Maa Mundeshwari Temple : पर्यटन की नजर से खास है बिहार का मां मुंडेश्वरी मंदिर, रहस्य, इतिहास और आस्था खींच लाते हैं सैलान

बिहार का कैमूर जिला केवल ऐतिहासिक धरोहरों के लिए ही नहीं,
- बल्कि धार्मिक और आध्यात्मिक पर्यटन के लिए भी तेजी से पहचाना जा रहा है। इसी क्षेत्र में स्थित मां मुंडेश्वरी का प्राचीन मंदिर आज एक प्रमुख पर्यटन केंद्र के रूप में उभर चुका है। यहां आने वाले पर्यटकों में केवल श्रद्धालु ही नहीं, बल्कि इतिहास, रहस्य और संस्कृति में रुचि रखने वाले लोग भी शामिल होते हैं। बिना रक्तपात की अनोखी बलि परंपरा, हजारों साल पुराना इतिहास और पहाड़ी की चोटी पर स्थित मंदिर का प्राकृतिक सौंदर्य—ये सभी कारण इसे पर्यटन की दृष्टि से बेहद खास बनाते हैं। ऐतिहासिक विरासत
- जो पर्यटकों को आकर्षित करती है
मां मुंडेश्वरी मंदिर को भारत के सबसे पुराने जीवित मंदिरों में गिना जाता है। माना जाता है कि इसका अस्तित्व लगभग 635 ईसा पूर्व से जुड़ा हुआ है। इतनी प्राचीन धार्मिक संरचना को आज भी सक्रिय पूजा स्थल के रूप में देखना पर्यटकों के लिए एक दुर्लभ अनुभव होता है। इतिहास प्रेमियों के लिए यह मंदिर उस कालखंड की वास्तुकला और धार्मिक परंपराओं को समझने का अवसर देता है, जब भारतीय सभ्यता अपने प्रारंभिक चरण में थी।
- मंदिर की संरचना और देवी-देवताओं की मान्यता
मंदिर के गर्भगृह में मां मुंडेश्वरी वराह रूप में विराजमान हैं, जो इसे अन्य शक्ति-पीठों से अलग पहचान देता है। गर्भगृह के मध्य भाग में चौमुखी शिवलिंग स्थापित है, जिसे मंदिर की सबसे बड़ी विशेषताओं में माना जाता है। स्थानीय श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यह शिवलिंग दिन में अलग-अलग समय पर अपना रंग बदलता है, जिसे देवी-देवताओं की दिव्य उपस्थिति का संकेत माना जाता है।
- बिना रक्तपात की अनोखी बलि प्रथा
मां मुंडेश्वरी मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा यहां दी जाने वाली अहिंसक या रक्तहीन बलि है। श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने की कामना से बकरा लेकर मंदिर पहुंचते हैं। पूजा के दौरान पुजारी मंत्रोच्चार के साथ अक्षत और फूल को बकरे के शरीर से स्पर्श कराते हैं। मान्यता है कि इसके बाद बकरा कुछ समय के लिए मूर्छित हो जाता है और इसी अवस्था को बलि स्वीकार किए जाने का प्रतीक माना जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में न तो किसी प्रकार का रक्त बहता है और न ही जीव को कोई स्थायी नुकसान पहुंचाया जाता है। यही कारण है कि यह परंपरा आज भी अहिंसा के सिद्धांत के अनुरूप मानी जाती है।
- भोग, आस्था और भक्तों की मान्यताएँ
मां मुंडेश्वरी को अर्पित किया जाने वाला भोग भी इस मंदिर की विशेष पहचान है। यहां देवी को तांडूल, यानी घी में पकाए गए चावल, का भोग लगाया जाता है। भक्तों का विश्वास है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना माता अवश्य स्वीकार करती हैं। हर दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु देश के अलग-अलग हिस्सों से यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
- बेहतरीन अष्टकोणीय संरचना
इस मंदिर का आर्किटेक्चरल डिजाइन भी इसे बेहद विशेष बनाता है। दरअसल, मंदिर में एक असामान्य अष्टकोणीय आकृति है, जो भारतीय मंदिर वास्तुकला में अमूमन देखने को नहीं मिलती है। यह डिज़ाइन न केवल इसकी विशिष्टता को बढ़ाता है बल्कि उस समय के उन्नत वास्तुशिल्प ज्ञान को भी दर्शाता है।
- दो देवताओं को समर्पित मंदिर
मुंडेश्वरी मंदिर में भगवान शिव और शक्ति दोनों की पूजा की जाती है। यहां पर देवी को मुंडेश्वरी देवी के रूप में दर्शाया गया है। वह देवी दुर्गा का ही एक रूप हैं। इसके अलावा, मंदिर में गणेश, विष्णु और सूर्य आदि देवताओं की मूर्तियां भी हैं, जिनकी लोग पूजा करते हैं।
- एएसआई संरक्षित मंदिर
इस मंदिर की एक विशेषता यह भी है कि एएसआई यानी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने मुंडेश्वरी मंदिर को संरक्षित स्मारक के रूप में सूचीबद्ध किया है। दुनिया की सबसे प्राचीन संरचनाओं में से एक होने के कारण इसकी महत्ता कई गुना बढ़ जाती है। इसकी संरचना और कलाकृति को संरक्षित करने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।

525 सीढ़ियों की आस्था भरी यात्रा
- मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को लगभग 525 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। यह कठिन यात्रा भक्तों की आस्था और विश्वास की परीक्षा मानी जाती है। पहाड़ी की चोटी पर स्थित मंदिर से आसपास का दृश्य भी अत्यंत मनमोहक दिखाई देता है, जो इस धार्मिक यात्रा को और भी खास बना देता है।
- धार्मिक पर्यटन के साथ आध्यात्मिक अनुभव
यह मंदिर एक महत्वपूर्ण शक्ति-पीठ के रूप में भी जाना जाता है। यहां देवी मुंडेश्वरी वराह रूप में विराजमान हैं, जबकि गर्भगृह के मध्य भाग में स्थापित चौमुखी शिवलिंग मंदिर को विशेष धार्मिक महत्व देता है। पर्यटक और श्रद्धालु दोनों ही इस अद्वितीय संगम को देखने के लिए यहां आते हैं। मान्यताओं के अनुसार शिवलिंग का रंग बदलना एक दिव्य संकेत माना जाता है, जिसे देखने की इच्छा कई लोगों को इस मंदिर तक खींच लाती है।
- प्राकृतिक सौंदर्य और पहाड़ी यात्रा का रोमांच
मां मुंडेश्वरी मंदिर पवरा पहाड़ी की चोटी पर स्थित है, जहां तक पहुंचने के लिए करीब 525 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। यह यात्रा अपने आप में एक अलग अनुभव है। रास्ते में पहाड़ियों, हरियाली और ऊंचाई से दिखाई देने वाला प्राकृतिक दृश्य पर्यटकों को रोमांच और शांति दोनों का एहसास कराता है। यही कारण है कि यह स्थान धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ नेचर टूरिज्म में रुचि रखने वालों को भी पसंद आता है।
- स्थानीय संस्कृति और परंपराओं से जुड़ने का अवसर
यहां आने वाले पर्यटक केवल मंदिर दर्शन तक सीमित नहीं रहते, बल्कि आसपास के ग्रामीण जीवन, स्थानीय मान्यताओं और परंपराओं को भी करीब से देखते हैं। मंदिर में चढ़ाया जाने वाला तांडूल भोग, पूजा की विधि और सदियों से चली आ रही परंपराएं सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देती हैं।
कुल मिलाकर, मां मुंडेश्वरी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि इतिहास, रहस्य, आध्यात्म और प्रकृति का संगम है। यही वजह है कि यह मंदिर बिहार के उन पर्यटन स्थलों में शामिल होता जा रहा है, जहां पर्यटक आस्था के साथ-साथ एक अनोखा और यादगार अनुभव लेकर लौटते हैं।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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