
जयपुर।
सिनेमा का परदा जब बुझता है, तो सिर्फ रोशनी नहीं जाती, उस पर जिए गए किरदारों की रूह भी कहीं दूर अनंत में विलीन हो जाती है। आज सुबह गोवा के समंदर किनारे जब नाना पाटेकर ने 75 बरस की उम्र में अपनी आखिरी सांस ली, तो उसका दर्द सिर्फ मुंबई के फिल्म स्टूडियोज तक सीमित नहीं रहा। यह टीस सुदूर राजस्थान के उस चंबल तक महसूस की गई, जहां की मिट्टी और बीहड़ों से नाना का एक अजीब सा रूहानी और अनगढ़ रिश्ता बन चुका था। धौलपुर से सुमित कुमार मंगल जैसे आम सिनेमा-प्रेमी का वह पैगाम जेहन में कौंध जाता है, जिसमें उन्होंने लिखा था—”हमारे धौलपुर में आपका बहुत अभिनंदन, कृपया यहीं ठहरिए…”। यह किसी फिल्मी मुरीद की महज औपचारिकता नहीं थी, यह उस अपनेपन की पुकार थी जो नाना ने अपनी सादगी से कमाई थी। मगर अफसोस, मुकद्दर के डायरेक्टर ने जिंदगी का दृश्य ही बदल दिया। जिस कलाकार को धौलपुर के लोग अपने बीहड़ों, अपनी गलियों और अपनी माटी में बार-बार लौटते देखना चाहते थे, वह अब उस यात्रा पर निकल गया है जहां से कोई लौटकर नहीं आता। राजस्थान की सरजमीं और नाना के मिजाज में गजब का साम्य था। यहां की तपती धूप, अरावली के खुरदुरे पत्थर और चंबल के बीहड़—ये सब नाना के उस अनगढ़ चेहरे और तल्ख आवाज का ही अक्स लगते थे।

साल 2002 में आई ‘शक्ति: द पावर’ में उनका निभाया ‘नरसिम्हा’ भले ही दक्षिण के गांव की पृष्ठभूमि पर था, लेकिन उसके भीतर जो सामंती अकड़ और देहाती रौब था, उसकी रगों में उत्तर भारत और चंबल के इलाकों की ही तासीर महसूस होती थी। प्रकाश झा की ‘राजनीति’ (2010) में नाना का ‘ब्रज गोपाल’ जब स्क्रीन पर धीमी आवाज में कूटनीति के पासे फेंकता था, तो लगता था कि यह शख्स इस पूरे अंचल की नब्ज से वाकिफ है।
और फिर हाल के दिनों में चंबल का वह किनारा, धौलपुर का भसेना गांव और वहां के बीहड़, जहां नाना अपनी फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में धूल फांकते नजर आए थे। फाइव-स्टार होटलों के आदी सितारों से अलग, नाना चंबल की इस बीहड़ जमीन पर ऐसे घुले-मिले जैसे वे यहीं के किसी गांव के बाशिंदे हों। धौलपुर के होनहार नौजवानों को उनमें एक शिक्षक, एक फकीर और एक सच्चा इंसान दिखाई दिया था।
आज जब वे हमेशा के लिए खामोश हो गए हैं, तो लगता है कि चंबल की उन खाइयों में एक भारी सन्नाटा पसर गया है। जिस कलाकार को यहां के लोग अपनी चौखट पर ठहरने की गुजारिश कर रहे थे, वह कायनात के उस पार चला गया।
अलविदा नाना! चंबल के बीहड़ और राजस्थान की हवाएं आपकी उस खनकदार आवाज, उस बेबाक मुस्कान और उस अनगढ़ अदाकारी को कभी भुला नहीं पाएंगी। परदे का नायक चला गया, मगर माटी में आपकी यादों की खुशबू हमेशा महकती रहेगी।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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