
लोगों के बोल – कांग्रेस का घुसपैथियों से प्रेम संबंध आज़कल का नहीं, काफ़ी पुराना और ऐतिहासिक हैं – 1983 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बांग्लादेशी घुसपैठियों को बचाने के लिए IMDT Act लागू किया था।– इसका असर यह हुआ कि असम, पश्चिम बंगाल, बिहार, यूपी, झारखण्ड, त्रिपुरा, मेघालय और केरल जैसे राज्यों में जनसांख्यिकीय बदलाव साफ दिखने लगे – स्थानीय नागरिकों के काम-धंधे, रोज़ी-रोटी, नौकरियाँ, रोजगार, ज़मीन, हक़-अधिकार और संसाधन छिनने लगे, धार्मिक और सामाजिक संतुलन प्रभावित हुआ,
देश में कई जगह हिंसा, दंगे और सांप्रदायिक तनाव पैदा हुए, धीरे-धीरे करोड़ों घुसपैठिए दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु, कलकत्ता, केरल सहित पूरे देश में फैलने लगे।– डॉ बाबा साहब का संबिधान भारत में रहने वाले हर वास्तविक और असली नागरिक के हक़ अधिकारों की रक्षा करता हैं, लेक़िन अवैध घुसपैठ से देश पर आर्थिक बोझ, असुरक्षा, भीतरघाती खतरा, और राजनीतिक अस्थिरता जैसी तमाम समस्याएं पैदा होती है।
अबैध संख्या और लाईन बढ़ने से, इस विकराल समस्या के कारण देश के असली और सच्चे भारतीय नागरिकों को काम-धंधे, रोज़ी-रोटी, नौकरी, रोज़गार, बिजली, पानी, राशन, दवाएं, स्वास्थ्य सुविधाएँ और घर, मकान, जमीन उपलब्ध होने में भी दिक्क़ते आती हैं, तो देश का लोकतंत्र और असली नागरिकों के बैसिक हक़ अधिकार भी कमजोर होते है। सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार पर घुसपैठ को रोकने में विफलता का आरोप लगाया और 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने इस IMDT Act को असंवैधानिक घोषित करते हुए रद्द कर दिया और कहा कि यह कानून “राष्ट्र की अखंडता और सुरक्षा” के खिलाफ है।
उत्तर प्रदेश, संजय साग़र सिंह। बांग्लादेशी घुसपैठ अब भी एक यथार्थ खतरा है, खासकर सीमावर्ती और शहरी इलाकों में, इससे बिल्कुल स्पष्ट है कि यह केवल एक क़ानूनी मुद्दा नहीं, राष्ट्रीय अस्तित्व और भविष्य की दिशा का प्रश्न है। घुसपैठ और IMDT Act, 1983 जैसे कानूनों पर, खासकर राष्ट्रीय सुरक्षा, जनसांख्यिकीय असंतुलन, और स्थानीय नागरिकों के अधिकारों को लेकर देश में लंबे समय से बहस चलती रही है। इस गंभीर विषय पर लोगों का कथन एक संवेदनशील असुरक्षा के गंभीर मुद्दे की ओर इशारा करता है, जो भारत में लंबे समय से राजनीतिक, सामाजिक और देश की सुरक्षा विमर्श का हिस्सा रहा है।
आइए लोगों के साथ हुई आज़ की चर्चा में तथ्यों के साथ इस मुद्दे को समझते हैं। लोगों ने बताया कि कांग्रेस का घुसपैथियों से प्रेम संबंध आज़कल का नहीं काफ़ी पुराना और ऐतिहासिक हैं। 1983 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बांग्लादेशी घुसपैठियों को बचाने के लिए ( Illegal Migrants Determination by Tribunals) Act, 1983 – लागू किया था। इसका उद्देश्य यह था कि यह तय किया जा सके कि कोई “अवैध प्रवासी” और घुसपैठिये है या नहीं। जो घुसपैठियों की पहचान और निष्कासन के लिए लाया गया था लेकिन इसके प्रावधान इतने उलटे एवं कठिन और ढीले थे कि वे उल्टा घुसपैथियों के संरक्षण बन गए।
उन्होंने कहा – इस एक्ट में घुसपैठिया साबित करने की जिम्मेदारी पीड़ित या राज्य प्रशासन पर थी आरोपी घुसपैठिये की नहीं थी। यह भारतीय साक्ष्य क़ानून डॉ बाबा साहब के संबिधान से उल्टा था, हमारे संबिधान में दोष साबित करने की जिम्मेदारी आरोपी की होती है। लेक़िन 1983 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के द्वारा लाये गए इस कानून की वजह से बांग्लादेशी घुसपैठियों को पहचानना और उन्हें देश से बाहर निकालना बेहद कठिन हो गया था। यह कानून बांग्लादेशी घुसपैठियों को देश से निकालने के लिए नहीं बल्कि राजनीतिक कारणों से बचाने के लिए लाया गया था और इस ढीले क़ानून का दुरुपयोग करके करोड़ों अवैध घुसपैठिए भारत को घर्मशाला समझ के देश में बस गए।
IMDT Act, 1983 – इंदिरा गांधी का बनाया वो कानून था जिसने बांग्लादेशी घुसपैठियों को भारत में बसाने का रास्ता खोला और करोड़ों घुसपैठिए IMDT की आड़ लेकर भारत में घुस आए वो पहले असम, विहार, झारखण्ड, उत्तरप्रदेश फ़िर बंगाल और अब पूरे भारत देश के असली नागरिकों के हक़ अधिकारों को चुरा के देश को कमजोर कर रहे है!
उन्होंने आगे बताया कि यह कानून असम आंदोलन (1979–1985) के दौरान और बाद में काफी विवादित रहा। इसका असर यह हुआ कि असम, पश्चिम बंगाल, बिहार, यूपी, त्रिपुरा, मेघालय और केरल जैसे राज्यों में जनसांख्यिकीय बदलाव साफ दिखने लगे। स्थानीय नागरिकों की नौकरियाँ, काम-धंधे, रोज़ी-रोटी, रोजगार, ज़मीन, हक़-अधिकार और संसाधन छिनने लगे। धार्मिक और सामाजिक संतुलन प्रभावित हुआ। कई जगह हिंसा, दंगे और सांप्रदायिक तनाव पैदा हुए। धीरे-धीरे करोड़ों अवैध घुसपैठिए दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु, कलकत्ता, केरल सहित पूरे देश में फैलने लगे।

तब सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार पर घुसपैठ को रोकने में विफलता का आरोप लगाया और 2005 में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया। इस IMDT Act को असंवैधानिक घोषित करते हुए रद्द कर दिया और सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह कानून “राष्ट्र की अखंडता और सुरक्षा” के खिलाफ है।
देश की सुरक्षा और नागरिकता का सवाल: उन्होंने यह भी कहा, डॉ बाबा साहब का संबिधान भारत में रहने वाले हर वास्तविक और असली नागरिक के हक़ अधिकारों की रक्षा करता हैं, लेक़िन अवैध घुसपैठ से देश पर आर्थिक बोझ, असुरक्षा, भीतरघाती खतरा, और राजनीतिक अस्थिरता जैसी तमाम समस्याएं पैदा होती है। अबैध संख्या और लाईन बढ़ने से, इस विकराल समस्या के कारण देश के असली और सच्चे भारतीय नागरिकों को काम-धंधे, रोज़ी-रोटी, नौकरी, रोज़गार, बिजली, पानी, राशन, दवाएं, स्वास्थ्य सुविधाएँ और घर, मकान, जमीन उपलब्ध होने में भी दिक्क़ते आती हैं, तो देश का लोकतंत्र और असली नागरिकों के बैसिक हक़ अधिकार भी कमजोर होते है।
आज की स्थिति क्या है? NRC (National Register of Citizens) और CAA (Citizenship Amendment Act) जैसे प्रयास अबैध संख्या और लाईन बढ़ने की इस विकराल समस्या से निपटने की कोशिश हैं, लेकिन देश विरोधी राजनीति और आपसी टकराव इसमें बड़ा रोड़ा बन रहे हैं। जबकि ये राष्ट्र की अखंडता एवं सुरक्षा और स्थानीय नागरिकों के हक़-अधिकार की रक्षा के लिए बहुत ज़रूरी हैं। शहरी क्षेत्रों में प्रभाव: उन्होंने यह भी बताया कि कई घुसपैठिये अवैध रूप से दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु, कलकत्ता जैसे बड़े शहरों में आकर बस गए। इन इलाकों में वे श्रमिक, घरेलू सहायक, रिक्शा चालक, कबाड़ी आदि जैसे पेशों में दिखते हैं। कुछ मामलों में ये लोग नकली दस्तावेज़ों के ज़रिये भारत की नागरिक सुविधाएं भी प्राप्त कर लेते हैं।
बांग्लादेशी घुसपैठ: यथार्थ खतरा? वर्तमान स्थिति: साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि बांग्लादेशी घुसपैठ पर कई रिपोर्टें यह दर्शाती हैं कि सीमावर्ती राज्यों – जैसे कि असम, पश्चिम बंगाल, बिहार, यूपी, झारखण्ड, त्रिपुरा, मेघालय और केरल सहित अन्य राज्यों में यह एक वास्तविक समस्या रही है। हालांकि सुरक्षा एजेंसियां और BSF ने निगरानी कड़ी की है, लेक़िन राजनीतिक टकराब के कारण अनुमानित सीमा लंबाई में से लगभग 800 किमी अवरुद्ध (fenced) नहीं की जा सकी है। porous borders और स्थानीय राजनीतिक मिलीभगत के चलते यह समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई। तमाम राजनीतिक अडचनों के बाबजूद इसके लिए मोदी सरकार ने एक विशेष निगरानी परियोजना लागू करने की तैयारी कर रही हैं।
सुरक्षा और रणनीति: भारत सरकार व BSF की तकनीकी/सामरिक पहलकदमी कंक्रीट बाड़ और तकनीकी निगरानी: BSF दक्षिण बंगाल फ्रंटियर (लगभग 913 किमी) पर PTZ (Pan-Tilt-Zoom) कैमरे और रात-देखने वाले सेंसर लगाए हैं, जो बिना बाड़ व क्षेत्रीय कमजोरी वाले क्षेत्रों में निगरानी में मदद करते हैं। विशेष निगरानी परियोजना: भारत-बांग्लादेश सीमा (और पाकिस्तान सीमा) के लगभग 600 ‘vulnerable patches’ पर इन्फ्रारेड सेंसर, अलार्म और अतिरिक्त मानवबल तैनात करने की योजना लागू की गई है। सुरक्षा समन्वय और वार्ता: हाल में BSF और बांग्लादेशी सीमा प्रहरी (BGB) के बीच सीमा सुरक्षा, अवैध गतिविधियों और संपर्क बढ़ाने पर द्विपक्षीय चर्चा हुई।
वोट‑बैंक पॉलिटिक्स की भूमिका लोगों ने आरोप लगाते हुए बताया कि बंगाल तृणमूल कांग्रेस “अप्पीज़मेंट पॉलिटिक्स” के चलते बंगालदेशी घुसपैठ को बढ़ावा दे रही है और फर्जी दस्तावेजों के ज़रिए अबैध शरणर्थियों और बंगलादेशी घुसपैथियों को भारत की नागरिकता दिला रही है इसीलिए पश्चिम बंगाल में NRC के खिलाफ ‘नो NRC मूवमेंट’ का नेतृत्व TMC ने किया था और आगामी चुनाव में ममता अभी हिंदी और बंगाली भाषा का टकराब भी कराएगी। जनसंख्या आंकड़े: अनुमानित संख्या और राज्यों में बसी आबादी
2004 में गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जयस्वाल ने संसद में कहा कि लगभग 1.2 करोड़ (12 million) अवैध बांग्लादेशी अवैध प्रवासी भारत में रह रहे हैं, जिनमें से 6 million पश्चिम बंगाल में थे। लेक़िन कांग्रेस के ढीले प्रावधानों उलटे संरक्षक कानूनों की बजह से आज़ पुरे देश में लगभग 6 करोड़ से भी अधिक घुसपेथीयें और अवैध प्रवासी भारत में असली नागरिकों के हक़ अधिकार चोरी करके बड़े आराम से रह रहे हैं। त्रिपुरा, बिहार (सीमांचल क्षेत्र: किशनगंज, अररिया, कटिहार, पूर्णिया), झारखण्ड, उत्तर प्रदेश आदि में भी बड़ी संख्या में बांग्लादेशी अवैध प्रवासी पाए जाते रहे हैं। राजनीतिक चिंता: इस गंभीर विषय पर देश के कई राष्ट्रवादी चिंतकों और नेता ने गृह मंत्री को पत्र लिखा है, जिसमें BSF की तैनाती,SIR, NRC, CAA, जनगढ़णा, घुसपैठिया सर्च ऑपरेशन जैसे मुद्दों व प्रौद्योगिकी उपयोग, और राज्य-केंद्र समन्वय की समीक्षा की आवश्यकता बताई गई है।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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