
तेहरान/नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव को लेकर एक बार फिर क्षेत्रीय सुरक्षा पर बहस तेज हो गई है। ईरान की ओर से चेतावनी दी गई है कि यदि भविष्य में अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य संघर्ष दोबारा शुरू होता है, तो अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का समर्थन करने वाले देशों को तेहरान शत्रुतापूर्ण रुख अपनाने वाले देशों के रूप में देख सकता है। इस बयान के बाद पश्चिम एशिया की राजनीति, क्षेत्रीय गठबंधनों और अमेरिका के सहयोगी देशों की भूमिका को लेकर चर्चा बढ़ गई है।
ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति समिति के सदस्य फदा हुसैन मलिकी ने रूसी समाचार एजेंसी आरआईए नोवोस्ती को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि यदि दोनों देशों के बीच सैन्य कार्रवाई फिर से शुरू होती है, तो ईरान यह पहचानने में सक्षम होगा कि क्षेत्र के कौन-कौन से देश अमेरिकी सेना का समर्थन करने के लिए तैयार हैं। उनके बयान को ईरान की उस रणनीति के संकेत के रूप में देखा जा रहा है, जिसके तहत वह किसी संभावित संघर्ष में केवल सीधे सैन्य विरोधियों ही नहीं, बल्कि उनकी सहायता करने वाले देशों की भूमिका पर भी नजर रख सकता है।
इस बयान का महत्व इसलिए बढ़ जाता है, क्योंकि पश्चिम एशिया में अमेरिका की सैन्य उपस्थिति और विभिन्न देशों के साथ उसके सुरक्षा संबंध लंबे समय से क्षेत्रीय राजनीति का प्रमुख हिस्सा रहे हैं। ऐसे में किसी भी नए सैन्य टकराव का प्रभाव दो देशों तक सीमित रहने के बजाय व्यापक क्षेत्रीय समीकरणों पर पड़ सकता है।
पाकिस्तान पर सवाल: क्या ईरान की चेतावनी उसके लिए भी लागू होगी?
ईरान की चेतावनी के बाद एक सवाल उठना स्वाभाविक है—यदि अमेरिका का समर्थन करने वाले देशों को तेहरान शत्रुतापूर्ण मान सकता है, तो पाकिस्तान की भूमिका को किस नजरिए से देखा जाएगा? पाकिस्तान के अमेरिका के साथ लंबे समय से सैन्य, सुरक्षा और कूटनीतिक संबंध रहे हैं। दोनों देशों के बीच आतंकवाद-रोधी सहयोग और खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान जैसे विषय भी चर्चा में रहे हैं।1
लेकिन यह कहना कि पाकिस्तान अमेरिका का सबसे बड़ा समर्थक है और इसलिए ईरान उसे अपना दुश्मन घोषित करेगा, उपलब्ध तथ्यों के आधार पर निश्चित निष्कर्ष नहीं होगा। पाकिस्तान के ईरान के साथ भी पड़ोसी, सांस्कृतिक और कूटनीतिक संबंध हैं। वर्ष 2026 में पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता को आगे बढ़ाने में मध्यस्थ की भूमिका निभाने का दावा किया है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने भी दोनों देशों के साथ संबंध बनाए रखने और विवाद का शांतिपूर्ण समाधान निकालने पर जोर दिया है।
इसलिए पाकिस्तान की स्थिति को केवल अमेरिका के सहयोगी के रूप में देखना अधूरा होगा। उसके संबंध वाशिंगटन और तेहरान दोनों से हैं और वह क्षेत्रीय तनाव को कम करने की कोशिश भी कर रहा है।

अमेरिका के साथ संबंध और ईरान की सुरक्षा चिंताएं
ईरान की चेतावनी का मुख्य केंद्र उन देशों की भूमिका है, जो संभावित सैन्य संघर्ष के दौरान अमेरिकी सेना को अपने सैन्य ठिकानों, हवाई क्षेत्र या अन्य सुविधाओं के इस्तेमाल की अनुमति दे सकते हैं। ईरानी सांसद फदा हुसैन मलिकी के बयान के अनुसार, ऐसी सहायता देने वाले देशों को केवल उनके क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों के आधार पर नहीं, बल्कि उनके अपने निर्णयों के आधार यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। किसी देश के अमेरिका के साथ राजनयिक या सैन्य संबंध होने का अर्थ अपने आप यह नहीं है कि वह ईरान के खिलाफ किसी सैन्य अभियान में शामिल है। इसी तरह, किसी देश में अमेरिकी सैन्य सुविधाओं की मौजूदगी और उन सुविधाओं का ईरान के खिलाफ इस्तेमाल किया जाना भी अलग-अलग परिस्थितियां हैं।
पाकिस्तान के मामले में यह देखना होगा कि वह किसी संभावित संघर्ष में क्या वास्तविक कदम उठाता है। केवल उसके पुराने संबंधों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि ईरान उसे शत्रु घोषित कर देगा।
क्या पाकिस्तान को लेकर ईरान कोई कदम उठाएगा?
फिलहाल सामने आए बयान में ईरानी सांसद ने क्षेत्रीय देशों को व्यापक चेतावनी दी है। इसमें पाकिस्तान को विशेष रूप से दुश्मन घोषित किए जाने की कोई स्पष्ट घोषणा नहीं है। इसलिए यह कहना कि तेहरान पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई करने जा रहा है, अटकल होगी।
दूसरी ओर, पाकिस्तान और ईरान के बीच सीमा सुरक्षा, व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे विषय पहले से महत्वपूर्ण हैं। दोनों देशों के लिए यह आवश्यक होगा कि अमेरिका-ईरान तनाव का असर उनके द्विपक्षीय संबंधों पर न पड़े। पाकिस्तान की मध्यस्थता की भूमिका भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो सकती है।
निष्कर्ष
ईरान की चेतावनी का संदेश स्पष्ट है—यदि अमेरिका के साथ सैन्य संघर्ष दोबारा शुरू होता है, तो तेहरान उन देशों की भूमिका पर भी नजर रखेगा जो अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में सहायता करेंगे। लेकिन पाकिस्तान को लेकर कोई अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले उसके वास्तविक कदमों और ईरान की आधिकारिक प्रतिक्रिया को देखना जरूरी है।
सबसे अहम सवाल यह नहीं है कि पाकिस्तान अमेरिका का कितना करीबी सहयोगी है, बल्कि यह है कि किसी संभावित युद्ध में वह किस पक्ष को किस प्रकार की सहायता देता है। इसी आधार पर ईरान की चेतावनी का पाकिस्तान पर संभावित असर समझा जा सकता है।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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