The Zeal of Youth : जोधपुर : भूतनाथ में नि:शुल्क साफा प्रशिक्षण शिविर का आगाज, बारिश की बूंदों के बीच दिखा युवाओं का जोश

राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत में साफा केवल एक परिधान नहीं, बल्कि सम्मान, स्वाभिमान और परंपरा का जीवंत प्रतीक है। विशेष रूप से जोधपुर का साफा अपनी विशिष्ट शैली, रंगों और बांधने की कलात्मक विधि के कारण पूरे देश में पहचान रखता है। इसी गौरवशाली परंपरा को सहेजने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से जोधपुर में एक बार फिर सार्थक पहल की गई है। भारतीय नववर्ष के उपलक्ष्य में पुष्करणा सृजन सोसायटी एवं पुष्करणा चिंतन के संयुक्त तत्वावधान में भूतनाथ मंदिर पार्क में चार दिवसीय नि:शुल्क साफा बांधने का प्रशिक्षण शिविर प्रारंभ हुआ है, जो 22 मार्च तक चलेगा।
गुरुवार सुबह शिविर का शुभारंभ हुआ, जहां हल्की बूंदाबांदी के बावजूद प्रतिभागियों के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी। मौसम की बाधाओं को दरकिनार करते हुए नन्हे बालकों से लेकर बुजुर्गों तक सभी ने पूरे जोश और लगन के साथ इस पारंपरिक कला को सीखने में रुचि दिखाई। यह दृश्य इस बात का प्रमाण था कि यदि सही दिशा और अवसर मिले, तो हमारी सांस्कृतिक धरोहरों के प्रति लोगों में आज भी गहरा लगाव मौजूद है।
इस शिविर का उद्घाटन सीआरपीएफ के सेवानिवृत्त कमांडेंट जे.के. जोशी द्वारा किया गया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि ऐसे आयोजन हमारी समृद्ध परंपराओं को जीवित रखने का सशक्त माध्यम हैं। आधुनिकता की दौड़ में जहां पारंपरिक कलाएं धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही हैं, वहीं इस प्रकार के प्रशिक्षण शिविर उन्हें पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता तिलम संघ के सेवानिवृत्त जनरल मैनेजर एम.के. पुरोहित ने की, जिन्होंने साफे को राजस्थान की विशिष्ट पहचान बताते हुए इसके संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया।
शिविर में प्रशिक्षण की जिम्मेदारी ख्यातनाम प्रशिक्षक मनोज बोहरा और उनकी टीम द्वारा निभाई जा रही है। वे प्रतिदिन प्रातः 7 से 8 बजे तक प्रतिभागियों को जोधपुरी पेच सहित साफा बांधने की विभिन्न शैलियों का प्रशिक्षण दे रहे हैं। जोधपुरी पेच की विशेषता उसकी जटिलता और आकर्षक प्रस्तुति में होती है, जिसे सीखना एक कला है। प्रशिक्षक न केवल साफा बांधने की तकनीक सिखा रहे हैं, बल्कि इसके पीछे छिपे सांस्कृतिक महत्व और इतिहास से भी प्रतिभागियों को अवगत करा रहे हैं।
साफा केवल एक पारंपरिक वस्त्र नहीं है, बल्कि यह राजस्थान की आन-बान-शान का प्रतीक है। विवाह, त्यौहार, सामाजिक समारोह और विशेष अवसरों पर साफा पहनना सम्मान और प्रतिष्ठा का द्योतक माना जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में साफे की बांधने की शैली, रंग और आकार भिन्न होते हैं, जो उस क्षेत्र की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाते हैं। जोधपुर का साफा विशेष रूप से अपने पेच और रंग संयोजन के लिए प्रसिद्ध है।

भूतनाथ मंदिर पार्क में इस प्रकार का प्रशिक्षण शिविर वर्ष 2007 से लगातार आयोजित किया जा रहा है। यह निरंतरता इस पहल की सफलता और इसकी उपयोगिता को दर्शाती है। पिछले कई वर्षों में सैकड़ों लोगों ने यहां से साफा बांधने की कला सीखी है और इसे आगे बढ़ाया है। इस वर्ष भी शिविर के सफल संचालन में राजकुमार वर्मा, रमेश सिसोदिया, रामजी व्यास और अनिल बोहरा का सक्रिय योगदान सराहनीय है।
इस प्रकार के आयोजन न केवल परंपराओं को जीवित रखते हैं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक जागरूकता को भी बढ़ावा देते हैं। जब विभिन्न आयु वर्ग के लोग एक साथ आकर किसी पारंपरिक कला को सीखते हैं, तो यह आपसी संवाद और समझ को भी मजबूत करता है। विशेष रूप से युवा पीढ़ी के लिए यह एक अवसर है कि वे अपनी जड़ों से जुड़ें और अपनी सांस्कृतिक पहचान को समझें।
आज के डिजिटल युग में जहां पश्चिमी प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है, वहां अपनी परंपराओं को सहेजना एक चुनौती बन गया है। ऐसे में जोधपुर में आयोजित यह साफा प्रशिक्षण शिविर एक प्रेरणादायक उदाहरण है कि कैसे सामूहिक प्रयासों से हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित रख सकते हैं। यह पहल न केवल वर्तमान पीढ़ी को जोड़ रही है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक मजबूत आधार तैयार कर रही है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि साफा केवल सिर पर बांधा जाने वाला वस्त्र नहीं, बल्कि यह राजस्थान की पहचान, सम्मान और गौरव का प्रतीक है। इसे सहेजना और आगे बढ़ाना हम सभी की जिम्मेदारी है, और जोधपुर का यह प्रशिक्षण शिविर इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो रहा है।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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