Why the silence in Jaipur UD:  टैक्स में जयपुर क्यों पिछड़ा अन्य राज्यों में नोटिस, ब्लैकलिस्टिंग की तैयारी, जयपुर में चुप्पी क्यों ?

Why the silence in Jaipur UD :  टैक्स में जयपुर क्यों पिछड़ा अन्य राज्यों में नोटिस, ब्लैकलिस्टिंग की तैयारी, जयपुर में चुप्पी क्यों

Why the silence in Jaipur UD :  टैक्स में जयपुर क्यों पिछड़ा अन्य राज्यों में नोटिस, ब्लैकलिस्टिंग की तैयारी, जयपुर में चुप्पी क्यों
Why the silence in Jaipur UD :  टैक्स में जयपुर क्यों पिछड़ा अन्य राज्यों में नोटिस, ब्लैकलिस्टिंग की तैयारी, जयपुर में चुप्पी क्यों

6 साल में 1400 करोड़ की जगह 450 करोड़ भी नहीं, फेल एजेंसी पर फिर भरोसा क्यों? जयपुर। पिछले 6 वर्षों में जयपुर नगर निगम का शहरी विकास कर UD Tax प्रदर्शन लगातार सवालों के घेरे में रहा है। जहाँ बजट और आकलन के अनुसार लगभग 1400 करोड़ रुपए की राजस्व वसूली संभावित थी, वहीं वास्तविक वसूली 450 करोड़ रुपये तक भी नहीं पहुँच सकी। इस भारी अंतर ने न केवल व्यापारियों और आम नागरिकों को परेशान किया है, बल्कि प्रशासनिक कार्यशैली और ठेकेदार एजेंसी की भूमिका पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
झारखंड, बिहार और राजस्थान के विभिन्न नगर निकायों में स्पैरो सॉफ्टटेक द्वारा किए जा रहे राजस्व वसूली कार्यों को लेकर शो-कॉज नोटिस, जांच और ब्लैकलिस्टिंग की प्रक्रिया सामने आ चुकी है। छपरा नगर निगम में कंपनी के खिलाफ ब्लैकलिस्टिंग की कार्यवाही सार्वजनिक रूप से चर्चा में है।
झारखंड में भी अनियमितता, लापरवाही और शिकायतों के आधार पर नोटिस जारी किए जाने की खबरें ऑनलाइन मीडिया में प्रमुखता से प्रकाशित हुई हैं। इसके बावजूद जयपुर नगर निगम में उसी एजेंसी को लेकर नया ठेका देने की तैयारी आखिर क्यों की जा रही है- यह प्रश्न अब नगर के व्यापारियों, पार्षदों और अधिकारियों के बीच खुलकर उठ रहा है।

Why the silence in Jaipur UD :  टैक्स में जयपुर क्यों पिछड़ा अन्य राज्यों में नोटिस, ब्लैकलिस्टिंग की तैयारी, जयपुर में चुप्पी क्यों
Why the silence in Jaipur UD :  टैक्स में जयपुर क्यों पिछड़ा अन्य राज्यों में नोटिस, ब्लैकलिस्टिंग की तैयारी, जयपुर में चुप्पी क्यों

व्यापारी परेशान, ऑडिट पैरा बने, पर कार्रवाई ठपः नगर निगम क्षेत्र में व्यापारियों का आरोप है कि गलत आकलन, मनमानी बिलिंग और पारदर्शिता के अभाव ने व्यापार को बुरी तरह प्रभावित किया। ऑडिट रिपोर्ट्स में नगर निगम और एजेंसी, दोनों के खिलाफ आपत्तियाँ (Audit Paras) दर्ज हैं। जानकारों के अनुसार, जहाँ 40 करोड़ रुपए से अधिक की पेनल्टी बनती थी, वहाँ आँख मूँदकर बैठने के आरोप भी लग रहे हैं।
अधिकारियों में बँटवारा, ऊपरी दबाव की चर्चाः सूत्रों के मुताबिक, राजस्व और निगम प्रशासन के भीतर दो धड़े बन चुके हैं- एक धड़ा निगम हित में रिकॉर्ड-आधारित प्रदर्शन और GIS-आधारित सर्वे की बात करता है, जबकि दूसरा धड़ा ऊपरी दबाव का हवाला देकर यथास्थिति बनाए रखने के पक्ष में दिखता है। नतीजा—जो अधिकारी खुलकर सवाल उठाना चाहते हैं, वे भी मौन तमाशबीन बने हुए हैं।
MoHUA और 15वें वित्त आयोग की गाइडलाइंस की अनदेखी? केंद्र सरकार के आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) द्वारा जारी मॉडल RFP और 15वें वित्त आयोग की सिफारिशें GIS-आधारित डोर-टू-डोर सर्वे और वास्तविक राजस्व वृद्धि को प्राथमिक मानती हैं। आरोप है कि जयपुर में इन्हीं मानकों से विचलन हुआ, जबकि अन्य नगर निकायों में इन्हीं गाइडलाइंस पर सफलतापूर्वक काम चल रहा है।
आयुक्त का आश्वासन- अब पुराने फेल मॉडल को बढ़ावा नहींः नगर निगम आयुक्त ने व्यापारियों और जनप्रतिनिधियों को आश्वस्त किया है कि आगे की निविदाएँ राज्य सरकार स्तर पर पूर्व में अपनाई गई पारदर्शी प्रक्रियाओं, MoHUA गाइडलाइंस और अन्य नगर निकायों के सफल मॉडल के अनुरूप तैयार की जाएँगी। स्पष्ट संकेत दिए गए हैं कि जो एजेंसियाँ राजस्व संग्रह में रिकॉर्ड-स्तर पर असफल रही हैं, उन्हें बढ़ावा नहीं दिया जाएगा।

 

News Editor- (Jyoti Parjapati)

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