
नई दिल्ली।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की चुनाव व्यवस्था और मतदाता पहचान प्रणाली का उल्लेख करते हुए अमेरिका में चुनावी नियमों को और सख्त बनाने की अपनी मांग दोहराई है। ट्रंप ने भारत में बड़े पैमाने पर मतदान के बावजूद मतदाता पहचान व्यवस्था के इस्तेमाल को अमेरिकी चुनाव व्यवस्था के संदर्भ में उदाहरण के तौर पर पेश किया। इस दौरान उन्होंने भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार का भी जिक्र किया।
ट्रंप ने अमेरिका में प्रस्तावित SAVE America Act को पारित करने की अपील करते हुए कहा कि अमेरिकी चुनावों में मतदाता पहचान और नागरिकता की पुष्टि से संबंधित नियमों को मजबूत किया जाना चाहिए। यह कानून अमेरिकी संघीय चुनावों में मतदाता पंजीकरण के समय नागरिकता का प्रमाण और मतदान के समय पहचान-पत्र से जुड़ी आवश्यकताओं को मजबूत करने का प्रस्ताव रखता है।
भारत का उदाहरण देते हुए ट्रंप ने 2024 के लोकसभा चुनाव में लगभग 64.6 करोड़ लोगों के मतदान का उल्लेख किया। उन्होंने भारत में फोटो पहचान व्यवस्था और पोस्टल बैलेट के सीमित इस्तेमाल को अमेरिकी चुनावी बहस के संदर्भ में रखा।
ट्रंप के अनुसार, भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ हुई बातचीत में अमेरिकी चुनावों में पहचान-पत्र से जुड़े नियमों पर चर्चा हुई थी। रिपोर्टों के मुताबिक, 12 अगस्त को CEC ज्ञानेश कुमार और भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के बीच मुलाकात भी हुई थी, जिसमें भारत की मतदाता पहचान व्यवस्था और चुनावी प्रक्रिया से संबंधित जानकारी साझा की गई थी।
अमेरिका में SAVE America Act क्यों चर्चा में है?
SAVE का पूरा नाम Safeguard American Voter Eligibility है। प्रस्तावित कानून का उद्देश्य अमेरिकी संघीय चुनावों में मतदाता पात्रता से जुड़े नियमों को सख्त करना है। इसमें मतदाता पंजीकरण के समय अमेरिकी नागरिकता का प्रमाण प्रस्तुत करने तथा मतदान के समय पहचान-पत्र की आवश्यकता से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। ट्रंप प्रशासन इस विधेयक का जोरदार समर्थन कर रहा है।
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने फरवरी 2026 में विधेयक को मंजूरी दी थी, लेकिन इसे लेकर अमेरिकी राजनीति में मतभेद बने हुए हैं। रिपब्लिकन नेता इसे चुनावी प्रक्रिया में विश्वास बढ़ाने वाला कदम बताते हैं, जबकि विरोधी पक्ष का तर्क है कि अतिरिक्त दस्तावेजी आवश्यकताएं कुछ पात्र मतदाताओं के लिए मतदान को कठिन बना सकती हैं।
ट्रंप पहले भी इस कानून के समर्थन में वोटर ID, नागरिकता का प्रमाण और डाक से मतदान पर सीमित अपवादों के साथ प्रतिबंध जैसे मुद्दे उठा चुके हैं।

भारत की चुनाव व्यवस्था पर अंतरराष्ट्रीय चर्चा
ट्रंप की टिप्पणी के बाद भारत की चुनाव प्रणाली एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा में आ गई है। भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों में शामिल है और यहां करोड़ों मतदाता चुनाव प्रक्रिया में भाग लेते हैं। भारतीय चुनावों में मतदाता पहचान, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM), मतदाता सूची और अन्य प्रक्रियाओं को लेकर समय-समय पर सार्वजनिक तथा राजनीतिक बहस होती रही है।
भारत के विदेश मंत्रालय ने ट्रंप की टिप्पणी के संदर्भ में भारतीय चुनावी मशीनरी की विश्वसनीयता को लेकर कहा कि इसकी साख वैश्विक स्तर पर अच्छी तरह स्थापित है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 18 अगस्त को भारतीय चुनावी व्यवस्था की वैश्विक विश्वसनीयता का उल्लेख किया।
हालांकि, भारत में चुनावी व्यवस्था को लेकर राजनीतिक बहस भी जारी है। EVM, VVPAT, मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े कई मुद्दे अलग-अलग मौकों पर अदालतों तक पहुंचे हैं। लोकतंत्र में चुनावी संस्थाओं की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठाना संवैधानिक बहस का हिस्सा है, लेकिन किसी भी आरोप या दावे को तथ्य और प्रमाण के आधार पर ही देखा जाना चाहिए।
इसी संदर्भ में यह सवाल भी उठता रहा है कि चुनावी प्रक्रिया पर विश्वास किस तरह बनाए रखा जाए। किसी राजनीतिक दल की जीत या हार के आधार पर चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता तय करना लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए उचित दृष्टिकोण नहीं माना जा सकता। चुनाव जीतने वाली पार्टी के लिए चुनावी प्रक्रिया को विश्वसनीय और हारने पर उसी प्रक्रिया को अविश्वसनीय बताने जैसी राजनीतिक बहसें अक्सर सामने आती हैं।
लोकतंत्र में जनता का जनादेश सर्वोच्च महत्व रखता है। साथ ही चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के लिए जरूरी है। इसलिए चुनावी प्रक्रिया पर उठने वाले सवालों का समाधान तथ्य, कानून और संस्थागत प्रक्रिया के माध्यम से होना महत्वपूर्ण है।
ट्रंप की टिप्पणी का राजनीतिक असर
अमेरिका में नवंबर 2026 के मध्यावधि चुनावों से पहले वोटर ID और नागरिकता प्रमाण का मुद्दा अमेरिकी राजनीति में प्रमुख बहस बना हुआ है। ट्रंप लंबे समय से SAVE America Act को पारित कराने की मांग कर रहे हैं। उन्होंने भारत के चुनावी मॉडल का उल्लेख करके अपनी मांग को नया अंतरराष्ट्रीय संदर्भ दिया है।
भारत के लिए यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक चुनावों में इस्तेमाल होने वाली पहचान व्यवस्था को अमेरिकी बहस में उदाहरण के रूप में रखा है। हालांकि भारत और अमेरिका की चुनावी प्रणालियां अलग-अलग संवैधानिक, प्रशासनिक और सामाजिक परिस्थितियों में काम करती हैं। इसलिए किसी एक देश की व्यवस्था को दूसरे देश में सीधे लागू करने के बजाय दोनों देशों की परिस्थितियों को ध्यान में रखना आवश्यक होगा।
ट्रंप की टिप्पणी के बाद भारत में भी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने CEC ज्ञानेश कुमार को लेकर व्यंग्यात्मक टिप्पणी की। इससे स्पष्ट है कि अमेरिकी राष्ट्रपति की टिप्पणी भारत की घरेलू राजनीतिक बहस से भी जुड़ गई है।
कुल मिलाकर, डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय चुनाव व्यवस्था और मतदाता पहचान प्रणाली का उल्लेख अमेरिका की घरेलू चुनावी बहस के बीच हुआ है। उन्होंने भारत के बड़े पैमाने पर मतदान और पहचान व्यवस्था को अमेरिकी चुनावों में सख्त नियमों के समर्थन में उदाहरण के रूप में इस्तेमाल किया है।
भारत के लिए यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चुनावी व्यवस्था की चर्चा का महत्वपूर्ण अवसर है, लेकिन लोकतंत्र की मजबूती केवल पहचान-पत्र या मतदान तकनीक से तय नहीं होती। स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव, पारदर्शिता, मतदाता सूची की शुद्धता, संस्थाओं की विश्वसनीयता, नागरिकों की भागीदारी और जनता के जनादेश का सम्मान—ये सभी लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार हैं।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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