With reverence to the teachers : गुरु पूर्णिमा पर गुरुजनों को श्रद्धापूर्वक नमन, ज्ञान, संस्कार, सेवा और सत्य के मार्ग पर चलने का आह्वान ?

With reverence to the teachers : गुरु पूर्णिमा पर गुरुजनों को श्रद्धापूर्वक नमन, ज्ञान, संस्कार, सेवा और सत्य के मार्ग पर चलने का आह्वान

With reverence to the teachers : गुरु पूर्णिमा पर गुरुजनों को श्रद्धापूर्वक नमन, ज्ञान, संस्कार, सेवा और सत्य के मार्ग पर चलने का आह्वान
With reverence to the teachers : गुरु पूर्णिमा पर गुरुजनों को श्रद्धापूर्वक नमन, ज्ञान, संस्कार, सेवा और सत्य के मार्ग पर चलने का आह्वान

गाजियाबाद। भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है। गुरु केवल ज्ञान देने वाला शिक्षक नहीं, बल्कि वह दिव्य शक्ति है जो अपने शिष्य को अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाती है। गुरु शिष्य के जीवन को दिशा देता है, उसके व्यक्तित्व का निर्माण करता है और उसे सत्य, सेवा, संस्कार तथा मानवता के उच्च आदर्शों से जोड़ता है। गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व इसी गुरु-शिष्य परंपरा के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का महान अवसर है।

इसी पावन अवसर पर नागेश गुर्जर, जिला सह-संयोजक, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (गाजियाबाद) एवं प्रदेश अध्यक्ष, राष्ट्रीय संत सेवा एवं गौ रक्षा कल्याण परिषद ने समस्त गुरुजनों को नमन करते हुए समाज के नाम प्रेरणादायी संदेश जारी किया। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु को साक्षात परमब्रह्म का स्वरूप माना गया है। यही कारण है कि सनातन परंपरा में गुरु का स्थान देवताओं से भी श्रेष्ठ बताया गया है।

उन्होंने अपने संदेश की शुरुआत प्रसिद्ध गुरु वंदना के इन पवित्र श्लोकों से की—

“गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरः।
गुरु साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः॥”

उन्होंने कहा कि इन पंक्तियों में गुरु के वास्तविक स्वरूप का अत्यंत सुंदर वर्णन किया गया है। गुरु सृजनकर्ता ब्रह्मा की भांति ज्ञान का निर्माण करते हैं, भगवान विष्णु की तरह उसका संरक्षण करते हैं और भगवान महेश की तरह अज्ञान, अहंकार तथा बुराइयों का नाश करते हैं। इसलिए गुरु का सम्मान करना भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है।

नागेश गुर्जर ने कहा कि किसी भी व्यक्ति के जीवन की सबसे बड़ी पूंजी उसके संस्कार और उसका चरित्र होते हैं, और इन दोनों का निर्माण गुरु के मार्गदर्शन से ही संभव होता है। माता-पिता जन्म देते हैं, लेकिन गुरु जीवन जीने की सही दिशा प्रदान करते हैं। गुरु शिष्य को केवल पुस्तकीय ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि उसे अनुशासन, धैर्य, सेवा, समर्पण, परिश्रम और नैतिक मूल्यों का महत्व भी समझाते हैं।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जब समाज अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब गुरु की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। आज की युवा पीढ़ी को केवल आधुनिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि नैतिक शिक्षा, सामाजिक जिम्मेदारी और राष्ट्र निर्माण की भावना की भी आवश्यकता है। यह कार्य गुरु ही प्रभावी रूप से कर सकते हैं। गुरु अपने ज्ञान और अनुभव से विद्यार्थियों को सही निर्णय लेने, जीवन के संघर्षों का सामना करने और सकारात्मक सोच विकसित करने की प्रेरणा देते हैं।

उन्होंने कहा कि गुरु की कृपा से ही शिष्य अज्ञान से आत्मबोध, भ्रम से सत्य, निराशा से आशा और अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होता है। गुरु जीवन के हर मोड़ पर प्रेरणा का स्रोत बनकर शिष्य का मार्गदर्शन करते हैं। इसलिए गुरु के प्रति श्रद्धा और सम्मान केवल एक दिन तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह जीवनभर की भावना होनी चाहिए।

नागेश गुर्जर ने कहा कि भारत की गुरु-शिष्य परंपरा विश्व की सबसे प्राचीन और गौरवशाली परंपराओं में से एक है। महर्षि वेदव्यास, महर्षि वशिष्ठ, गुरु द्रोणाचार्य, आचार्य चाणक्य, स्वामी विवेकानंद के गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस सहित अनेक महान गुरुओं ने समाज और राष्ट्र को नई दिशा प्रदान की। उनके आदर्श आज भी हमें सत्य, ज्ञान और सेवा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।

With reverence to the teachers : गुरु पूर्णिमा पर गुरुजनों को श्रद्धापूर्वक नमन, ज्ञान, संस्कार, सेवा और सत्य के मार्ग पर चलने का आह्वान
With reverence to the teachers : गुरु पूर्णिमा पर गुरुजनों को श्रद्धापूर्वक नमन, ज्ञान, संस्कार, सेवा और सत्य के मार्ग पर चलने का आह्वान

उन्होंने कहा कि गुरु केवल विद्यालय या महाविद्यालय तक सीमित नहीं होते। माता-पिता, संत, महापुरुष, समाज सुधारक और वे सभी व्यक्ति जो हमें जीवन का सही मार्ग दिखाते हैं, वे भी किसी न किसी रूप में हमारे गुरु हैं। प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में ऐसे सभी गुरुजनों का सम्मान करना चाहिए, जिनसे उसे ज्ञान, प्रेरणा और जीवन जीने की कला प्राप्त हुई है।

उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपने गुरुजनों का सम्मान करें, उनके बताए हुए मार्ग पर चलें और अपने जीवन को समाज तथा राष्ट्र की सेवा के लिए समर्पित करें। उन्होंने कहा कि यदि विद्यार्थी अनुशासन, परिश्रम और संस्कार को अपने जीवन का आधार बना लें, तो वे न केवल अपने परिवार बल्कि पूरे समाज और देश का नाम रोशन कर सकते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्ममंथन और आत्मविकास का अवसर भी है। इस दिन प्रत्येक व्यक्ति को यह संकल्प लेना चाहिए कि वह अपने गुरु द्वारा दिए गए ज्ञान, मूल्यों और आदर्शों को अपने जीवन में उतारेगा तथा समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए कार्य करेगा।

नागेश गुर्जर ने कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार, संवेदनशील और संस्कारी नागरिक का निर्माण करना है। जब शिक्षा में संस्कार और गुरु का मार्गदर्शन जुड़ जाता है, तभी समाज और राष्ट्र का समग्र विकास संभव होता है।

उन्होंने अंत में समस्त गुरुजनों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि गुरु का ऋण कभी चुकाया नहीं जा सकता। गुरु का सम्मान उनके बताए मार्ग पर चलकर, उनके आदर्शों को अपनाकर और समाजहित में कार्य करके ही किया जा सकता है। यही गुरु पूर्णिमा का वास्तविक संदेश है।

अपने संदेश के समापन पर उन्होंने सभी देशवासियों को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए कामना की कि गुरुजनों का आशीर्वाद सभी के जीवन में ज्ञान, विवेक, सेवा, सत्य, संस्कार, सफलता और आत्मविश्वास का प्रकाश फैलाए तथा हमारा समाज नैतिक मूल्यों, सामाजिक समरसता और राष्ट्रभक्ति की भावना से निरंतर आगे बढ़ता रहे।

— नागेश गुर्जर
जिला सह-संयोजक, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, गाजियाबाद
प्रदेश अध्यक्ष, राष्ट्रीय संत सेवा एवं गौ रक्षा कल्याण परिषद

News Editor- (Jyoti Parjapati)

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