Man’s growing anxiety : सोने की चमक फीकी, कर्ज़ की उम्मीदें धुंधली: सख्त होते गोल्ड लोन नियम और आम आदमी की बढ़ती चिंता ?

Man’s growing anxiety : सोने की चमक फीकी, कर्ज़ की उम्मीदें धुंधली: सख्त होते गोल्ड लोन नियम और आम आदमी की बढ़ती चिंता

Man's growing anxiety : सोने की चमक फीकी, कर्ज़ की उम्मीदें धुंधली: सख्त होते गोल्ड लोन नियम और आम आदमी की बढ़ती चिंता ?
Man’s growing anxiety : सोने की चमक फीकी, कर्ज़ की उम्मीदें धुंधली: सख्त होते गोल्ड लोन नियम और आम आदमी की बढ़ती चिंता ?

महंगाई के इस दौर में जब रोजमर्रा की जरूरतें लगातार महंगी होती जा रही हैं, तब आम आदमी के लिए कर्ज़ लेना मजबूरी बनता जा रहा है। ऐसे समय में गोल्ड लोन वर्षों से एक भरोसेमंद सहारे के रूप में देखा जाता रहा है। शादी-ब्याह का खर्च हो, इलाज की आपात जरूरत हो या फिर छोटे कारोबार को संभालने के लिए पूंजी—सोना गिरवी रखकर तुरंत नकद मिल जाना लाखों परिवारों के लिए राहत का जरिया रहा है। लेकिन अब यही राहत धीरे-धीरे कमजोर पड़ती नजर आ रही है।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की चेतावनी और निगरानी के बाद बैंकों और नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) ने गोल्ड लोन के नियम सख्त कर दिए हैं। सोने की कीमतों में लगातार हो रहे उतार-चढ़ाव और वित्तीय जोखिम को देखते हुए अब सोने के बदले मिलने वाली लोन राशि घटा दी गई है। जहां पहले सोने की बाजार कीमत का करीब 70 से 72 प्रतिशत तक लोन मिल जाया करता था, अब यह सीमा सिमटकर लगभग 60 से 65 प्रतिशत तक रह गई है। इसका सीधा असर उन लोगों पर पड़ रहा है, जो जरूरत के वक्त गोल्ड लोन को आखिरी और सुरक्षित विकल्प मानते थे।

गोल्ड लोन क्यों रहा है आम आदमी का भरोसा

भारत में सोना सिर्फ आभूषण नहीं, बल्कि एक भावनात्मक और आर्थिक सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी मध्यम वर्ग तक, सोना संकट के समय नकदी का सबसे आसान साधन रहा है। गोल्ड लोन की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसमें लंबी कागजी प्रक्रिया नहीं होती थी। न आय प्रमाण पत्र की सख्ती, न क्रेडिट स्कोर की बड़ी बाधा—बस सोना गिरवी रखिए और कुछ ही घंटों में पैसा मिल जाता था।

यही वजह है कि किसान, छोटे दुकानदार, दिहाड़ी मजदूर और मध्यम वर्ग के परिवार गोल्ड लोन की ओर सबसे पहले रुख करते रहे हैं। खासकर तब, जब पर्सनल लोन महंगे हों और बैंक अन्य कर्ज़ देने में हिचकिचाएं।

नियम सख्त होने की वजह क्या है

आरबीआई लंबे समय से गोल्ड लोन सेक्टर पर नजर बनाए हुए है। हाल के वर्षों में गोल्ड लोन का बाजार तेजी से बढ़ा है, खासकर एनबीएफसी के जरिए। इसके साथ ही जोखिम भी बढ़ा है। सोने की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ी होती हैं और इनमें तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है। अगर सोने की कीमत अचानक गिरती है, तो बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए जोखिम बढ़ जाता है।

इसी जोखिम को नियंत्रित करने के लिए लोन-टू-वैल्यू (LTV) अनुपात को कम किया गया है। यानी अब ग्राहक को अपने सोने की कीमत के मुकाबले कम पैसा मिलेगा, ताकि कीमत गिरने की स्थिति में संस्थानों को नुकसान न उठाना पड़े। बैंकिंग सिस्टम की स्थिरता के लिहाज से यह फैसला तर्कसंगत माना जा सकता है, लेकिन इसका दूसरा पहलू आम आदमी के लिए काफी परेशान करने वाला है।

आम ग्राहक पर सीधा असर

नियम सख्त होने का सबसे बड़ा असर उस ग्राहक पर पड़ता है, जो पहले अपने सीमित सोने के बदले ज्यादा रकम जुटा पाता था। मान लीजिए किसी परिवार के पास 10 ग्राम सोना है। पहले उसकी कीमत के आधार पर उन्हें अपेक्षाकृत ज्यादा लोन मिल जाता था, जिससे उनकी जरूरत पूरी हो जाती थी। अब उसी सोने पर मिलने वाली रकम कम हो गई है, जबकि जरूरत और महंगाई दोनों बढ़ चुकी हैं।

इलाज जैसे मामलों में, जहां समय और रकम दोनों बेहद अहम होते हैं, यह कमी बड़ी मुश्किल खड़ी कर सकती है। शादी-ब्याह या शिक्षा के खर्च में भी अब लोगों को या तो अतिरिक्त सोना गिरवी रखना पड़ेगा या फिर किसी और महंगे कर्ज़ की ओर जाना होगा।

Man's growing anxiety : सोने की चमक फीकी, कर्ज़ की उम्मीदें धुंधली: सख्त होते गोल्ड लोन नियम और आम आदमी की बढ़ती चिंता ?
Man’s growing anxiety : सोने की चमक फीकी, कर्ज़ की उम्मीदें धुंधली: सख्त होते गोल्ड लोन नियम और आम आदमी की बढ़ती चिंता ?

क्या बैंक सही हैं, या बोझ आम आदमी पर?

बैंकों और एनबीएफसी का तर्क अपनी जगह सही है। वे कहते हैं कि वित्तीय अनुशासन और जोखिम प्रबंधन के लिए यह कदम जरूरी था। अगर लोन ज्यादा और सोने की कीमत कम हो जाए, तो सिस्टम पर दबाव बढ़ सकता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि इस संतुलन की कीमत आखिर कौन चुका रहा है?

हकीकत यह है कि आम आदमी के पास विकल्प सीमित हैं। पर्सनल लोन की ब्याज दरें ऊंची हैं, क्रेडिट कार्ड का कर्ज़ और भी महंगा पड़ता है, और साहूकारों से लिया गया कर्ज़ तो अक्सर कर्ज़ के जाल में फंसा देता है। ऐसे में गोल्ड लोन का कमजोर होना आम आदमी के लिए दोहरी मार जैसा है—एक तरफ महंगाई, दूसरी तरफ कर्ज़ के रास्ते सिमटते हुए।

छोटे कारोबार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर

गोल्ड लोन का इस्तेमाल सिर्फ घरेलू जरूरतों तक सीमित नहीं है। छोटे दुकानदार, कारीगर और किसान भी इसे कार्यशील पूंजी के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। बीज, खाद, कच्चा माल या दुकान के खर्च के लिए लिया गया छोटा सा गोल्ड लोन कई परिवारों की रोजी-रोटी चलाता है।

जब लोन की राशि घटेगी, तो इन छोटे कारोबारियों को या तो अपना काम सीमित करना पड़ेगा या फिर महंगे कर्ज़ का सहारा लेना होगा। इसका असर धीरे-धीरे स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

आगे का रास्ता क्या है?

इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा सवाल यही है कि संकट की घड़ी में आम आदमी के पास कौन-सा मजबूत विकल्प बचेगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकार और वित्तीय संस्थानों को मिलकर ऐसे संतुलित उपाय खोजने होंगे, जिससे जोखिम भी नियंत्रित रहे और जरूरतमंदों को राहत भी मिले।

वित्तीय साक्षरता बढ़ाना, सस्ते और पारदर्शी छोटे कर्ज़ के विकल्प विकसित करना और सामाजिक सुरक्षा तंत्र को मजबूत करना अब और भी जरूरी हो गया है। इसके साथ ही ग्राहकों को भी यह समझने की जरूरत है कि कर्ज़ लेते समय लंबी योजना और जोखिम का आकलन जरूरी है।

News Editor- (Jyoti Parjapati)

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