
लखनऊ।
मोबाइल फोन और सोशल मीडिया की बढ़ती लत आज बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है। घंटों मोबाइल चलाना, लगातार रील्स देखना और देर रात तक स्क्रीन पर समय बिताना न केवल दैनिक दिनचर्या को प्रभावित कर रहा है, बल्कि नींद, व्यवहार और पढ़ाई पर भी असर डाल रहा है। इसी बीच लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के आयुष विभाग से जुड़ा एक दावा चर्चा में आया है। आयुष विभाग के प्रभारी डॉ. सुनीत कुमार मिश्रा के अनुसार मोबाइल कवर में बिल्वपत्र, पीपल या तुलसी का पत्ता रखने से मोबाइल रेडिएशन का असर कम करने में मदद मिल सकती है।
डॉ. मिश्रा के मुताबिक, इन पारंपरिक तरीकों को मोबाइल और रील्स की आदत कम करने के लिए एक तरह की थेरेपी के रूप में भी देखा जा रहा है। उनका कहना है कि इन पत्तों से जुड़े पारंपरिक उपयोग और मानसिक विश्राम की अवधारणा को ध्यान में रखते हुए मरीजों के उपचार में दवाओं के साथ काउंसलिंग तथा अन्य पारंपरिक तरीकों को शामिल किया जा रहा है।
हालांकि, मोबाइल कवर में किसी पत्ते को रखने से फोन से निकलने वाले रेडियोफ्रीक्वेंसी विकिरण को वास्तव में कम करने का दावा वैज्ञानिक रूप से स्थापित तथ्य के रूप में नहीं माना जाना चाहिए। इस विषय में ठोस वैज्ञानिक प्रमाण और स्वतंत्र उच्चस्तरीय शोध जरूरी हैं। डॉ. मिश्रा का कहना है कि इस दिशा में उच्च स्तर पर रिसर्च भी चल रही है। इसलिए इस दावे को फिलहाल चिकित्सकीय मत या शोधाधीन अवधारणा के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
मोबाइल की बढ़ती लत बनी चिंता
आज मोबाइल फोन केवल बातचीत का माध्यम नहीं रह गया है। पढ़ाई, मनोरंजन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेम, वीडियो और रील्स के कारण लोग लंबे समय तक स्क्रीन से जुड़े रहते हैं। खासकर कम उम्र के बच्चों और किशोरों में लगातार रील्स देखने की आदत अभिभावकों के लिए चिंता का कारण बन रही है।
डॉ. मिश्रा का कहना है कि देर रात तक मोबाइल चलाने वालों में चिड़चिड़ापन, नींद से जुड़ी परेशानियां, भूख में कमी और याददाश्त से संबंधित समस्याएं देखने को मिल सकती हैं। हालांकि, ऐसे लक्षणों के कई कारण हो सकते हैं और इन्हें केवल मोबाइल उपयोग से जोड़ना उचित नहीं होगा। लगातार स्क्रीन इस्तेमाल से नींद का समय प्रभावित होना, शारीरिक गतिविधि कम होना और पढ़ाई या अन्य जरूरी कामों में व्यवधान जैसी समस्याएं जरूर सामने आ सकती हैं।
विशेषज्ञों की सामान्य सलाह यही रहती है कि बच्चों और युवाओं के स्क्रीन टाइम को व्यवस्थित किया जाए। सोने से पहले मोबाइल का इस्तेमाल कम करना, नियमित नींद लेना, शारीरिक गतिविधियों के लिए समय निकालना और परिवार के साथ बातचीत बढ़ाना मोबाइल की आदत को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है।
रील्स की आदत से बाहर निकालने पर जोर
KGMU के आयुष विभाग में मोबाइल और रील्स की अत्यधिक आदत से परेशान लोगों को केवल दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय काउंसलिंग और व्यवहार में बदलाव के माध्यम से मदद देने की बात कही जा रही है। डॉ. मिश्रा के अनुसार विभाग में हर महीने औसतन करीब 15 मरीज मोबाइल या रील्स की लत से परेशान होकर उपचार और सलाह के लिए पहुंचते हैं।
इन मरीजों में अलग-अलग आयु वर्ग के लोग शामिल बताए जा रहे हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में मोबाइल का अत्यधिक इस्तेमाल कई बार दिनचर्या को प्रभावित कर देता है। बच्चों में इसका असर पढ़ाई और खेलकूद के समय पर पड़ सकता है, जबकि वयस्कों में काम, परिवार और नींद का संतुलन बिगड़ सकता है।
मोबाइल की आदत को कम करने के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि व्यक्ति अपने इस्तेमाल का पैटर्न समझे। कितने समय तक मोबाइल चलाया जा रहा है, किस उद्देश्य से इस्तेमाल किया जा रहा है और क्या बिना किसी जरूरी काम के बार-बार फोन देखा जा रहा है—इन बातों पर ध्यान देना जरूरी है।
बच्चों की पढ़ाई और मोबाइल का संबंध
बच्चों के मामले में मोबाइल की आदत को लेकर अभिभावकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। पढ़ाई के दौरान बार-बार नोटिफिकेशन देखना या कुछ मिनटों के लिए रील्स देखने के बाद लंबे समय तक उसी में लगे रहना पढ़ाई की एकाग्रता को प्रभावित कर सकता है।
डॉ. मिश्रा का दावा है कि पारंपरिक तरीकों और काउंसलिंग के माध्यम से बच्चों में मोबाइल से दूरी बनाने तथा पढ़ाई की ओर ध्यान बढ़ाने में सकारात्मक परिणाम मिल रहे हैं। हालांकि, किसी भी उपचार पद्धति की प्रभावशीलता का आकलन वैज्ञानिक अध्ययन और प्रमाणों के आधार पर किया जाना चाहिए।
बच्चों को मोबाइल से पूरी तरह दूर करने के बजाय उसके उपयोग के लिए स्पष्ट नियम बनाना अधिक व्यावहारिक तरीका हो सकता है। पढ़ाई, भोजन और सोने के समय मोबाइल से दूरी रखने की आदत विकसित की जा सकती है। साथ ही बच्चों को खेल, किताबें, रचनात्मक गतिविधियों और परिवार के साथ समय बिताने के अवसर देने चाहिए।

पारंपरिक तरीकों के साथ काउंसलिंग
KGMU के आयुष विभाग की पहल में पारंपरिक तरीकों के साथ काउंसलिंग को महत्व दिए जाने की बात सामने आई है। मोबाइल की आदत कई बार केवल तकनीकी समस्या नहीं होती, बल्कि व्यक्ति के व्यवहार और दिनचर्या से भी जुड़ी होती है। ऐसे में केवल मोबाइल छीन लेना या इस्तेमाल पर रोक लगा देना हर व्यक्ति के लिए प्रभावी समाधान नहीं हो सकता।
काउंसलिंग के जरिए व्यक्ति को यह समझाने का प्रयास किया जा सकता है कि मोबाइल का उपयोग किस तरह उसकी दिनचर्या को प्रभावित कर रहा है। इसके बाद धीरे-धीरे स्क्रीन टाइम कम करने, सोने-जागने का समय व्यवस्थित करने और मोबाइल के स्थान पर अन्य गतिविधियों को अपनाने की दिशा में काम किया जा सकता है।
यदि किसी व्यक्ति को लगातार नींद की समस्या, अत्यधिक चिड़चिड़ापन, पढ़ाई या काम में गंभीर परेशानी अथवा रोजमर्रा की गतिविधियों में बाधा महसूस हो रही हो तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।
क्या पत्ते वास्तव में रेडिएशन कम करते हैं?
मोबाइल कवर में तुलसी, पीपल या बिल्वपत्र रखने से रेडिएशन का असर कम होने का दावा इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस दावे को लेकर वैज्ञानिक प्रमाणों की आवश्यकता है। केवल किसी पत्ते को मोबाइल कवर में रखने से रेडियोफ्रीक्वेंसी ऊर्जा के प्रभाव को कम करने की बात को स्थापित वैज्ञानिक तथ्य नहीं माना जा सकता।
मोबाइल फोन से निकलने वाली रेडियोफ्रीक्वेंसी ऊर्जा और उसके प्रभाव का अध्ययन वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा किया जाता है। किसी विशेष वस्तु या सामग्री को मोबाइल के आसपास रखने से विकिरण कम होने का दावा तभी विश्वसनीय माना जा सकता है जब नियंत्रित परिस्थितियों में उसका परीक्षण किया जाए और उसके परिणाम स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययनों से भी पुष्ट हों।
इसलिए लोगों को इस दावे को लेकर किसी प्रकार की गलत सुरक्षा भावना नहीं बनानी चाहिए। मोबाइल का जिम्मेदार और सीमित उपयोग ही व्यावहारिक कदम है।
मोबाइल इस्तेमाल में संतुलन जरूरी
मोबाइल आज की जरूरत बन चुका है, इसलिए इससे पूरी तरह दूरी बनाना हर व्यक्ति के लिए संभव नहीं है। पढ़ाई, नौकरी, बैंकिंग, संचार और अन्य जरूरी सेवाओं के लिए मोबाइल का इस्तेमाल करना पड़ता है। समस्या तब पैदा होती है जब जरूरी काम के बजाय मनोरंजन और रील्स में अत्यधिक समय जाने लगे।
ऐसे में स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करना, अनावश्यक नोटिफिकेशन बंद करना, सोने से पहले मोबाइल दूर रखना और दिन में कुछ समय बिना स्क्रीन के बिताना उपयोगी आदतें हो सकती हैं। बच्चों के लिए अभिभावकों को स्वयं भी संतुलित मोबाइल व्यवहार का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए।
KGMU के आयुष विभाग की ओर से सामने आया यह मामला मोबाइल और रील्स की बढ़ती आदत पर एक महत्वपूर्ण चर्चा जरूर शुरू करता है। पारंपरिक उपचार, काउंसलिंग और व्यवहार में बदलाव के साथ इस समस्या से निपटने के प्रयास किए जा रहे हैं। वहीं मोबाइल कवर में पत्ते रखने से रेडिएशन कम होने जैसे दावों को वैज्ञानिक शोध के निष्कर्षों के आधार पर ही अंतिम रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए।
फिलहाल सबसे सुरक्षित संदेश यही है कि मोबाइल का इस्तेमाल जरूरत के अनुसार और संतुलित तरीके से किया जाए। बच्चों और युवाओं में विशेष रूप से रील्स और अनावश्यक स्क्रीन टाइम को सीमित करने पर ध्यान दिया जाए। यदि मोबाइल की आदत इतनी बढ़ जाए कि नींद, पढ़ाई, काम या पारिवारिक जीवन प्रभावित होने लगे, तो विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर विकल्प है।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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