Nehru Death Anniversary: भारत विभाजन के लिए क्यों तैयार हो गए थे नेहरू, देखें इंटरव्यू

एच वाई शारदा प्रसाद की किताब के जरिए हमें पता चलता है कि जवाहरलाल नेहरू की मौत से कुछ हफ्ते पहले ही यह इंटरव्यू किया गया था. चंद्रिका प्रसाद की लिखी एक दूसरी किताब में इस इंटरव्यू के न्यूयॉर्क, अमेरिका में प्रसारित होने की तारीख 18 मई, 1964 बताई गई है. यानि यह बात तय है कि 27 मई, 1964 को जवाहरलाल नेहरू ने निधन से कुछ दिन पहले ये इंटरव्यू दिया था. यहां पढ़ें जवाहर लाल नेहरू के इस आखिरी इंटरव्यू का कुछ हिस्सा, जिससे भारत के मुस्लिमों और विभाजन के बारे में कई बातें सामने आती हैं (यहां पर 13वें मिनट 50वें सेकेंड से लेकर 19वें सेकेंड तक के इंटरव्यू का हिंदी अनुवाद दिया हुआ है)-
अर्नोल्ड मिशेल्स: भारत में वैचारिक तौर पर बहुत से अल्पसंख्यक लोग हैं क्या 1947 के विभाजन का मुख्य कारण यही था?
जवाहरलाल नेहरू: वाकई भारत में वैचारिक तौर पर बहुत से अल्पसंख्यक लोग हैं लेकिन उनमें ज्यादातर धार्मिक अल्पसंख्यक हैं. जब उन्हें ये लगा कि भारत तो आजाद हो जाएगा लेकिन वे अल्पसंख्यक ही बने रहेंगे तो उन्हें ये विचार पसंद नहीं आया.
अर्नोल्ड मिशेल्स: आप, गांधी और जिन्ना तीनों ही विभाजन से पहले अंग्रेजों के आधिपत्य के खिलाफ भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में शामिल रहे.
जवाहरलाल नेहरू: जिन्ना भारत की आजादी की लड़ाई में बिल्कुल भी शामिल नहीं रहे बल्कि उन्होंने इसका विरोध किया. मुस्लिम लीग की शुरुआत शायद 1911 में हुई थी (मुस्लिम लीग की औपचारिक शुरुआत 30 दिसंबर, 1906 को ही हो गई थी). इसे मुख्यत: ब्रिटिशों ने शुरू किया था. इसकी शुरुआत हमारे धर्मों में दरार पैदा करने के लिए की गई थी. उन्हें इसमें कुछ हद तक सफलता भी मिली. आगे चलकर ये हमारे सामने विभाजन के तौर पर सामने आयी.
अर्नोल्ड मिशेल्स: क्या आप और महात्मा गांधी इसके पक्ष में थे?
जवाहरलाल नेहरू: महात्मा गांधी कभी इसके पक्ष में नहीं थे. यहां तक कि जब विभाजन हो गया, तब भी वे इसके पक्ष में नहीं थे. मैं भी इसके पक्ष में नहीं था लेकिन अंत में मैंने बहुत सारे दूसरे लोगों की तरह ये फैसला किया कि इस लगातार चलने वाली परेशानी से अच्छा विभाजन है.

अगर आप देखें तो मुस्लिम लीग के नेता बड़े-बड़े जमींदार थे. वे भूमि सुधार को पसंद नहीं करते थे. हम भूमि सुधारों को लाने के लिए बहुत चिंतित थे. जैसा कि हमने बाद में किया भी. ये भी उन वजहों में एक है जिनके चलते हमने विभाजन के बारे में सोचा.
अगर वे हमारे साथ रहते तो दूसरी परेशानियों के साथ वे हमारे ऐसे बहुत से कदमों का विरोध करते. ऐसे में हमने उन्हें एक हिस्सा देकर अपने सुधार आदि के कार्यक्रमों को जारी रखा. बाद में जो इन सुधारों के रास्ते में आए, हमने उन नेताओं से बातें करके उन्हें समझाया.
अर्नोल्ड मिशेल्स: अभी तक आप (भारत में लोग) प्यार से कई शताब्दियों से मुस्लिमों के साथ रहते आए हैं, क्या ऐसा नहीं है?
जवाहरलाल नेहरू: सैकड़ों सालों से, वे प्यार से साथ रहते आ रहे थे. कभी-कभार कुछ समस्याएं आईं लेकिन ज्यादातर वक्त कोई समस्या नहीं थी. हिंदुओं की अपनी धार्मिक मान्यताओं में धर्मांतरण कराने के पक्ष में नहीं रहते हैं. वे बहुत ज्यादा इसके बारे में चिंता नहीं करते हालांकि दूसरा समूह करता है. वहीं मुस्लिम लोगों को धर्मांतरित कराने के इच्छुक थे. आज जितने भी मुस्लिम भारत में हैं ज्यादातर हिंदुओं के ही वशंज हैं. उनमें से केवल मुट्ठीभर ऐसे हैं जो बाहर से आए हैं.
अर्नोल्ड मिशेल्स: तो क्या वे सच में धर्मांतरण में कामयाब हुए?
जवाहरलाल नेहरू: हां वे हुए लेकिन बहुत ही छोटे स्तर पर. सैकड़ों-सैकड़ों सालों तक चली इस प्रक्रिया के बाद भी वे देश की एक-चौथाई जनसंख्या से भी कम को धर्मांतरित करा सके.
अर्नोल्ड मिशेल्स: तो अभी हिंदुस्तान में कितने मुस्लिम रहते हैं?
जवाहरलाल नेहरू: मैं ठीक-ठीक तो नहीं बता सकता लेकिन पांच करोड़ से ज्यादा.
अर्नोल्ड मिशेल्स: ये तो आपको दूसरा-तीसरा बड़ा मुस्लिम देश बना देता है
जवाहरलाल नेहरू: हां, दुनिया में तीसरा सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाला देश (अब भारत दूसरा सबसे बड़ा मुस्लिम जनसंख्या वाला देश है, वह पाकिस्तान की मुस्लिम आबादी से थोड़ा आगे है).
अर्नोल्ड मिशेल्स: ऐसे में किसी बाहरी के लिए विभाजन को समझ पाना बहुत मुश्किल होगा, अगर अब भी भारत में पांच करोड़ या उससे ज्यादा मुस्लिम आबादी रहती है?
जवाहरलाल नेहरू: मुस्लिम हर गांव-गांव में रहते हैं. कोई एक ऐसा स्थान नहीं है जहां वे (मुस्लिम) एक साथ बसे हों, हालांकि उनकी बहुसंख्यक जनसंख्या अब पाकिस्तान में है लेकिन भारत के गांवों-गांवों में वे साथ-साथ रहते हैं. ऐसे में उन्हें बड़ी संख्या में अपनी जड़ों से उखाड़ना पड़ता. यह भी विभाजन के खिलाफ दिया गया एक बड़ा तर्क था.
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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