
लखनऊ/प्रतापगढ़। बहुचर्चित सीओ जियाउल हक हत्याकांड मामले में कुंडा विधायक और जनसत्ता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया को बड़ी कानूनी राहत मिली है। लखनऊ स्थित विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीबीआई) की अदालत ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर ली है। अदालत के इस फैसले के बाद राजा भैया समेत पांच लोगों के खिलाफ इस मामले में आगे की अदालती कार्रवाई फिलहाल समाप्त हो गई है।
यह मामला वर्ष 2013 में प्रतापगढ़ के कुंडा क्षेत्र में हुए बहुचर्चित तिहरे हत्याकांड से जुड़ा है। तत्कालीन क्षेत्राधिकारी (सीओ) जियाउल हक की हत्या के बाद इस प्रकरण ने पूरे प्रदेश में व्यापक चर्चा पैदा की थी। मामले की जांच पहले स्थानीय स्तर पर हुई, लेकिन बाद में इसकी गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय जांच ब्यूरो को जांच सौंपी गई। जियाउल हक की पत्नी परवीन आजाद की ओर से दर्ज कराई गई चौथी एफआईआर में तत्कालीन कुंडा विधायक रघुराज प्रताप सिंह समेत पांच लोगों को नामजद किया गया था।
2013 में हुई थी सीओ जियाउल हक की हत्या
कुंडा क्षेत्र में वर्ष 2013 में हुए तिहरे हत्याकांड में ग्राम प्रधान नन्हे यादव और सुरेश यादव की हत्या के बाद मौके पर पहुंचे सीओ जियाउल हक की भी हत्या कर दी गई थी। घटना के बाद अलग-अलग पहलुओं को लेकर चार एफआईआर दर्ज की गई थीं। इनमें पुलिस की ओर से दर्ज मुकदमे के अलावा प्रधान नन्हे यादव और सुरेश यादव की हत्या से संबंधित मामले भी शामिल थे।
जियाउल हक की पत्नी परवीन आजाद की ओर से दर्ज कराई गई चौथी एफआईआर में राजा भैया समेत पांच लोगों को नामजद किया गया था। इसके बाद मामले की जांच सीबीआई को सौंपे जाने के साथ ही यह प्रकरण लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा बना रहा।
राजा भैया की भूमिका को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे और इसी के चलते मामले की जांच तथा अदालत में होने वाली सुनवाई पर लगातार नजर बनी रही। हालांकि, जांच एजेंसी की ओर से उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अलग-अलग चरणों में स्थिति बदलती रही।
CBI ने पहले भी दाखिल की थी क्लोजर रिपोर्ट
सीबीआई ने इस मामले में जांच पूरी करने के बाद 31 जुलाई 2013 को पहली क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी। इस रिपोर्ट का दिवंगत सीओ की पत्नी परवीन आजाद ने विरोध किया था और अदालत में प्रोटेस्ट प्रार्थना पत्र दाखिल किया था। इसके बाद अदालत ने मामले की दोबारा विवेचना का रास्ता खोला।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अदालत के 8 जुलाई 2014 के आदेश के बाद मामले में दोबारा विवेचना की गई। बाद की जांच में भी सीबीआई ने राजा भैया समेत नामजद लोगों के खिलाफ अभियोजन चलाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं पाया और 22 दिसंबर 2023 को फिर क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की।
यह दूसरा जांच चरण इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि मामले में पहले की जांच और क्लोजर रिपोर्ट पर सवाल उठाए गए थे। दोबारा जांच के बाद एजेंसी की ओर से अदालत में प्रस्तुत रिपोर्ट ने उन आरोपों के संबंध में उपलब्ध सामग्री और साक्ष्यों का आकलन किया।
अदालत ने स्वीकार की CBI की रिपोर्ट
अब विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीबीआई) प्रतिभा सिंह की अदालत ने सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है। रिपोर्ट स्वीकार किए जाने के साथ ही राजा भैया समेत पांच लोगों के खिलाफ इस मामले में आगे अदालती कार्रवाई नहीं होगी।
अदालत के फैसले के बाद इस मामले में राजा भैया के खिलाफ आगे कार्रवाई की मांग पर फिलहाल विराम लग गया है। दिवंगत सीओ की पत्नी की ओर से सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट का विरोध किया गया था, लेकिन अदालत ने एजेंसी की रिपोर्ट स्वीकार कर ली।
इस फैसले को मामले की लंबी कानूनी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। करीब 13 वर्ष से अधिक समय तक यह मामला अलग-अलग जांच और न्यायिक प्रक्रियाओं से गुजरता रहा। अब अदालत द्वारा क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार किए जाने के बाद नामजद पांच लोगों के खिलाफ इस मामले में आगे की कार्यवाही का रास्ता फिलहाल बंद हो गया है।
दोबारा जांच के बाद भी नहीं मिला अभियोजन का आधार
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सीबीआई की ओर से दोबारा विवेचना के बाद भी राजा भैया और अन्य नामजद लोगों के खिलाफ अभियोजन चलाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं पाया गया। अदालत के समक्ष प्रस्तुत क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार किए जाने का अर्थ यही है कि उपलब्ध जांच सामग्री के आधार पर इस विशेष मामले में आगे आपराधिक कार्यवाही जारी रखने का आधार अदालत को नहीं मिला।
हालांकि, किसी क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार किए जाने को मामले से जुड़े प्रत्येक तथ्य पर किसी व्यापक न्यायिक टिप्पणी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। अदालत का फैसला संबंधित जांच और उसके सामने प्रस्तुत सामग्री के आधार पर हुआ है।

अन्य आरोपियों के मामले में हुई थी सुनवाई
जियाउल हक हत्याकांड से जुड़े अन्य आरोपियों के खिलाफ अलग से चली न्यायिक प्रक्रिया में भी अदालत ने फैसला सुनाया था। रिपोर्टों के अनुसार, अक्टूबर 2024 में इस मामले के 10 आरोपियों को दोषी ठहराया गया था और उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। इससे स्पष्ट है कि जियाउल हक हत्याकांड से जुड़े विभिन्न मुकदमों और आरोपियों की कानूनी स्थिति अलग-अलग रही है।
यही वजह है कि राजा भैया से संबंधित क्लोजर रिपोर्ट और अन्य आरोपियों के खिलाफ हुई सुनवाई को अलग-अलग न्यायिक प्रक्रियाओं के रूप में देखा जाना जरूरी है। एक मामले में आरोप तय होने या दोषसिद्धि होने का प्रभाव स्वतः दूसरे नामजद व्यक्ति पर नहीं पड़ता, बल्कि प्रत्येक आरोपी के खिलाफ उपलब्ध साक्ष्य और उसकी भूमिका के आधार पर न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
लंबे समय से जारी थी कानूनी प्रक्रिया
सीओ जियाउल हक हत्याकांड उत्तर प्रदेश के उन चर्चित मामलों में रहा है, जिसमें पुलिस जांच से लेकर सीबीआई जांच और अदालत की कार्यवाही तक लंबी प्रक्रिया चली। घटना के बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी इस मामले की चर्चा हुई थी। राजा भैया की भूमिका को लेकर आरोप लगाए गए, जिनका मामला अदालत और जांच एजेंसी के सामने विभिन्न स्तरों पर विचाराधीन रहा।
पहली क्लोजर रिपोर्ट के बाद विरोध, फिर दोबारा जांच और उसके बाद दूसरी क्लोजर रिपोर्ट तक पहुंचना इस मामले की लंबी कानूनी यात्रा को दर्शाता है। वर्ष 2023 में दाखिल की गई दूसरी क्लोजर रिपोर्ट पर अदालत में सुनवाई जारी रही। अब सितंबर 2026 में विशेष सीबीआई अदालत ने उसे स्वीकार कर लिया है।
फैसले के बाद राजनीतिक और कानूनी हलकों में चर्चा
अदालत के फैसले के बाद राजा भैया को लेकर यह मामला एक बार फिर चर्चा में है। उनके समर्थकों की ओर से इसे लंबे समय से चले आ रहे मामले में महत्वपूर्ण राहत के तौर पर देखा जा रहा है। वहीं, मामले में शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से पहले क्लोजर रिपोर्ट का विरोध किए जाने का तथ्य भी इस प्रकरण की कानूनी पृष्ठभूमि का हिस्सा है।
फिलहाल अदालत के आदेश के बाद राजा भैया समेत पांच लोगों के खिलाफ इस मामले में आगे की अदालती कार्यवाही नहीं होगी। इस प्रकार 2013 में शुरू हुआ यह कानूनी विवाद एक महत्वपूर्ण चरण पर पहुंच गया है।
13 साल बाद महत्वपूर्ण पड़ाव
वर्ष 2013 की घटना से शुरू हुई जांच और कानूनी प्रक्रिया ने कई चरण देखे। पहले जांच, फिर सीबीआई को जांच, पहली क्लोजर रिपोर्ट, उसके खिलाफ आपत्ति, दोबारा विवेचना और फिर दूसरी क्लोजर रिपोर्ट—इन सभी प्रक्रियाओं के बाद अब अदालत ने सीबीआई की रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है।
अदालत के इस फैसले से राजा भैया के खिलाफ जियाउल हक हत्याकांड से जुड़े इस मामले में आगे की कार्रवाई फिलहाल समाप्त हो गई है। हालांकि, मामले से जुड़े अन्य मुकदमों और अलग-अलग आरोपियों की न्यायिक स्थिति को इससे अलग रखकर देखा जाएगा।
इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि सीबीआई की दोबारा जांच के बाद दाखिल क्लोजर रिपोर्ट को विशेष अदालत ने स्वीकार कर लिया है। इसके साथ ही राजा भैया समेत पांच लोगों के खिलाफ इस मुकदमे में आगे की अदालती कार्यवाही पर विराम लग गया है।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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