Principals’ Council : उत्तर प्रदेश प्रधानाचार्य परिषद मथुरा ने अंकेक्षण कार्य में प्रधानाचार्यों की नियुक्ति का विरोध किया

उत्तर प्रदेश प्रधानाचार्य परिषद ने प्रदेश के प्रधानाचार्यों को
- अंकेक्षक के रूप में नियुक्त किए जाने पर कड़ा विरोध जताया है। यह विवाद उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद द्वारा आयोजित हाईस्कूल और इंटरमीडिएट परीक्षा–2026 के मूल्यांकन कार्य से संबंधित है। प्रत्येक वर्ष प्रदेश भर में आयोजित होने वाली हाईस्कूल और इंटरमीडिएट परीक्षाओं के उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन अंकेक्षकों द्वारा किया जाता है। इस वर्ष दिनांक 18 मार्च 2026 से उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। इस कार्य के लिए कई प्रतिष्ठित और सम्मानित प्रधानाचार्यों को अंकेक्षक के रूप में नियुक्त किया गया।
- उत्तर प्रदेश प्रधानाचार्य परिषद, मथुरा का स्पष्ट मत है कि प्रधानाचार्य का पद केवल प्रशासनिक और शैक्षिक नेतृत्व के लिए होता है। प्रधानाचार्य के कर्तव्य में विद्यालय का संचालन, शिक्षकों और छात्रों का मार्गदर्शन, शैक्षिक गुणवत्ता सुनिश्चित करना, और प्रशासनिक निर्णय लेना शामिल है। ऐसे में उन्हें अंकेक्षण कार्य के लिए नियुक्त करना उनके पद की गरिमा और दायित्वों के प्रतिकूल है। परिषद ने यह भी बताया कि यह निर्णय न केवल प्रधानाचार्यों की कार्य क्षमता और सम्मान को प्रभावित करता है, बल्कि इससे उनके नियमित शैक्षिक और प्रशासनिक कार्यों में भी व्यवधान आता है। अंकेक्षण कार्य में शामिल होने के कारण प्रधानाचार्यों को विद्यालय में आवश्यक प्रशासनिक और शैक्षिक गतिविधियों का ध्यान नहीं रख पाना पड़ता, जिससे विद्यार्थियों और स्कूल संचालन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
- इस विवाद के समाधान के लिए उत्तर प्रदेश प्रधानाचार्य परिषद ने निर्णय लिया है कि वे इस मुद्दे को उच्च स्तरीय अधिकारियों के समक्ष रखेंगे। परिषद की योजना है कि शीघ्र ही माननीय उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक से वार्ता की जाए, ताकि प्रधानाचार्यों को इस अंकेक्षण कार्य से मुक्त किया जा सके और उनके प्रशासनिक दायित्वों की गरिमा बनाए रखी जा सके। परिषद ने अपने निर्णय में यह भी स्पष्ट किया कि इस अंकेक्षण कार्य का विरोध सर्वसम्मति से किया जाएगा। परिषद का मानना है कि प्रधानाचार्यों का समय और ऊर्जा स्कूल और छात्रों के विकास में लगनी चाहिए, न कि परीक्षा मूल्यांकन जैसे अतिरिक्त कार्यों में। इस विरोध का उद्देश्य केवल प्रधानाचार्यों की गरिमा और प्रशासनिक भूमिका को बनाए रखना है।

डॉ. अजय कृष्ण सारस्वत, जिला अध्यक्ष, ने कहा कि
- परिषद के निर्णय का पालन सभी सदस्य प्रधानाचार्य करेंगे और किसी भी प्रकार के दबाव में नहीं आएंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रधानाचार्यों को अंकेक्षण कार्य से मुक्त करने के लिए परिषद हर स्तर पर संवाद और वार्ता करेगी। इस मुद्दे पर परिषद का मत यह है कि मूल्यांकन कार्य के लिए शिक्षकों या अन्य योग्य अधिकारियों की नियुक्ति की जा सकती है, जो इस कार्य के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित हों। प्रधानाचार्यों को इस प्रकार के अतिरिक्त कार्यों में शामिल करना न केवल उनके समय का अपव्यय है, बल्कि शिक्षा प्रणाली की गुणवत्ता और छात्रों की भलाई के लिए भी हानिकारक है।
- परिषद ने यह भी सुझाव दिया कि भविष्य में किसी भी परीक्षा मूल्यांकन या अन्य प्रशासनिक कार्यों में प्रधानाचार्यों को शामिल करने से पहले उनकी सहमति ली जाए और उनके शैक्षिक और प्रशासनिक कार्यों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। यह कदम शिक्षा के प्रति जिम्मेदारी और प्रधानाचार्य पद की गरिमा को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। उत्तर प्रदेश प्रधानाचार्य परिषद, मथुरा का यह भी कहना है कि परिषद हमेशा शिक्षा और विद्यालय प्रबंधन के हित में काम करती रही है। इस प्रकार के निर्णयों का विरोध करना परिषद की जिम्मेदारी है, ताकि शिक्षा प्रणाली में गुणवत्ता और प्रशासनिक नेतृत्व बनाए रखा जा सके।
- अंत में, परिषद ने सभी प्रधानाचार्यों से अपील की है कि वे इस निर्णय का समर्थन करें और अंकेक्षण कार्य के खिलाफ एकजुट रहें। परिषद का यह प्रयास शिक्षा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और प्रशासनिक जिम्मेदारी को बनाए रखने के लिए है। इस पूरे विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रधानाचार्य का पद केवल मूल्यांकन या अंकेक्षण कार्य के लिए नहीं है। शिक्षा, प्रशासन और नेतृत्व में उनकी भूमिका सर्वोपरि है। परिषद की यह पहल न केवल प्रधानाचार्यों की गरिमा को सुरक्षित रखेगी, बल्कि शिक्षा प्रणाली में उनके महत्वपूर्ण योगदान को भी मान्यता प्रदान करेगी। इस प्रकार, उत्तर प्रदेश प्रधानाचार्य परिषद, मथुरा द्वारा अंकेक्षण कार्य का विरोध एक संगठित और सुविचारित कदम है, जो प्रधानाचार्यों के अधिकार, गरिमा और शिक्षा क्षेत्र की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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