Set a true example : पोते ने दादी से घर उद्घाटन कराया, रिश्तों की सच्ची मिसाल बनी

आज के दौर में जब रिश्तों की गर्माहट अक्सर भागदौड़ और स्वार्थ के पीछे छूटती जा रही है, ऐसे में एक भावनात्मक दृश्य ने लोगों के दिलों को छू लिया। यह सिर्फ एक नए घर का उद्घाटन नहीं था, बल्कि रिश्तों की सच्ची कीमत और पारिवारिक संस्कारों का जीवंत उदाहरण था।
जहाँ आज कई लोग अपने व्यस्त जीवन में माता-पिता तक को समय देना भूल जाते हैं, वहीं एक पोते ने अपनी सौ वर्ष से अधिक आयु की दादी को गोद में उठाकर अपने नए घर का उद्घाटन करवाया। यह दृश्य इतना मार्मिक था कि जिसने भी देखा, उसकी आँखें नम हो गईं।
घर के बाहर सजे फूल, दरवाजे पर लगी रंगोली, पूजा की थाली और परिवार के सदस्यों की उत्साहित भीड़—इन सबके बीच जब पोते ने अपनी बुजुर्ग दादी को प्यार से अपनी बाँहों में उठाया, तो मानो समय ठहर सा गया। उम्र के उस पड़ाव पर जहाँ कदम साथ नहीं देते, वहाँ पोते की बाँहें उनका सहारा बनीं। दादी के चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, आँखों में चमक और मन में अपार आशीर्वाद।
जब उन्होंने अपने कांपते हाथों से फीता काटा या दीप प्रज्वलित किया, तो वह सिर्फ एक औपचारिकता नहीं थी। वह उस परंपरा का सम्मान था जिसमें घर की नींव बुजुर्गों के आशीर्वाद से रखी जाती है। उस क्षण ने यह साबित कर दिया कि आधुनिकता के इस युग में भी संस्कार जीवित हैं, बस उन्हें निभाने वाले चाहिए।
इस दृश्य की सबसे बड़ी खूबसूरती यह थी कि इसमें दिखावा नहीं था, केवल स्नेह था। पोते की आँखों में गर्व और प्रेम साफ झलक रहा था। वह जानता था कि जिस घर में उसकी दादी का आशीर्वाद शामिल होगा, वहाँ सुख-समृद्धि और शांति का वास रहेगा। दादी ने भी शायद अपने जीवन की तमाम स्मृतियों को उस पल में समेट लिया था—अपने बेटे-बेटियों की परवरिश, संघर्षों के दिन, परिवार की बढ़ती शाखाएँ—और अब उसी परिवार की नई पीढ़ी का नया घर।
आज जब लोग घर को सिर्फ एक संपत्ति या निवेश मानने लगे हैं, यह घटना याद दिलाती है कि घर केवल ईंट, पत्थर और सीमेंट से नहीं बनता। घर बनता है रिश्तों की गर्माहट से, बुजुर्गों के अनुभव से, और उनकी दुआओं से। जिस घर में बुजुर्गों का सम्मान होता है, वहाँ सकारात्मक ऊर्जा अपने आप बस जाती है।

दादी की मुस्कान में एक संतोष था—जैसे उनकी परवरिश सफल हो गई हो। उन्होंने जिस परिवार को संस्कार दिए, वही परिवार आज उन्हें सम्मान की ऊँचाई पर बिठा रहा था। यह दृश्य केवल उस परिवार के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक संदेश है।
यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम अपने घरों में बुजुर्गों को वह स्थान दे पा रहे हैं जिसके वे हकदार हैं? क्या हम उनकी उपस्थिति को बोझ समझते हैं या आशीर्वाद? एक घर का वास्तविक वैभव उसकी सजावट या भव्यता में नहीं, बल्कि उसमें बसे प्रेम और सम्मान में होता है।
इस पोते ने यह दिखा दिया कि आधुनिकता और संस्कार एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। आप नया घर बना सकते हैं, नई सोच अपना सकते हैं, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़े रहना ही असली समृद्धि है।
उस दिन का वह पल सिर्फ कैमरे में कैद एक तस्वीर नहीं था, बल्कि पीढ़ियों के बीच प्रेम का सेतु था। एक ओर सौ वर्ष की उम्र का अनुभव, दूसरी ओर युवा ऊर्जा और सपनों से भरा भविष्य—दोनों का मिलन उस नए घर की चौखट पर हुआ।
लोगों ने जब यह दृश्य देखा तो कईयों को अपने दादा-दादी की याद आ गई। कुछ ने मन ही मन संकल्प लिया कि वे भी अपने बुजुर्गों को उतना ही सम्मान देंगे। सोशल मीडिया पर यह दृश्य तेजी से फैल गया और हर किसी ने इसे रिश्तों की मिसाल बताया।
दरअसल, जीवन की असली संपत्ति बैंक बैलेंस या आलीशान मकान नहीं, बल्कि परिवार का साथ है। जब बुजुर्गों का आशीर्वाद सिर पर होता है, तो हर मुश्किल आसान लगती है। उनकी दुआएँ उस अदृश्य कवच की तरह होती हैं जो हर संकट से बचाती हैं।
यह दृश्य हमें याद दिलाता है कि समय बदल सकता है, जीवनशैली बदल सकती है, लेकिन रिश्तों की बुनियाद वही रहती है—सम्मान, प्रेम और अपनापन। यदि हम इन मूल्यों को संजोकर रखें, तो हर घर मंदिर बन सकता है।
अंततः यह सिर्फ एक घर का उद्घाटन नहीं था। यह उस भावना का उत्सव था जिसमें परिवार सबसे ऊपर है। यह संदेश था कि बुजुर्गों का सम्मान केवल कर्तव्य नहीं, सौभाग्य है। और सच ही तो है—घर ईंटों से नहीं बनता, दुआओं से बनता है।
ईश्वर करे उस घर पर दादी का आशीर्वाद हमेशा बना रहे और यह उदाहरण समाज को प्रेरित करता रहे कि रिश्तों की असली कीमत कभी कम नहीं होती, बस उसे समझने और निभाने की जरूरत होती है।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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