
रांची।
झारखंड आंदोलन की कहानी केवल जंगलों, पहाड़ों और राजनीतिक संघर्षों की कहानी नहीं है। इसके पीछे उन परिवारों का भी संघर्ष छिपा है, जिन्होंने आंदोलनकारियों के साथ कदम से कदम मिलाकर कठिन परिस्थितियों का सामना किया। झारखंड मुक्ति आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल शिबू सोरेन यानी गुरुजी के संघर्ष में उनकी पत्नी रूपी सोरेन की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण रही। उन्होंने न केवल परिवार की जिम्मेदारियां संभालीं, बल्कि ऐसे कठिन दौर में पति का साथ दिया, जब शिबू सोरेन महाजनों और साहूकारों के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे और बाद में अलग झारखंड राज्य के आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए भूमिगत होकर जंगलों में रह रहे थे।
रूपी सोरेन का जीवन संघर्ष, साहस और धैर्य की ऐसी कहानी है, जो झारखंड आंदोलन के इतिहास के एक अनदेखे पहलू को सामने लाती है। एक ओर शिबू सोरेन गांव-गांव जाकर महाजनी प्रथा के खिलाफ लोगों को संगठित कर रहे थे, तो दूसरी ओर रूपी सोरेन घर और परिवार को संभालने के साथ-साथ मुश्किल परिस्थितियों में उनका मनोबल बनी हुई थीं।
महाजनों के खिलाफ संघर्ष में पति के साथ खड़ी रहीं रूपी सोरेन
शिबू सोरेन के शुरुआती संघर्ष का एक बड़ा हिस्सा आदिवासी समाज को महाजनों और साहूकारों के शोषण से मुक्त कराने से जुड़ा था। ग्रामीण इलाकों में महाजनी व्यवस्था के कारण बड़ी संख्या में लोग कर्ज के जाल में फंस जाते थे। जमीन और मेहनत पर दबंगों का प्रभाव बढ़ता जा रहा था। ऐसे समय में शिबू सोरेन ने लोगों को संगठित करना शुरू किया और महाजनों के खिलाफ आवाज उठाई।
इस संघर्ष की कीमत उन्हें और उनके परिवार को भी चुकानी पड़ी। बताया जाता है कि जब शिबू सोरेन को धमकाने के लिए महाजन के कुछ गुंडे उनके घर तक पहुंचे, तब रूपी सोरेन ने डरने के बजाय साहस दिखाया। उन्होंने हाथ में हंसुआ उठा लिया और उन लोगों को वहां से खदेड़ दिया।
यह घटना रूपी सोरेन के व्यक्तित्व की दृढ़ता को दिखाती है। उस दौर में गांव के एक सामान्य परिवार की महिला के लिए प्रभावशाली लोगों के खिलाफ इस तरह खड़े होना आसान नहीं था। लेकिन पति के संघर्ष और परिवार की सुरक्षा के लिए रूपी सोरेन पीछे नहीं हटीं।
अलग झारखंड राज्य के आंदोलन में बदले हालात
समय के साथ शिबू सोरेन का संघर्ष व्यापक होता गया। अलग झारखंड राज्य की मांग को लेकर आंदोलन तेज हुआ। आंदोलन के दौरान शिबू सोरेन को कई बार भूमिगत रहना पड़ा। धनबाद के टुंडी और गिरिडीह के पीरटांड़ के घने जंगल उस दौर में उनके संघर्ष के महत्वपूर्ण ठिकानों में रहे।
आज की तरह उस समय मोबाइल फोन या इंटरनेट जैसी संचार सुविधाएं नहीं थीं। भूमिगत आंदोलन चलाने वाले नेताओं के ठिकाने की जानकारी परिवार तक आसानी से नहीं पहुंच पाती थी। सुरक्षा कारणों से भी आंदोलनकारी लगातार अपने ठिकाने बदलते रहते थे।
शिबू सोरेन भी जंगल और पहाड़ों के बीच अपना ठिकाना बदलते रहते थे। हर रात नया स्थान चुनना पड़ता था। ऐसे में परिवार के लिए यह जानना बेहद मुश्किल होता था कि वह इस समय कहां हैं और सुरक्षित हैं या नहीं।
पति को खोजने जंगल तक पहुंचीं रूपी सोरेन
एक समय ऐसा आया जब शिबू सोरेन के बारे में काफी समय तक कोई जानकारी नहीं मिल पाई। पति की चिंता में रूपी सोरेन का मन घबरा उठा। उन्होंने घर में बैठकर इंतजार करने के बजाय उन्हें खोजने का फैसला किया।
बताया जाता है कि रूपी सोरेन अपनी सास और ननद के साथ जंगल की ओर निकल पड़ीं। जिस इलाके में शिबू सोरेन आंदोलन के दौरान छिपकर रहते थे, वहां पहुंचना किसी सामान्य यात्रा जैसा नहीं था। घने जंगल, पहाड़ी रास्ते और सुरक्षा का खतरा—इन सबके बीच अपने पति को तलाशना एक बड़ी चुनौती थी।
लेकिन रूपी सोरेन ने कठिनाइयों की परवाह नहीं की। वह जंगलों में अपने पति की तलाश करती रहीं। कई बार वह अपनी गोद में छोटे बेटे दुर्गा सोरेन को लेकर जंगलों की खाक छानती थीं।
यह तस्वीर झारखंड आंदोलन के उस दौर की कठिनाइयों को समझने के लिए काफी है। एक तरफ पति भूमिगत होकर आंदोलन को आगे बढ़ा रहे थे और दूसरी तरफ पत्नी छोटे बच्चों के साथ उनकी सलामती की चिंता में जंगलों तक पहुंच रही थीं।

गोद में नन्हे दुर्गा सोरेन और सामने घना जंगल
रूपी सोरेन के संघर्ष की सबसे भावुक तस्वीरों में से एक वह दौर है, जब वह अपने नन्हे बेटे दुर्गा सोरेन को गोद में लेकर पति की तलाश में जंगलों में घूमती थीं। उस समय दुर्गा सोरेन बहुत छोटे थे। एक मां के लिए बच्चे को लेकर घने जंगलों में जाना अपने आप में बड़ी चुनौती थी।
लेकिन परिवार की परिस्थितियां ऐसी थीं कि घर पर बैठकर इंतजार करना भी आसान नहीं था। शिबू सोरेन की सुरक्षा को लेकर लगातार चिंता बनी रहती थी। आंदोलन का दौर था और हर समय यह आशंका रहती थी कि कहीं कोई अप्रिय घटना न हो जाए।
रूपी सोरेन के लिए यह सिर्फ पति को खोजने की कोशिश नहीं थी, बल्कि परिवार और आंदोलन से जुड़े उस व्यक्ति की सुरक्षा की चिंता थी, जिसके संघर्ष ने आगे चलकर झारखंड की राजनीति को एक नई दिशा दी।
परिवार की जिम्मेदारी भी संभाली
शिबू सोरेन के लंबे राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष के दौरान परिवार की जिम्मेदारियों का बड़ा हिस्सा रूपी सोरेन के कंधों पर रहा। पति लंबे समय तक घर से दूर रहते थे। आंदोलन और राजनीतिक गतिविधियों के कारण उनका अधिकांश समय क्षेत्र में बीतता था।
ऐसे में बच्चों की देखभाल, घर-परिवार की जिम्मेदारी और मुश्किल परिस्थितियों का सामना रूपी सोरेन ने किया। परिवार के भीतर से मिलने वाला यह समर्थन किसी भी लंबे संघर्ष के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है।
शिबू सोरेन के सार्वजनिक जीवन की चर्चा अक्सर उनके राजनीतिक संघर्ष, आंदोलन और झारखंड की राजनीति में योगदान के संदर्भ में होती है। लेकिन उनके संघर्ष के पीछे परिवार द्वारा झेली गई परेशानियों की चर्चा अपेक्षाकृत कम होती है। रूपी सोरेन की कहानी इसी अनदेखे पक्ष को सामने लाती है।
संघर्ष के दिनों में पत्नी बनीं मजबूत सहारा
रूपी सोरेन का जीवन यह बताता है कि किसी बड़े आंदोलन की सफलता के पीछे केवल मंच पर नजर आने वाले नेताओं का योगदान नहीं होता। उनके परिवार और करीबी लोगों को भी कई तरह की परेशानियों से गुजरना पड़ता है।
जब शिबू सोरेन जंगलों में रहकर आंदोलन चला रहे थे, तब उनके परिवार के लिए हर दिन अनिश्चितता से भरा था। पति कब घर लौटेंगे, कहां हैं, सुरक्षित हैं या नहीं—इन सवालों के जवाब अक्सर नहीं मिलते थे। इसके बावजूद रूपी सोरेन ने परिवार को संभाले रखा।
महाजनों के खिलाफ संघर्ष के समय गुंडों को हंसुआ लेकर खदेड़ने की घटना हो या जंगलों में पति की तलाश में निकलना, दोनों घटनाएं उनके साहस को दर्शाती हैं।
झारखंड आंदोलन के इतिहास का अहम अनकहा अध्याय
झारखंड आंदोलन के इतिहास में शिबू सोरेन का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। उन्होंने आदिवासी समाज के अधिकारों और अलग झारखंड राज्य की मांग को लेकर लंबा संघर्ष किया। बाद में यही आंदोलन झारखंड राज्य के गठन की राजनीतिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।
लेकिन इस पूरे संघर्ष में परिवार के योगदान को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। रूपी सोरेन की भूमिका इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में परिवार को संभाला और पति के संघर्ष में उनका साथ दिया।
उनकी कहानी बताती है कि आंदोलन केवल सभाओं, नारों और राजनीतिक मंचों पर नहीं लड़ा जाता। कभी-कभी उसका सबसे कठिन हिस्सा घर की चारदीवारी और जंगलों के बीच भी चलता है।
रूपी सोरेन ने जिस दौर में अपने पति के संघर्ष का साथ दिया, वह आज के सुविधाओं से भरे दौर से बिल्कुल अलग था। न मोबाइल फोन थे, न तत्काल संदेश पहुंचाने की सुविधा। संपर्क का साधन सीमित था और जंगलों में भूमिगत रह रहे व्यक्ति तक पहुंचना बेहद मुश्किल था।
ऐसे समय में अपने पति की तलाश में जंगलों तक पहुंचने वाली रूपी सोरेन की कहानी साहस और धैर्य की मिसाल बनकर सामने आती है। उनके हाथ में कभी परिवार की जिम्मेदारी थी, तो कभी हंसुआ लेकर घर की रक्षा करने का साहस। वहीं गोद में नन्हे दुर्गा सोरेन को लेकर जंगलों में पति की तलाश करती एक मां की तस्वीर झारखंड आंदोलन के संघर्षपूर्ण इतिहास का भावुक अध्याय बन जाती है।
शिबू सोरेन के संघर्ष की कहानी जितनी राजनीतिक है, उतनी ही पारिवारिक भी। इस कहानी में रूपी सोरेन वह खामोश शक्ति थीं, जिनका योगदान शायद मंच पर कम दिखाई दिया, लेकिन कठिन समय में उनकी मौजूदगी ने परिवार और संघर्ष—दोनों को मजबूती दी।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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