My son is stranded in Russia: उत्तराखंड का बेटा रूस में फंसा, युद्ध में शहीद होकर पैतृक घर पहुंचा

उत्तराखंड के उधम सिंहनगर जिले से एक दुखद और मार्मिक घटना सामने आई है,
- जिसने पूरे राज्य और देश को झकझोर दिया है। राकेश कुमार, 24 वर्षीय युवक, जो पढ़ाई के लिए रूस गया था, का जीवन बेहद ही दर्दनाक और अनहोनी तरीके से समाप्त हो गया। 30 अगस्त को खुद राकेश ने अपने परिवार को बताया कि उसके पासपोर्ट को जबरदस्ती छीन लिया गया और उसे रूसी सेना में भर्ती कर लिया गया। इसके बाद उसे यूक्रेन युद्ध में लड़ने भेजा जा रहा था। यह संदेश उसके परिवार के लिए किसी भयंकर सपने से कम नहीं था।
- राकेश के परिवार ने तत्काल दिल्ली जाकर अधिकारियों से मदद मांगी। उन्होंने बेटे की भारत वापसी की गुहार लगाई और लगातार प्रयास किए कि किसी तरह उनका पुत्र सुरक्षित घर लौट आए। परंतु, दुख की बात यह है कि दस दिन पहले उन्हें सूचना मिली कि राकेश युद्ध में शहीद हो गया। यह खबर सुनते ही परिवार पर दुख और शोक का पहाड़ टूट पड़ा।
- आज राकेश का शव उत्तराखंड के पैतृक घर पहुंचा। पूरे गांव और पड़ोसियों में शोक की लहर दौड़ गई। राकेश का अंतिम संस्कार परिवार और स्थानीय लोगों की मौजूदगी में किया गया। ताबूत में लाश देखकर हर कोई स्तब्ध रह गया। यह दृश्य बहुत ही भावुक करने वाला था, जिसमें परिवार की पीड़ा और देशभक्ति की भावना दोनों झलक रही थी।
- राकेश की यह कहानी न केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय संघर्ष और युवा विदेश में शिक्षा के दौरान आने वाली जोखिमों को भी उजागर करती है। पढ़ाई के लिए विदेश जाने वाले युवाओं की सुरक्षा पर यह सवाल खड़ा करता है कि उन्हें किस तरह की परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। राकेश की कहानी यह भी दिखाती है कि कई बार युवा विदेश में अध्ययन के नाम पर जाने के बावजूद अनजाने में ऐसी स्थिति में फंस सकते हैं, जहां उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है।
- राकेश की मौत ने पूरे उत्तराखंड को दुखी कर दिया है। जिले के लोग और राज्य के अधिकारी इस घटना को लेकर संवेदनशील हैं और परिवार को हर संभव सहायता देने का आश्वासन दे रहे हैं। स्थानीय प्रशासन ने परिवार के साथ संपर्क साधकर शोक संतप्त परिवार की मदद की। अंतिम संस्कार के दौरान पूरे गांव में शोक की छाया रही और लोग परिवार के दुख में शामिल हुए।

इस घटना से यह भी स्पष्ट होता है कि
- अंतरराष्ट्रीय युद्ध और संघर्ष सिर्फ सैनिकों और देशों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इसके प्रभाव आम लोगों और उनके परिवारों तक भी पहुंचते हैं। राकेश की उम्र महज 24 वर्ष थी और उसका जीवन शिक्षा और उज्ज्वल भविष्य के सपनों में बीतने वाला था। परंतु, परिस्थितियों ने उसे युद्धभूमि तक पहुंचा दिया और उसकी जिंदगानी समाप्त कर दी।
- राकेश की कहानी युवा पीढ़ी के लिए एक चेतावनी भी है कि विदेश में शिक्षा और नौकरी की स्थिति में संभावित खतरों को समझना बहुत जरूरी है। इसके साथ ही यह भी संदेश देती है कि परिवार और समाज को युवाओं की सुरक्षा और उनके विदेश प्रवास के जोखिमों के प्रति जागरूक होना चाहिए।
- अंत में, उत्तराखंड का यह बेटा राकेश कुमार अब हमेशा अपने पैतृक घर और गांव में यादों में जीवित रहेगा। उसकी शिक्षा, उसकी जिंदादिली और उसके शहीदी का दर्द सभी के दिलों में हमेशा बना रहेगा। परिवार ने अपने प्रिय पुत्र को अंतिम विदाई दी, लेकिन इस घटना ने पूरे समाज को भी सिखाया कि युद्ध और अंतरराष्ट्रीय संघर्ष की भयावहता आम इंसानों की जिंदगी पर कितना गहरा असर डाल सकती है।
- राकेश की मृत्यु केवल एक युवा की नहीं, बल्कि पूरी युवा पीढ़ी और उनके परिवारों के लिए एक गंभीर चेतावनी बन गई है। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि शिक्षा, विदेश यात्रा और करियर की महत्वाकांक्षाओं के बीच सुरक्षा और कानूनी जागरूकता कितनी महत्वपूर्ण है। राकेश का जीवन और उसकी अनहोनी मृत्यु हमेशा हमारे दिलों में एक यादगार और दुखद स्मृति के रूप में रहेगी।
- इस तरह उत्तराखंड का यह बेटा, जो पढ़ाई के लिए रूस गया था, अब शहीद होकर अपने पैतृक घर लौट आया, और उसकी कहानी ने पूरे राज्य और देश को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि किस तरह युवा विदेश में जाने के दौरान अनजाने में खतरों का सामना कर सकते हैं और उनका जीवन अचानक ही बदल सकता है।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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