Trump : एक तरफ सुलह के शब्द तो दूसरी तरफ ईयू से भारत पर 100% टैरिफ लगाने को कहा, क्या चाहते हैं ट्रंप ?

Trump : एक तरफ सुलह के शब्द तो दूसरी तरफ ईयू से भारत पर 100% टैरिफ लगाने को कहा, क्या चाहते हैं ट्रंप

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Trump : एक तरफ सुलह के शब्द तो दूसरी तरफ ईयू से भारत पर 100% टैरिफ लगाने को कहा, क्या चाहते हैं ट्रंप ?

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भारत के प्रति नया रुख चौंकाने वाला है। खासकर यह ध्यान में रखते हुए कि चंद रोज पहले तक वे भारत पर रूस से कच्चा तेल न खरीदने का दबाव बना रहे थे। उनके सिपहसालार पीटर नवारो और स्कॉट बेसेंट तो लगातार भारत के खिलाफ आपत्तिजनक बयान दे रहे थे। रूस से तेल खरीदने के नाम पर ट्रंप प्रशासन ने 27 अगस्त से भारत पर 50 प्रतिशत शुल्क लगा रखा है। संबंधों में तनाव को देखते हुए अमेरिकी वार्ता दल ने भारत का दौरा रद्द कर दिया। इसी साल के अंत में भारत में होने वाले क्वॉड सम्मेलन में भाग लेने के लिए भी ट्रंप नहीं आने वाले हैं। एससीओ बैठक में भाग लेने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन गए, तो उस पर भी ट्रंप ने निराशा जताई।

लेकिन ट्रंप ने मंगलवार को अचानक नरमी दिखाते हुए सोशल मीडिया पर लिखा, “मुझे यह घोषणा करते हुए खुशी हो रही है कि भारत और अमेरिका, द्विपक्षीय व्यापार बाधाएं दूर करने के लिए बातचीत जारी रखे हुए हैं। मैं आने वाले हफ्तों में अपने बहुत अच्छे मित्र, प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत करने के लिए उत्सुक हूं। मुझे पूरा विश्वास है कि दोनों महान देशों के लिए एक सफल निष्कर्ष पर पहुंचने में कोई कठिनाई नहीं होगी!”

प्रधानमंत्री मोदी ने भी ‘एक्स’ पर इसका जवाब दिया, “भारत और अमेरिका घनिष्ठ मित्र और स्वाभाविक साझीदार हैं। मुझे विश्वास है कि हमारी व्यापार वार्ताएं भारत-अमेरिका साझेदारी की असीम संभावनाओं को उजागर करने का मार्ग प्रशस्त करेंगी। हमारी टीमें इन वार्ताओं को जल्द से जल्द पूरा करने के लिए काम कर रही हैं। मैं भी राष्ट्रपति ट्रंप से बातचीत करने के लिए उत्सुक हूं। हम दोनों देशों के लोगों के लिए एक उज्जवल और समृद्ध भविष्य सुनिश्चित करने के मकसद से मिलकर काम करेंगे।”

सवाल है कि ट्रंप की बातों पर कितना भरोसा किया जाए। मंगलवार को ही ट्रंप ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर दबाव बनाने के लिए यूरोपियन यूनियन से चीन और भारत पर 100% तक टैरिफ लगाने का आग्रह किया। न्यूज एजेंसी रायटर्स ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि ट्रंप ने ईयू के प्रतिबंध दूत (sanction envoy) डेविड ओ’सुलिवन और अन्य यूरोपीय अधिकारियों से यह आग्रह किया। ईयू प्रतिनिधिमंडल प्रतिबंधों पर चर्चा करने के लिए वॉशिंगटन में है। ट्रंप ने संकेत दिया कि अगर ईयू उनके अनुरोध पर ध्यान देता है तो वे भी इसी तरह के टैरिफ लगाने को तैयार हैं।

ट्रंप प्रशासन की कथनी और करनी में अंतर

थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव कहते हैं, “ट्रंप के सुलह के शब्द पिछले दो हफ्तों में अमेरिका की कार्रवाइयों से मेल नहीं खाते। पीटर नवारो और स्कॉट बेसेंट जैसे ट्रंप के शीर्ष सहयोगियों ने भारत के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया है, जो वॉशिंगटन का असली रूप दर्शाता है।”

एक और महत्वपूर्ण बात है कि 4 सितंबर को ट्रंप प्रशासन ने निचली अदालत द्वारा रद्द किए गए टैरिफ को बहाल करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। उस याचिका में टैरिफ को बरकरार रखने के औचित्य के लिए रूस से भारत की तेल खरीद का हवाला दिया गया है। इसलिए ट्रंप की तरफ से टैरिफ हटाए जाने की संभावना कम है, क्योंकि इससे सुप्रीम कोर्ट में उनका मामला कमजोर होगा।

अमेरिका ने जब भारत पर 25% टैरिफ लगाया, तब बातचीत पहले से चल रही थी और उम्मीद थी कि इसे घटाकर 10% कर दिया जाएगा। इसके बजाय ट्रंप ने रूसी तेल का हवाला देते हुए 25% और टैरिफ लगा दिया। जब तक अमेरिका इन टैरिफ को नहीं हटाता तब तक व्यापार वार्ता वास्तव में आगे नहीं बढ़ सकती।

Trump : एक तरफ सुलह के शब्द तो दूसरी तरफ ईयू से भारत पर 100% टैरिफ लगाने को कहा, क्या चाहते हैं ट्रंप ?
Trump : एक तरफ सुलह के शब्द तो दूसरी तरफ ईयू से भारत पर 100% टैरिफ लगाने को कहा, क्या चाहते हैं ट्रंप ?

भारत को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट जाने की सलाह

श्रीवास्तव कहते हैं, “ट्रंप के गर्मजोशी भरे शब्द रूस और चीन के साथ बहुध्रुवीय संबंध बनाने के भारत के संकल्प को कमजोर करने की रणनीति हो सकते हैं। इसलिए नई दिल्ली को झूठी उम्मीदें नहीं पालनी चाहिए। इसके बजाय, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में एक एमिकस क्यूरी ब्रीफ दायर करके औपचारिक रूप से अपनी आपत्तियां दर्ज करानी चाहिए। इससे टैरिफ को चुनौती देने वाले अमेरिकी बिजनेस की मदद करने, ट्रंप के तर्क का खंडन करने और इस महत्वपूर्ण क्षण में भारत के हितों की रक्षा करने में मदद मिलेगी।”

ट्रंप प्रशासन की याचिका में सिर्फ भारत का उल्लेख

दरअसल, ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में 251 पन्नों की अपील दायर की। अमेरिका के कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड ने 29 मई को टैरिफ के खिलाफ फैसला सुनाया था, जिसे 28 अगस्त को कोर्ट ऑफ अपील ने बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका में ट्रंप प्रशासन ने टैरिफ को उचित ठहराने हुए अंतर्राष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्ति अधिनियम (IEEPA) का इस्तेमाल करने का बचाव किया और मुख्य रूप से भारत का उदाहरण दिया। उसने कहा कि 25 प्रतिशत रेसिप्रोकल टैरिफ और 25 प्रतिशत जुर्माना (कुल 50 प्रतिशत) रूस से भारत की निरंतर तेल खरीद के कारण लगाया गया था।

अपील में इन शुल्कों को यूक्रेन में शांति स्थापित करने और रूस का मुकाबला करने के अमेरिका के प्रयासों के लिए महत्वपूर्ण बताया गया। इसमें यह भी चेतावनी दी गई कि इन उपायों को रद्द करने से अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान होगा, व्यापार वार्ताएं बाधित होंगी और अन्य देशों से जवाबी कार्रवाई को बढ़ावा मिलेगा।

वैसे तो यह मामला टैरिफ को चुनौती देने वाले अमेरिकी बिजनेस और ट्रंप प्रशासन के बीच है और भारत इसमें प्रत्यक्ष रूप से कोई पक्ष नहीं बनता। लेकिन श्रीवास्तव के मुताबिक भारत के चुप रहने का मतलब होगा ट्रंप के दावे को अमेरिका की सर्वोच्च अदालत में चुनौती नहीं देने का जोखिम उठाना।

भारत के पास अपनी बात रखने के लिए बहुत कम समय है। इसलिए जीटीआरआई का कहना है कि सबसे प्रभावी तरीका एमिकस क्यूरी (न्यायालय मित्र) याचिका दायर करना होगा। इससे भारत की आपत्तियां रिकॉर्ड में दर्ज होंगी, टैरिफ को चुनौती देने वाले अमेरिकी बिजनेस के तर्कों को बल मिलेगा, और यह उजागर होगा कि 50 प्रतिशत शुल्क क्यों गैरकानूनी और भेदभावपूर्ण है।

क्या करे भारत

श्रीवास्तव के अनुसार, भारत की एमिकस क्यूरी याचिका में इस बात पर जोर दिया जाना चाहिए कि 50% टैरिफ सीधे तौर पर अमेरिका को किए जाने वाले 91.2 अरब डॉलर के भारतीय निर्यात को प्रभावित करते हैं। इसमें झींगा, अपैरल और ऑटो कंपोनेंट जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्र शामिल हैं। ऐसे उपाय न केवल भारतीय व्यवसायों को नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि इससे अमेरिकी आयातकों और उपभोक्ताओं की लागत भी बढ़ती है।

उन्होंने भारत के विरोध के पांच प्रमुख आधार बताए। पहला और सबसे बुनियादी तर्क ऊर्जा सुरक्षा है। हर देश को विश्वसनीय और सस्ती ऊर्जा प्राप्त करने का अधिकार है। रूस से भारत का तेल आयात पूरी तरह से कानूनी, पारदर्शी और अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों के अनुरूप है। इसके खिलाफ व्यापार प्रतिबंध ग्लोबल गवर्नेंस के लिए एक खतरनाक मिसाल कायम करता है।

दूसरा, भारत पर टैरिफ भेदभावपूर्ण हैं। ट्रंप प्रशासन ने 2024 में भारत के 52.7 अरब डॉलर के रूसी तेल आयात पर फोकस किया है, और इसे पश्चिमी प्रतिबंधों की अवहेलना बताया है। लेकिन उसने अन्य देशों को नजरअंदाज कर दिया। चीन ने उसी वर्ष 62.6 अरब डॉलर का रूसी तेल खरीदा। यूरोपीय यूनियन ने भी रूस से 39.1 अरब डॉलर का आयात किया, जिसमें 25.2 अरब डॉलर के तेल के साथ उर्वरक, एल्युमीनियम और टाइटेनियम भी शामिल थे। यहां तक कि अमेरिका ने भी प्लैटिनम समूह की धातुओं और टाइटेनियम से लेकर विमान के पुर्जों तक, 3.3 अरब डॉलर के रूसी उत्पादों का आयात किया।

अमेरिकी कार्रवाई रणनीति से ज्यादा राजनीति से प्रेरित लगती है। महत्वपूर्ण खनिजों पर चीन का नियंत्रण होने के कारण ट्रंप प्रशासन चीन के साथ टकराव से बचता है। रूस से आयात के बावजूद अमेरिका अपने नाटो सहयोगियों के खिलाफ भी कोई कदम नहीं उठा रहा। ऐसे में भारत एक आसान टारगेट बन गया है। सिर्फ भारत को निशाना बनाना वॉशिंगटन की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है।

तीसरा, युद्ध-संबंधी औचित्य का आधार ही विवादित है। अर्थशास्त्री जेफरी सैक्स और अन्य का तर्क है कि अमेरिकी नीति ने ही यूक्रेन संकट को बढ़ाया है। 1990 के दशक में रूस से वादा करने के बाद कि नाटो पूर्व की ओर विस्तार नहीं करेगा, 1999 और 2004 में गठबंधन का विस्तार हुआ। 2008 में वॉशिंगटन ने मास्को की चेतावनियों को नजरअंदाज करते हुए यूक्रेन और जॉर्जिया पर नाटो में शामिल होने का दबाव डाला। 2014 के बाद यूक्रेन की नाटो महत्वाकांक्षाओं को अमेरिका का समर्थन मिलने से तनाव और बढ़ गया। इसलिए अब भारत को दंडित करना सर्वथा अनुचित है।

चौथा, आईईईपीए (IEEPA) का उपयोग आपातकालीन शक्तियों का दुरुपयोग है। यूक्रेन-रूस युद्ध में भारत कोई युद्धरत पक्ष नहीं है। वैध व्यापार को दंडित करने के लिए आपातकालीन कानूनों का दुरुपयोग करना एक तरह से वाणिज्यिक संबंधों को राजनीतिक बंधक बनाने जैसा है।

पांचवां, भारत पर अन्य देशों की तुलना में और अमेरिका के बाउंड टैरिफ रेट से अधिक शुल्क लगाना मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) सिद्धांत का उल्लंघन है। इस तरह ये टैरिफ विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों का उल्लंघन करते हैं।

श्रीवास्तव का कहना है कि एमिकस क्यूरी याचिका दायर करके भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट में उसके मामले की सुनवाई हो। चुप्पी साधने से ट्रंप की रणनीति निर्विरोध हावी हो जाएगी, जिससे आर्थिक नुकसान और प्रतिष्ठा को नुकसान दोनों का खतरा होगा। दूसरी ओर, खुलकर बोलने से अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत भारत के अधिकारों को बल मिलेगा और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी।

News Editor- (Jyoti Parjapati)

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