We fear the apocalypse : अपराध हमारा, सजा पक्षियों को; ग्लोबल वार्मिंग से मोर बर्फ में, हम डरते प्रलय ?

We fear the apocalypse : अपराध हमारा, सजा पक्षियों को; ग्लोबल वार्मिंग से मोर बर्फ में, हम डरते प्रलय

We fear the apocalypse : अपराध हमारा, सजा पक्षियों को; ग्लोबल वार्मिंग से मोर बर्फ में, हम डरते प्रलय ?
We fear the apocalypse : अपराध हमारा, सजा पक्षियों को; ग्लोबल वार्मिंग से मोर बर्फ में, हम डरते प्रलय ?

अपराध हमारा, सजा पक्षियों को

हमने अपनी ज़मीन को, अपनी हवाओं को, अपनी नदियों और जंगलों को किस हद तक बर्बाद किया है, इसका शायद हमें अभी तक अहसास ही नहीं हुआ। हमने पहाड़ों पर कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए, और उनका नाम रख दिया—शहर। हरियाली की जगह हमने सड़कों और मॉल का जाल बिछा दिया। ग्लोबल वार्मिंग का ठीकरा तो हम विज्ञान पर फोड़ते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि हम खुद ही इस “तंदूर दुनिया” के इंजीनियर हैं। पेड़ काट दिए, नदी को पथरा दिया, और अब जब कोई पक्षी अपना घर छोड़कर कहीं और जा रहा है, तो हम डर के मारे हड़बड़ा रहे हैं कि कहीं ‘प्रलय’ तो नहीं आने वाला।

देश में हम प्रकृति को नष्ट करने में शेर हैं। जंगलों की जगह हम मॉल, अपार्टमेंट और रोड बना रहे हैं, नदियों की जगह प्लास्टिक और कचरा जमा कर रहे हैं, और फिर भी हम उम्मीद करते हैं कि प्रकृति हमें कभी परेशान न करे। लेकिन जैसे ही मौसम थोड़ा सा अनोखा हो जाता है, जैसे ही मोर बर्फ में नजर आता है, हम अचानक बिल्ली की तरह डरने लगते हैं। “अरे! यह तो अशुभ संकेत है!” “प्रलय आने वाला है?”—यह सब बातें सुनाई देने लगती हैं।

असल में मोर बर्फ में इसलिए आया है कि उसे प्रलय की सूचना देनी है? नहीं। मोर आया है क्योंकि हमने नीचे इतनी गर्मी पैदा कर दी है कि अब हिमालय की बर्फीली चोटी ही उनके लिए ‘एसी’ की तरह लग रही है। क्या हमें यह सोचना चाहिए कि यह प्रलय का संकेत है, या यह समझना चाहिए कि हम अपने ही पैदा किए हुए संकट के शिकार हैं?

मज़ा यह है कि कुछ लोग इसे ‘अनहोनी’ कह रहे हैं। अजी साहब, अनहोनी तो तब हो गई थी जब हमने जंगलों को काटकर मॉल बना दिए थे, नदियों को सीमेंट के कवर में दबा दिया था, और ज़मीन को कंक्रीट की चादरों में लपेट दिया था। उस वक्त किसी को ‘प्रलय’ का अंदेशा नहीं हुआ। लेकिन जैसे ही मोर बर्फ पर पैर रखता है, जैसे ही मौसम असामान्य रूप से बदलता है, अचानक सबको कलयुग याद आ जाता है।

यह वही कलयुग है जो आमतौर पर राजस्थान की तपती रेत में या हरियाणा के खेतों में ‘रैंप वॉक’ करता था। अब वही कलयुग बर्फ पर ‘स्केटिंग’ करने को मजबूर है। और हम, इंसानों की तरह, इसका केवल नाटक देख रहे हैं। वैज्ञानिक हैरान हैं कि जलवायु परिवर्तन क्या-क्या दिखा सकता है, और गाँव वाले परेशान हैं कि कहीं यह ‘प्रलय’ का संकेत तो नहीं?

असल में यह चिंता बिल्कुल वैसी ही है जैसे इंसान अपने घर में आग लगाकर फिर पुलिस आने का इंतजार करे। हम खुद ही आग लगा रहे हैं—कार्बन उत्सर्जन बढ़ाकर, जंगल काटकर, नदी के पानी को जहर बनाकर—और फिर आश्चर्यचकित हैं कि प्रकृति हमें डाँट रही है। मोर और अन्य जीव इस आग में भागने की कोशिश कर रहे हैं। वे हमसे कोई संदेश नहीं ला रहे हैं, वे केवल अपनी ज़िंदगी बचा रहे हैं।

We fear the apocalypse : अपराध हमारा, सजा पक्षियों को; ग्लोबल वार्मिंग से मोर बर्फ में, हम डरते प्रलय ?
We fear the apocalypse : अपराध हमारा, सजा पक्षियों को; ग्लोबल वार्मिंग से मोर बर्फ में, हम डरते प्रलय ?

जलवायु परिवर्तन का संदेश यह है कि हमारी हर छोटी-बड़ी लापरवाही का असर पूरे इकोसिस्टम पर पड़ता है। मौसम असामान्य होता है, पक्षियों का प्रवास बदलता है, बर्फ़ पिघलती है, सूखा आता है, बाढ़ आती है। और इंसान? इंसान अपने डर और अंधविश्वास के कारण इन संकेतों को ‘प्रलय की निशानी’ समझ बैठता है। यही हमारा सबसे बड़ा विडम्बना है।

हमें यह समझने की ज़रूरत है कि प्रकृति कभी ‘अनहोनी’ नहीं करती। अनहोनी तो हमने खुद की है, अपने व्यवहार की है। जब जंगल कटते हैं, नदियाँ सूखती हैं, और तापमान बढ़ता है, तब ही यह सब होता है। मोर बर्फ में इसलिए आया क्योंकि हमने पृथ्वी के निचले हिस्से को इतना गर्म कर दिया है कि बर्फ उनके लिए राहत का ठिकाना बन गया। यह प्राकृतिक नियम है, ‘कलयुग’ का संकेत नहीं।

गाँव वाले चिंतित हैं, वैज्ञानिक हैरान हैं, और हम? हम अपनी ‘मॉडलिंग’ में व्यस्त हैं कि अगली रिपोर्ट में क्या लिखा जाएगा। लेकिन असली जवाब यह है कि हमें अपने ही कर्मों का सामना करना होगा। मोर की बर्फ पर नज़र हमें चेतावनी दे रही है: “देखो, तुमने क्या किया है, अब इसका असर तुम्हें भुगतना होगा।”

यदि हम सच में इस संकट से निपटना चाहते हैं, तो हमें अपनी आदतें बदलनी होंगी। पेड़ लगाना होंगे, नदियों को सुरक्षित रखना होगा, कचरे और प्रदूषण को नियंत्रित करना होगा। मोर और अन्य जीवों को अनुकूल वातावरण देना होगा, न कि केवल उनके आने और जाने पर डरना होगा। तभी हम इस ‘प्रलय’ को केवल कल्पना न समझें, बल्कि इसे रोकने में सक्षम हों।

अंत में, यह स्पष्ट है कि अपराध हमारा है और सजा केवल पक्षियों और प्रकृति को मिल रही है। हम शेर हैं तब जब बर्बादी की बात आती है, और बिल्ली जब परिणाम दिखे तो डर जाएँ। मोर बर्फ में इसलिए आया क्योंकि हमने अपने घर को ‘तंदूर’ बना दिया है, न कि क्योंकि कलयुग शुरू हो गया है। और यही संदेश है—प्रकृति हमारे कर्मों का परावर्तन है।

News Editor- (Jyoti Parjapati)

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