्मेदार अधिकारियों और संस्थाओं की जवाबदेही भी हो तय आखिर कब तक हादसों के बाद जागेगा तंत्र? कब तय होगी जिम्मेदारी? और कब श्रद्धालु निश्चिंत होकर चारधाम की यात्रा कर सकेंगे? ये सवाल आज हर उस परिवार की चिंता हैं, जो अपने प्रियजनों को देवभूमि के दर्शन के लिए भेजता है। अब समय आ गया है कि चारधाम की हवाई सेवाओं में सुविधा और व्यावसायिक हितों से ऊपर मानव जीवन को रखा जाए। क्योंकि श्रद्धा अनमोल है, लेकिन श्रद्धालु का जीवन उससे भी अधिक अनमोल है।
नई दिल्ली। हाल ही में बदरीनाथ में हुई हेलीकॉप्टर दुर्घटना ने एक बार फिर हवाई सुरक्षा व्यवस्था की गंभीरता को सामने ला दिया है। एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट औऱ कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता एवं लोकसभा चुनाव 2029 के उम्मीदवार संजीव कुमार सिंह ने चारधाम यात्रा के दौरान हेलीकॉप्टर दुर्घटनाओं और उत्तराखंड नागरिक उड्डयन विकास प्राधिकरण (यूकाडा) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि देवभूमि उत्तराखंड की पवित्र चारधाम यात्रा श्रद्धा, विश्वास और आस्था का प्रतीक है, लेकिन इसी यात्रा के दौरान लगातार सामने आ रहे हेलीकॉप्टर हादसे अब एक बेहद गंभीर सवाल खड़ा कर रहे हैं आखिर श्रद्धालुओं की जान इतनी सस्ती क्यों? पिछले 17 वर्षों में चारधाम यात्रा के दौरान करीब 15 हेलीकॉप्टर दुर्घटनाओं में 46 से अधिक लोगों की जान जाने के आंकड़े किसी भी संवेदनशील व्यवस्था को झकझोरने के लिए पर्याप्त हैं। इसके बावजूद यदि हर हादसे के बाद जांच के आदेश देकर मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही का नहीं, बल्कि जवाबदेही के पूरे तंत्र का प्रश्न है।
संजीव कुमार सिंह ने आगे कहा कि धार्मिक आस्था के साथ आने वाले श्रद्धालुओं की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। हेलीकॉप्टर सेवा बुजुर्गों, महिलाओं और उन श्रद्धालुओं के लिए बड़ी राहत है, जो दुर्गम पहाड़ी रास्तों से यात्रा करने में असमर्थ हैं। लेकिन जब यही सुविधा बार-बार जानलेवा हादसों की आशंका से घिरने लगे, तो पूरी व्यवस्था की समीक्षा अनिवार्य हो जाती है। उन्होंने कहा कि चारधाम यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड के पर्यटन, अर्थव्यवस्था और हजारों लोगों की आजीविका से भी जुड़ी है। ऐसे महत्वपूर्ण आयोजन में सुरक्षा मानकों के साथ किसी भी स्तर पर समझौता नहीं किया जा सकता। श्रद्धालु भगवान के दर्शन की आस्था लेकर आते हैं, न कि अपनी जान जोखिम में डालने के लिए।
मौसम की अनदेखी या सुरक्षा व्यवस्था में खामी?
संजीव कुमार सिंह ने कहा कि उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में मौसम बेहद तेजी से बदलता है। कुछ ही मिनटों में घने बादल, तेज हवाएं, घाटियों में धुंध और कम दृश्यता उड़ान के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है। ऐसे संवेदनशील हवाई मार्गों पर केवल सामान्य मौसम पूर्वानुमान के आधार पर उड़ानों की अनुमति देना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए स्थानीय मौसम की वास्तविक स्थिति का वैज्ञानिक विश्लेषण, तकनीकी विशेषज्ञों की राय और हर उड़ान से पहले सुरक्षा संबंधी ठोस आकलन जरूरी है। उन्होंने सवाल उठाया कि खराब मौसम के बावजूद उड़ानें शुरू करने या रोकने का निर्णय आखिर किस तकनीकी आधार पर लिया जाता है? क्या यूकाडा के पास मौसम की जटिल परिस्थितियों का वैज्ञानिक विश्लेषण करने के लिए पर्याप्त विशेषज्ञ, आधुनिक संसाधन और प्रभावी निगरानी व्यवस्था उपलब्ध है? क्या उड़ान संचालन से पहले मौसम संबंधी सूचनाओं का स्वतंत्र सत्यापन किया जाता है? यदि ऐसा नहीं है, तो श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने का जिम्मा आखिर किसके भरोसे है?
बदरीनाथ हादसे के बाद निर्णय प्रक्रिया पर उठे सवाल
संजीव कुमार सिंह ने दुर्घटना वाले दिन उड़ान संचालन रोकने और कुछ समय बाद दोबारा शुरू करने के निर्णय पर विशेष सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जब मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों को देखते हुए उड़ानें रोकी गई थीं, तो ऐसी कौन-सी परिस्थितियां बदलीं, जिनके आधार पर फिर से उड़ान संचालन की अनुमति दे दी गई? विशेष रूप से ऑरेंज अलर्ट की स्थिति में यह जानना जरूरी है कि क्या मौसम का दोबारा तकनीकी परीक्षण किया गया था? क्या सक्षम विशेषज्ञों ने उड़ान के लिए परिस्थितियों को सुरक्षित घोषित किया था? क्या पायलटों को मौसम की अद्यतन और प्रमाणिक जानकारी उपलब्ध कराई गई थी? यदि हां, तो उस समय की मौसम रिपोर्ट, तकनीकी आकलन और उड़ान बहाली से जुड़े निर्णयों को जांच के दायरे में क्यों नहीं लाया जाना चाहिए?

जांच केवल हादसे का कारण नहीं, जवाबदेही भी तलाशे
संजीव कुमार सिंह ने मुख्यमंत्री द्वारा बदरीनाथ हेलीकॉप्टर दुर्घटना की जांच के आदेश को स्वागतयोग्य कदम बताया, लेकिन साथ ही स्पष्ट किया कि जांच केवल दुर्घटना के तात्कालिक कारणों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि उड़ान की अनुमति देने से पहले सभी सुरक्षा मानकों का पालन हुआ था या नहीं, मौसम संबंधी चेतावनियों को कितनी गंभीरता से लिया गया और उड़ान संचालन दोबारा शुरू करने का निर्णय किन तथ्यों और विशेषज्ञों की राय पर आधारित था। उन्होंने जोर दिया कि दुर्घटना की निष्पक्ष जांच में यूकाडा, संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों, विमानन संचालकों और निर्णय प्रक्रिया से जुड़े सभी जिम्मेदार पक्षों की भूमिका की पड़ताल होनी चाहिए। यदि किसी स्तर पर लापरवाही, नियमों की अनदेखी या सुरक्षा मानकों से समझौता सामने आता है, तो जिम्मेदारी तय कर नियमानुसार कार्रवाई भी होनी चाहिए।
आस्था से बड़ा कोई कारोबार नहीं, श्रद्धालुओं की सुरक्षा सर्वोपरि
संजीव कुमार सिंह का कहना है कि उड़ान रोकना कोई प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि सैकड़ों जिंदगियों की सुरक्षा से जुड़ा निर्णय है। इसी तरह प्रतिकूल परिस्थितियों में उड़ान दोबारा शुरू करना भी उतनी ही गंभीर जिम्मेदारी है। इसलिए प्रत्येक निर्णय पारदर्शी, वैज्ञानिक और जवाबदेह प्रक्रिया के तहत लिया जाना चाहिए। चारधाम यात्रा की गरिमा और उत्तराखंड की प्रतिष्ठा तभी सुरक्षित रह सकती है, जब श्रद्धालुओं की सुरक्षा को सर्वोच्च स्थान मिले। हादसों के बाद केवल शोक संवेदनाएं, जांच के आदेश और औपचारिक बयान पर्याप्त नहीं हैं। जरूरत ऐसी स्थायी और प्रभावी व्यवस्था की है, जो दुर्घटनाओं को रोक सके और लापरवाही करने वालों की जवाबदेही सुनिश्चित करे।
उन्होंने कहा कि आखिर कब तक हादसों के बाद जागेगा तंत्र? कब तय होगी जिम्मेदारी? और कब श्रद्धालु निश्चिंत होकर चारधाम की यात्रा कर सकेंगे? ये सवाल आज हर उस परिवार की चिंता हैं, जो अपने प्रियजनों को देवभूमि के दर्शन के लिए भेजता है। अब समय आ गया है कि चारधाम की हवाई सेवाओं में सुविधा और व्यावसायिक हितों से ऊपर मानव जीवन को रखा जाए। क्योंकि श्रद्धा अनमोल है, लेकिन श्रद्धालु का जीवन उससे भी अधिक अनमोल है।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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