Praveen Pandey : पौराणिक रूप में बुंदेलखंड से हुई थी सतरंगी पर्व की शुरुआत – प्रवीण पांडेय ?

Praveen Pandey : पौराणिक रूप में बुंदेलखंड से हुई थी सतरंगी पर्व की शुरुआत – प्रवीण पांडेय

Praveen Pandey : पौराणिक रूप में बुंदेलखंड से हुई थी सतरंगी पर्व की शुरुआत - प्रवीण पांडेय
Praveen Pandey : पौराणिक रूप में बुंदेलखंड से हुई थी सतरंगी पर्व की शुरुआत – प्रवीण पांडेय

सनातनी संस्कृति से जुड़ा बेहद महत्वपूर्ण, रखें से सराचीर कर देने वाला त्योहार है होली।

  • इस सतरंगी पर्व की शुरुआत पौराणिक रूप से मुंदेलखंड की पावन धरती से हुई थी। सांस्कृतिक रूप से बेहद धनी बुदेलखंड के पौरवशाली इतिहास में रंगीली होली के उद्म स्थल होने का गौरव भी शामिल है। होली का उदम स्थल ऐतिहासिक और पौराणिक रूप से सुदेलखंड को हृदयस्थली झांसी जिला मुख्यालय से 80 किलोमीटर दूर बामौर विकासखंड में स्थित एरच धाम को माना जाता है। पौराणिक काल में इस क्षेत्र से अर्तमान जालौन और हमीरपुर जिलों की सीमा भी लगती थी। होली का त्योहार भक्त प्रहलाद से जुड़ा है और श्रीमद् भागवत पुराण में भक्त प्रहलाद का प्रसंग सुनने पर पता चलता है कि हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप दो राक्षस भाई थे, उनको राजधानी एरिकेच्छ थी जो अब परिवर्तित होकर एरच हो गया है।
  • श्रीमद् भागवत पुराण के अनुसार हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद हुआ, जिसका पालन-पोषण मुनि आश्रम में होने की वजह से पा चालक विष्णु भक्त हुआ। यह चात उसके पिता को क्दार्शत नहीं हुई और उसने अपने पुत्र को तरह-तरह की यातनाएं देकर विष्णु की भक्ति से अलग करना चाहा। ग्रवसराज ने अपने पुड को मारने के तमाम तरीके अपनाए। हिरणकायम ने प्रहलाद को डिकौली या डिकांचल पर्वत सेनने नेता नदी के गहरे पानी में फिकवा दिया था। इतिहासकारों के अनुसार भागवत कथा में जिम डॉकांचल वा डिकौली पर्वत का जिक्र है वह एरच में बेतवा नहीं के किनारे मौजूद है। यह कोई कल्पना नहीं है, अग्रेजों ने झांसी के गजेटियर में भी इसका जिक्र किया है। गजेटियर के 339 पेज पर एरच और डिकीती का जिक्र है।
  • नरसिंह भगवान ने जब हिरणकश्यप का वध कर दिया, तब हजारों राक्षसों ने उत्पात मचाना शुरु कर दिया। नरसिंह भगवान को राक्षसों ने घेर लिया। इस राक्षसी उपद्रव को कीचड़ की होली के रूप में बुंदेलखंड में मनाया जाता है। कुछ दिन पूर्व तक इस होली को लोग नहीं मनाते थे। भक्त प्रशालाद के राज्याभिषेक के बाद राक्षसों का उत्पात थम गया। उसके बाद खुशी में रंगों और फूलों की होली मनाई जाने लगी। बुंदेलखंड के साथ पौराणिक संबंध और बोली का उदगमस्थल एरच ही होने के पुरातात्विक प्रमाण भी मौजूद हैं। एरच में मिली सोलिका और प्रसलाद समेत भगवान नरसिंह की मूर्तियां इस बात को प्रमाणित करती हैं कि कहीं और नहीं बल्कि भक्त प्रहलाद का जन्म एरच में ही हुआ था।
Praveen Pandey : पौराणिक रूप में बुंदेलखंड से हुई थी सतरंगी पर्व की शुरुआत - प्रवीण पांडेय
Praveen Pandey : पौराणिक रूप में बुंदेलखंड से हुई थी सतरंगी पर्व की शुरुआत – प्रवीण पांडेय

बोरों की धरती बुंदेलखंड में होली का त्योहार काफी रोमांचक होता है।

  • यहां गांव-गांव में होने वाली लघुमार होली पूरे देश में प्रसिद्ध है जिसमें रंग और गुलाल के बीच लाठी भांजते हुए युवाओं के पैंतरे देखने को मिलते हैं। रिसा लगता है मानों को होली खेलने नहीं बल्कि जंग का मैदान जीतने निकले हैं। इसी के साथ पूरे महीने गांव की चौपालों में फाग की माफिले होती है, तो जामाह में और चार-चांद लगाती है। बुंदेलखंड की मशहूर लहुमार होली में भगवान श्रीकृष्णा का भेष लेकर युक्ता ढोलक की थाप पर लाठियों का अचूक बार करते हुए मुद्ध कला का बेहतरीन नमूना पेश करते हैं। यह इस इलाके की प्राचीन परंपरा है।
  • बुंदेलखंड के लोग इस बोली को अपनी प्राचीन बुंदेली संस्कृति से जोड़ते हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि यह परंपरा महाभारत काल से संबंधित है। जब पांडव अज्ञातवास के दौरान विराट की नगरी में रुके थे। उस समय पांडवों ने अपने अव और शस्त्र छिपाकर रख दिर थे। उस काल में भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों को लाठी बुद्ध कला की शिक्षा दी थी। पांडवों ने जब यह शिक्षा ग्रहण की, होली का त्यौहार था। तभी से यह परंपरा शुरू हुई, जोआज भी बुंदेलखंड के गांवों में दिखाई देती हैl
  • बुंदेलखंड और होली से जुहीं एक घटना और भी है। डोली की बाद आने वाले परेवा के दिन अंग्रेजों ने बुदेलखंड में करतेआम किया था। झांसी क्षेत्र के लोग बताते है कि 1856 में अचानक अंग्रेजी फौजों ने झांसी में महारानी लक्ष्मीबाई का किला घेरकर हमला किया था l जिसमें बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे। बुन्देलखंड के हम्रपुर, झांसी, ललितपुर, जालौन, बांदा, महोबा और किस्कूट के अलावा एमपी के तमाम गांवों में भी होली की परत्वा में रंग गुलाल नहीं खेला जाता है। हालांकि यहां होलिका दहन के अगले दिन शहर और कस्बों में बच्चे होली के रंग में रंग जाते है। होली की दून से बुन्देलखंड में होली की धूम मचती है। बुजुर्ग बताते हैं कि मथुरा में पंद्रह दिनों तक होली खेली जाती है। सहीं कानपुर में आठ और बुन्देलखंड क्षेत्र में रंग पंचमी तक होली खेलने की परम्परा है। आधुनिकता एवं समय की व्यस्तता के चलते अब यह एतिहासिक परम्परा कई जगह कमजोर पड़ने लगी है।

News Editor- (Jyoti Parjapati)

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