
मेरठ।
मेरठ में किसान नेताओं की कथित पिटाई और पुलिस हिरासत में बर्बरता के आरोपों ने पुलिस महकमे को सवालों के घेरे में ला दिया है। भारतीय किसान यूनियन (बीआर आंबेडकर गुट) के अध्यक्ष दिग्विजय भाटी और किसान यूनियन नेता मोहित जाटव ने पुलिस अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। दोनों का दावा है कि 19 अगस्त 2026 को मुकदमे के सिलसिले में पुलिस कार्यालय पहुंचने के बाद उनके साथ मारपीट की गई। हालांकि, मेरठ पुलिस ने इन आरोपों को तथ्यहीन, असत्य और निराधार बताया है। मामले की जांच अब सहारनपुर के डीआईजी अभिषेक सिंह को सौंपी गई है।
बताया गया है कि पूरा मामला ललिता गौतम हत्याकांड को लेकर हुए प्रदर्शन से जुड़े मुकदमे से संबंधित है। इस मामले में मु0अ0सं0 173/2026 दर्ज है। दिग्विजय भाटी और मोहित जाटव के अनुसार, वे इसी मुकदमे के संबंध में एसएसपी अविनाश पांडेय से बातचीत करने के लिए 19 अगस्त को पुलिस कार्यालय पहुंचे थे। उनका आरोप है कि बातचीत के दौरान एसएसपी के चैंबर में उनके साथ अभद्रता की गई और मारपीट की गई।
दिग्विजय भाटी ने आरोप लगाया कि एसएसपी के चैंबर में करीब डेढ़ घंटे तक उनके साथ कथित तौर पर मारपीट की गई। उन्होंने जूतों और लात-घूंसों से पीटे जाने का आरोप लगाया। भाटी का यह भी दावा है कि इस दौरान उनकी आंख के पास चोट आई, जिसके कारण वहां सूजन हो गई। उन्होंने अपनी चोटों से संबंधित एक वीडियो भी जारी किया, जिसके बाद मामला सार्वजनिक चर्चा में आ गया।
दोनों किसान नेताओं ने आरोप लगाया कि इसके बाद सिविल लाइंस इंस्पेक्टर अखिलेश गौड़ और पुलिस टीम उन्हें एसओजी कार्यालय लेकर गई। वहां भी उनके साथ कथित रूप से मारपीट किए जाने का आरोप लगाया गया। किसान नेताओं के मुताबिक उनके हाथ-पैर बांधकर प्रताड़ित किया गया और तलवों, कमर तथा पीठ पर डंडे या फट्टों से मारने का आरोप लगाया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें गाने बजाकर नाचने के लिए कहा गया।
इन गंभीर आरोपों के सामने आने के बाद राजनीतिक प्रतिक्रिया भी शुरू हो गई। समाजवादी पार्टी के नेताओं ने मामले को लेकर एडीजी से शिकायत की और पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच की मांग की। किसान नेताओं की ओर से लगाए गए आरोपों के बाद पुलिस की कार्यप्रणाली और हिरासत में पूछताछ के तरीके को लेकर भी सवाल उठने लगे।
हालांकि, मेरठ पुलिस ने किसान नेताओं के आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है। पुलिस की ओर से जारी पक्ष में आरोपों को तथ्यहीन, असत्य और निराधार बताया गया। पुलिस के अनुसार, दोनों व्यक्तियों के खिलाफ पहले से कई मुकदमे दर्ज हैं और उन्हें अपने-अपने थाना क्षेत्रों का हिस्ट्रीशीटर बताया गया है।
पुलिस के मुताबिक 19 अगस्त को दिग्विजय भाटी और मोहित जाटव थाना सिविल लाइंस में दर्ज अपने मुकदमे के संबंध में पुलिस कार्यालय में वार्ता करने आए थे। पुलिस का कहना है कि बातचीत के बाद दोनों वापस जा रहे थे। इसी दौरान उनकी स्कूटी फिसल गई और दोनों गिरकर घायल हो गए।

पुलिस ने अपने दावे के समर्थन में यह भी बताया कि घटना के संबंध में दोनों ने स्वयं थाने पर लिखित प्रार्थना-पत्र दिया था। पुलिस के अनुसार यह प्रार्थना-पत्र जीडी संख्या 53 में शाम 5:31 बजे दर्ज किया गया था। पुलिस का कहना है कि इस रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होता है कि दोनों ने सड़क दुर्घटना में घायल होने की बात स्वयं दर्ज कराई थी।
मामले ने उस समय और गंभीर रूप ले लिया जब एसएसपी अविनाश पांडेय को मेरठ से हटाकर लखनऊ स्थित पुलिस मुख्यालय से संबद्ध कर दिया गया। इसके बाद घटना की जांच उच्च स्तर पर कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। एडीजी जोन भानु भास्कर ने मामले की जांच सहारनपुर के डीआईजी अभिषेक सिंह को सौंप दी है।
अब जांच अधिकारी के सामने दोनों पक्षों के दावों की पड़ताल करना बड़ी चुनौती है। एक तरफ किसान नेताओं ने पुलिस अधिकारियों पर गंभीर मारपीट और कथित थर्ड डिग्री देने के आरोप लगाए हैं, जबकि दूसरी ओर पुलिस का कहना है कि दोनों व्यक्ति स्कूटी फिसलने से घायल हुए थे। ऐसे में जांच में मेडिकल रिपोर्ट, पुलिस रिकॉर्ड, जीडी में दर्ज प्रार्थना-पत्र, सीसीटीवी फुटेज और उपलब्ध वीडियो जैसे साक्ष्यों की अहम भूमिका हो सकती है।
दिग्विजय भाटी द्वारा जारी किए गए चोटों वाले वीडियो को भी जांच का हिस्सा बनाया जा सकता है। जांच अधिकारी यह भी देख सकते हैं कि चोटें कब और किन परिस्थितियों में आईं। पुलिस कार्यालय और एसओजी कार्यालय में उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज से घटनाक्रम की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है।
मामले में यह भी महत्वपूर्ण होगा कि 19 अगस्त को दोनों किसान नेताओं की पुलिस अधिकारियों से मुलाकात के दौरान क्या घटनाक्रम हुआ। उनके पुलिस कार्यालय पहुंचने से लेकर वहां से निकलने तक की गतिविधियों और बाद में स्कूटी से गिरने की पुलिस की बात की स्वतंत्र रूप से जांच की जाएगी।
फिलहाल किसी भी पक्ष के आरोपों को अंतिम सत्य मानना जल्दबाजी होगी। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि किसान नेताओं द्वारा लगाए गए पुलिस बर्बरता के आरोपों में कितनी सच्चाई है या पुलिस द्वारा बताई गई सड़क दुर्घटना की वजह से चोटें आई थीं।
इस मामले ने पुलिस हिरासत में मानवाधिकार और पुलिस आचरण से जुड़े सवाल भी खड़े कर दिए हैं। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय या कानूनी कार्रवाई की स्थिति बन सकती है। वहीं, यदि आरोपों की पुष्टि नहीं होती है तो पुलिस का पक्ष मजबूत होगा।
फिलहाल सहारनपुर के डीआईजी अभिषेक सिंह की जांच रिपोर्ट का इंतजार है। रिपोर्ट सामने आने के बाद ही मेरठ के इस विवादित मामले की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट होगी और आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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