
मुंबई/रायगढ़।
महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के कर्जत-भीमाशंकर क्षेत्र में प्रस्तावित 3,000 मेगावाट क्षमता वाली जलविद्युत परियोजना को लेकर पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा गरमा गया है। टोरेंट पावर कंपनी की सैडोंगर-I कर्जत पंप स्टोरेज हाइड्रोइलेक्ट्रिक परियोजना के लिए 32,490 से अधिक पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव सामने आने के बाद स्थानीय ग्रामीणों, पर्यावरण प्रेमियों और सामाजिक संगठनों ने विरोध शुरू कर दिया है। इस मामले में पर्यावरण संरक्षण के लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) से हस्तक्षेप करने और प्रस्तावित पेड़ कटाई पर रोक लगाने की मांग उठाई गई है। पर्यावरण से जुड़े लोगों का कहना है कि कर्जत-भीमाशंकर का इलाका पश्चिमी घाट की जैव विविधता और प्राकृतिक संपदा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। यहां बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई होने से जंगलों, वन्यजीवों, जलस्रोतों और स्थानीय आदिवासी समुदायों की आजीविका पर गंभीर असर पड़ सकता है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, प्रस्तावित परियोजना के लिए करीब 377 हेक्टेयर क्षेत्र की जरूरत है, जिसमें लगभग 233 हेक्टेयर वन भूमि शामिल है। वन भूमि के इस हस्तांतरण में 197 हेक्टेयर आरक्षित वन, 26 हेक्टेयर निजी वन और नौ हेक्टेयर संरक्षित वन भूमि का उल्लेख किया गया है। परियोजना की अनुमानित लागत करीब 13,505 करोड़ रुपये बताई जा रही है। इसके माध्यम से 3,000 मेगावाट बिजली उत्पादन की क्षमता विकसित करने की योजना है। परियोजना के लिए गुजरात की कंपनी टोरेंट पावर को जिम्मेदारी दी गई है। वन विभाग के दस्तावेजों के अनुसार, परियोजना क्षेत्र में कुल 32,490 पेड़ों की कटाई की अनुमति से संबंधित प्रक्रिया सामने आई है। इस प्रस्ताव के सामने आने के बाद स्थानीय लोगों में चिंता बढ़ गई है। ग्रामीणों का कहना है कि जिस जंगल को वे पीढ़ियों से अपनी आजीविका, पशुओं के चारे, जलावन, औषधीय पौधों और अन्य वन उपज के लिए इस्तेमाल करते आ रहे हैं, उसी जंगल को परियोजना के लिए साफ किया जा रहा है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इस मामले में एनजीटी और पर्यावरण मंत्रालय से पूरे प्रकरण की स्वतंत्र समीक्षा कराने की मांग की है। उनका कहना है कि पेड़ों की कटाई से पहले पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, वन्यजीव प्रभाव अध्ययन, जलस्रोतों पर पड़ने वाले प्रभाव और स्थानीय समुदायों के पुनर्वास से जुड़ी सभी जानकारियां सार्वजनिक की जानी चाहिए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि परियोजना के लिए कितने पेड़ों को काटना वास्तव में जरूरी है और क्या तकनीकी बदलाव करके पेड़ों की संख्या कम की जा सकती है। इस मुद्दे को लेकर उल्हास नदी बचाओ कृति समिति, शहीद दिलीप कपोटे फाउंडेशन और स्थानीय ग्रामीणों ने भी विरोध जताया है। पर्यावरण संगठनों का तर्क है कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते, बल्कि वे प्राकृतिक जलचक्र, वर्षा, मिट्टी की उर्वरता और वन्यजीवों के अस्तित्व को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विशेष रूप से पश्चिमी घाट का क्षेत्र जैव विविधता के लिए जाना जाता है। यहां तेंदुए, स्लॉथ भालू, सांभर, जंगली बिल्ली, भारतीय विशाल गिलहरी और अनेक प्रकार के पक्षियों एवं सरीसृपों का प्राकृतिक आवास है। परियोजना से संबंधित पर्यावरणीय अध्ययन में कुल 26 ऐसी वन्यजीव प्रजातियों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची-एक के अंतर्गत उच्चतम कानूनी संरक्षण प्राप्त है। इनमें 14 स्तनधारी, छह पक्षी और छह सरीसृप प्रजातियां शामिल हैं। पर्यावरणविदों का कहना है कि जंगलों का क्षेत्रफल कम होने से इन जीवों के प्राकृतिक आवास प्रभावित हो सकते हैं और मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ने की आशंका भी रहेगी। इसके अलावा पेड़ों की कटाई से पहाड़ी ढलानों की मिट्टी कमजोर होने, भूक्षरण बढ़ने और जलस्रोतों के प्राकृतिक प्रवाह पर असर पड़ने की चिंता जताई जा रही है।

पेज नदी इस क्षेत्र की महत्वपूर्ण नदी है,
जिसका उल्हास नदी से भी संबंध है। पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संगठनों का कहना है कि इस पूरे जलग्रहण क्षेत्र का समग्र अध्ययन किए बिना बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियों को आगे बढ़ाना उचित नहीं होगा। इस विवाद में आदिवासी समुदायों के अधिकारों का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि कई परिवार पीढ़ियों से जंगल पर निर्भर हैं और वन उपज एकत्र कर अपनी आजीविका चलाते हैं। वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत ऐसे समुदायों को परंपरागत वन अधिकारों का दावा करने का प्रावधान है। रिपोर्टों के अनुसार, पाली गांव में वन पर निर्भर परिवारों का रिकॉर्ड और उनके अधिकारों के दावों की प्रक्रिया पूरी नहीं होने का मुद्दा भी सामने आया है। वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि ग्रामसभा की ओर से पात्र परिवारों और उनके वन उपयोग से संबंधित औपचारिक अभिलेख उपलब्ध नहीं कराए गए, जिसके कारण मुआवजे और पुनर्वास की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। वहीं ग्रामीणों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्रभावित परिवारों के अधिकारों का उचित निर्धारण किए बिना परियोजना को आगे बढ़ाना उनके हितों के विपरीत हो सकता है। इस बीच पेड़ कटाई को लेकर विरोध तेज होने के बाद स्थानीय स्तर पर कार्रवाई भी अस्थायी रूप से रोक दी गई थी। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, पेड़ों की कटाई शुरू होने के बाद ग्रामीणों ने विरोध प्रदर्शन किया था और कई राजनीतिक नेताओं तथा पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने प्रभावित क्षेत्र का दौरा किया। इस दौरान करीब 1,100 पेड़ों की कटाई हो चुकी थी। विरोध बढ़ने पर वन विभाग ने कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए कटाई का काम अस्थायी रूप से रोक दिया। महाराष्ट्र के वन मंत्री गणेश नाइक ने भी परियोजना की समीक्षा करने और अधिक से अधिक पेड़ों को बचाने के विकल्प तलाशने की बात कही है। उन्होंने कहा कि परियोजना स्थल पर पेड़ों का संरक्षण करने के साथ प्रतिपूरक पौधरोपण बढ़ाने के उपायों पर विचार किया जा रहा है। दूसरी ओर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने परियोजना का समर्थन करते हुए कहा है कि इसे आवश्यक पर्यावरणीय और वन संबंधी मंजूरियों तथा निर्धारित प्रक्रियाओं के बाद स्वीकृति मिली है। सरकार का तर्क है कि पंप स्टोरेज परियोजना से बिजली की मांग के चरम समय में ऊर्जा उपलब्ध कराने और कोयले पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी। मुख्यमंत्री की ओर से परियोजना के तहत लगभग 90 हजार पौधे लगाने और वन विभाग को अतिरिक्त भूमि उपलब्ध कराने की योजना का भी उल्लेख किया गया है। परियोजना समर्थकों का मानना है कि इससे भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। हालांकि, पर्यावरण संगठनों का कहना है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। केवल पौधरोपण का आश्वासन पुराने जंगलों के पारिस्थितिक महत्व की भरपाई नहीं कर सकता, क्योंकि दशकों में विकसित प्राकृतिक वन व्यवस्था को दोबारा तैयार होने में लंबा समय लगता है। ऐसे में एनजीटी से मांग की जा रही है कि परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव, वन अधिकारों, वन्यजीव संरक्षण और पेड़ कटाई की अनुमति से जुड़े सभी दस्तावेजों की समीक्षा की जाए। साथ ही प्रभावित गांवों के लोगों की आपत्तियों और सुझावों को भी उचित महत्व दिया जाए। अब इस पूरे मामले में पर्यावरणीय समीक्षा और प्रशासनिक निर्णय पर सभी की नजरें टिकी हैं। कर्जत-भीमाशंकर क्षेत्र के जंगलों को बचाने की मांग कर रहे लोगों का कहना है कि बिजली उत्पादन और विकास जरूरी है, लेकिन इसके लिए प्राकृतिक संपदा और स्थानीय समुदायों के हितों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। आने वाले दिनों में एनजीटी और संबंधित सरकारी विभागों की ओर से उठाए जाने वाले कदम इस परियोजना के भविष्य के साथ-साथ क्षेत्र के पर्यावरण संरक्षण की दिशा भी तय कर सकते हैं।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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