
उत्तर प्रदेश, संजय सिंह। दशलक्षण धर्म केवल धार्मिक अनुष्ठानों और परंपराओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को आत्मनिरीक्षण, आत्मसंयम और आत्मशुद्धि की राह दिखाने वाली मानवता की एक ऐसी पाठशाला है, जो व्यक्ति के भीतर सकारात्मक परिवर्तन लाने का संदेश देती है। पर्यूषण पर्व के आध्यात्मिक एवं मानवीय महत्व पर प्रकाश डालते हुए समाजसेवी पंकज जैन ने कहा कि मनुष्य के जीवन की वास्तविक सफलता बाहरी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि अपने भीतर के विकारों पर विजय प्राप्त करने से तय होती है।
पंकज जैन ने कहा कि आज मनुष्य आधुनिक जीवन की भागदौड़, प्रतिस्पर्धा और तनाव के बीच लगातार बाहरी दुनिया में सफलता हासिल करने की कोशिश कर रहा है। धन, प्रतिष्ठा, पद और सुविधाओं को जीवन की उपलब्धि माना जाता है, लेकिन इन सबके बीच व्यक्ति कई बार अपने भीतर झांकना भूल जाता है। ऐसे समय में पर्यूषण पर्व और दशलक्षण धर्म मनुष्य को कुछ समय के लिए बाहरी दुनिया से ध्यान हटाकर अपने अंतर्मन की ओर देखने की प्रेरणा देते हैं।
उन्होंने कहा कि सच्ची विजय दूसरों पर विजय प्राप्त करने में नहीं, बल्कि अपने भीतर मौजूद क्रोध, अहंकार, माया और लोभ जैसे विकारों पर विजय हासिल करने में है। जब व्यक्ति अपने विचारों, व्यवहार और भावनाओं पर नियंत्रण करना सीखता है, तभी उसके व्यक्तित्व में वास्तविक परिवर्तन आता है। यही आत्मविजय दशलक्षण धर्म की मूल भावना को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
आत्मशुद्धि और आत्मनिरीक्षण का पर्व
समाजसेवी पंकज जैन ने कहा कि पर्यूषण पर्व का उद्देश्य केवल धार्मिक क्रियाओं का पालन करना नहीं है। इसका वास्तविक महत्व आत्मशुद्धि, आत्मनिरीक्षण और अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने की भावना में निहित है। व्यक्ति को अपने व्यवहार और कर्मों की समीक्षा करनी चाहिए तथा यह विचार करना चाहिए कि उसके कारण किसी दूसरे व्यक्ति को जाने-अनजाने दुख तो नहीं पहुंचा।
उन्होंने कहा कि मनुष्य से गलतियां होना स्वाभाविक है, लेकिन अपनी गलती को स्वीकार करना और उसे सुधारने का प्रयास करना व्यक्ति को महान बनाता है। पर्यूषण इसी आत्ममंथन की प्रेरणा देता है। यह पर्व मनुष्य को अपने भीतर मौजूद कमियों को पहचानने और उन्हें दूर करने का अवसर देता है।
दशलक्षण धर्म में बताए गए दस धर्म—उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य—मानव जीवन को अनुशासित और सकारात्मक बनाने के विभिन्न आयामों को सामने रखते हैं।
दस धर्मों में छिपा जीवन का संदेश
पंकज जैन ने कहा कि उत्तम क्षमा व्यक्ति को क्रोध और प्रतिशोध की भावना से ऊपर उठने की प्रेरणा देती है। जीवन में किसी के प्रति मन में लंबे समय तक द्वेष रखना स्वयं व्यक्ति के लिए भी मानसिक बोझ बन जाता है। क्षमा का भाव मन को हल्का और संबंधों को बेहतर बनाने में सहायता करता है।
उत्तम मार्दव अर्थात विनम्रता मनुष्य को अहंकार से दूर रहने का संदेश देता है। व्यक्ति के पास कितना भी ज्ञान, धन या पद क्यों न हो, यदि उसके व्यवहार में विनम्रता नहीं है तो उसके व्यक्तित्व में अधूरापन रह जाता है। विनम्रता व्यक्ति को दूसरों का सम्मान करना सिखाती है।
उत्तम आर्जव सरलता और निष्कपटता की भावना है। व्यक्ति के विचार, वाणी और व्यवहार में एकरूपता होनी चाहिए। छल-कपट और दिखावे से दूर रहकर सरल एवं ईमानदार जीवन जीने का संदेश आर्जव के माध्यम से मिलता है।
उत्तम शौच आंतरिक पवित्रता और संतोष की भावना से जुड़ा है। केवल बाहरी स्वच्छता ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि मन को भी लोभ, ईर्ष्या और नकारात्मक विचारों से मुक्त करने की आवश्यकता है। संतोष व्यक्ति को अनावश्यक लालच से बचाता है।
उत्तम सत्य मनुष्य को सत्य बोलने और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। सत्य केवल शब्दों तक सीमित नहीं, बल्कि व्यवहार और जीवन के आचरण में भी दिखाई देना चाहिए।
संयम और तप का महत्व
पंकज जैन ने कहा कि आधुनिक जीवन में उत्तम संयम का महत्व और भी बढ़ जाता है। आज मनुष्य के सामने अनेक प्रकार के आकर्षण और इच्छाएं हैं। ऐसे में अपनी इच्छाओं और व्यवहार पर नियंत्रण रखना जीवन को संतुलित बनाए रखने में मदद करता है।
उन्होंने कहा कि उत्तम तप का अर्थ केवल कठिन धार्मिक साधना तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। तप व्यक्ति को इच्छाओं पर नियंत्रण, अनुशासन और आत्मबल का अभ्यास कराता है। कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखना भी आत्मसंयम का हिस्सा है।
उत्तम त्याग मनुष्य को आवश्यकता से अधिक संग्रह और स्वार्थ की भावना से दूर करता है। व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार दूसरों की सहायता और समाज के हित में योगदान करने की भावना विकसित करनी चाहिए। वहीं उत्तम आकिंचन्य व्यक्ति को अनावश्यक मोह और संग्रह की भावना से मुक्त होने का संदेश देता है।
उत्तम ब्रह्मचर्य मनुष्य को अपनी ऊर्जा, विचारों और इंद्रियों पर संयम रखने की प्रेरणा देता है। इन सभी गुणों को जीवन में अपनाने से व्यक्ति के व्यवहार और सोच में सकारात्मक बदलाव आ सकता है।

तनावपूर्ण जीवन में शांति का मार्ग
पंकज जैन ने कहा कि वर्तमान समय में जीवन की गति बहुत तेज हो गई है। काम का दबाव, प्रतिस्पर्धा, आर्थिक चिंताएं और सामाजिक अपेक्षाएं व्यक्ति के जीवन में तनाव बढ़ा सकती हैं। ऐसे समय में दशलक्षण धर्म के सिद्धांत मानसिक संतुलन और शांति का मार्ग दिखा सकते हैं।
उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति क्षमा, विनम्रता, सरलता, संतोष, सत्य, संयम और करुणा जैसे गुणों को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाए तो उसके संबंधों में भी सकारात्मक बदलाव आ सकता है। परिवार में आपसी समझ, समाज में सहयोग और व्यक्तिगत जीवन में संतुलन स्थापित करने में ऐसे मानवीय मूल्यों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।
उनके अनुसार, दशलक्षण धर्म का संदेश किसी एक वर्ग या समुदाय तक सीमित नहीं है। इसके मूल में मौजूद क्षमा, सत्य, संयम, त्याग, अहिंसा और करुणा जैसे मूल्य व्यापक मानवीय जीवन से जुड़े हैं। इसलिए इन्हें दैनिक जीवन में अपनाने से समाज में सौहार्द और परस्पर सम्मान की भावना को मजबूत किया जा सकता है।
मिच्छामी दुक्कड़म् और क्षमावाणी का संदेश
पंकज जैन ने मिच्छामी दुक्कड़म् और क्षमावाणी को पर्यूषण पर्व का अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश बताया। उन्होंने कहा कि मनुष्य जाने-अनजाने में दूसरों को दुख पहुंचा सकता है। कई बार शब्दों, व्यवहार या किसी निर्णय के कारण किसी दूसरे व्यक्ति की भावनाएं आहत हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में अपनी गलती स्वीकार करना और क्षमा मांगना व्यक्ति के आत्मबल को कम नहीं करता, बल्कि उसके व्यक्तित्व में विनम्रता को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि इसी प्रकार दूसरों की गलतियों को क्षमा करने की भावना भी मनुष्य को मानसिक रूप से मजबूत बनाती है। लंबे समय तक मन में बैर या द्वेष रखना व्यक्ति के स्वयं के लिए भी बोझ बन सकता है। क्षमा का भाव उस बोझ को कम कर सकता है और रिश्तों में नई शुरुआत का अवसर दे सकता है।
उन्होंने कहा कि अहिंसा, दया और करुणा का भाव समाज में आपसी विश्वास को मजबूत करता है। यदि लोग एक-दूसरे की भावनाओं और अधिकारों का सम्मान करें तथा विवादों का समाधान संवाद और समझदारी से करने का प्रयास करें तो सामाजिक वातावरण अधिक सौहार्दपूर्ण बन सकता है।
भीतर की जीत ही वास्तविक विजय
अंत में पंकज जैन ने कहा कि पर्यूषण पर्व मनुष्य को बाहरी दुनिया को जीतने से पहले अपने भीतर झांकने की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति यदि अपने क्रोध पर नियंत्रण कर ले, अहंकार को त्याग दे, लोभ से ऊपर उठे, सत्य को अपनाए, दूसरों के प्रति करुणा रखे और अपनी गलतियों को स्वीकार करने का साहस विकसित करे, तो यह उसके जीवन की बड़ी उपलब्धि होगी।
उन्होंने कहा कि “पर्यूषण हमें बाहर की दुनिया जीतने से पहले अपने भीतर झांकने और स्वयं को जीतने की प्रेरणा देता है। यही दशलक्षण धर्म का वास्तविक संदेश और मानव जीवन की सार्थकता है।”
उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि पर्व के दौरान केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित न रहें, बल्कि दशलक्षण धर्म के मूल संदेश को अपने व्यवहार और दैनिक जीवन में उतारने का प्रयास करें। क्षमा, विनम्रता, सत्य, संयम, त्याग और करुणा जैसे गुणों को जीवन का हिस्सा बनाने से व्यक्ति स्वयं भी बेहतर बन सकता है और परिवार तथा समाज में सकारात्मक वातावरण बनाने में योगदान दे सकता है।
इस दृष्टि से दशलक्षण धर्म आत्ममंथन और आत्मपरिवर्तन का अवसर प्रदान करता है। पर्यूषण का संदेश व्यक्ति को यह याद दिलाता है कि वास्तविक शांति और संतोष बाहर की उपलब्धियों से नहीं, बल्कि मन की निर्मलता और अच्छे आचरण से प्राप्त होते हैं। यही संदेश मानव जीवन को अधिक सार्थक, संवेदनशील और सकारात्मक दिशा देने की प्रेरणा देता है।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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