
जयपुर।
देशभर में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर चल रहे राजनीतिक विवाद और विरोध के बीच भारत निर्वाचन आयोग ने राजस्थान समेत 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में मतदाता सूची के स्पेशल समरी रिवीजन (SSR) की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश जारी किए हैं। इस प्रक्रिया के तहत राजस्थान में मतदाता सूची को अपडेट किया जाएगा, ताकि पात्र नागरिकों के नाम सूची में शामिल किए जा सकें और पहले से दर्ज नामों, पते तथा अन्य विवरणों में मौजूद गलतियों को सुधारा जा सके। इस अभियान का विशेष फोकस पहली बार मतदाता बनने वाले युवाओं पर है। एक जनवरी 2027 तक 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले युवा भी मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए अग्रिम आवेदन कर सकेंगे।
निर्वाचन आयोग की इस पहल को आगामी चुनावों के मद्देनजर मतदाता सूची को अधिक व्यवस्थित और अद्यतन बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, देश के कई हिस्सों में मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस जारी है। विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों की ओर से मतदाता सूची में नाम हटाए जाने, पात्र नागरिकों के अधिकारों और अलग-अलग चुनावों में इस्तेमाल की जा रही सूचियों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। ऐसे में राजस्थान में एसएसआर की प्रक्रिया शुरू होने से एक बार फिर मतदाता पंजीकरण और सूची की विश्वसनीयता का मुद्दा चर्चा में आ गया है।
14 अक्टूबर तक मिले 4 लाख 80 हजार से अधिक आवेदन
राजस्थान में नए मतदाताओं को पंजीकृत करने और मतदाता सूची से अब तक वंचित रहे पात्र नागरिकों के नाम जोड़ने के लिए एक अक्टूबर 2026 से विशेष अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान के अंतर्गत 18 से 19 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं के साथ-साथ 20 वर्ष या उससे अधिक आयु के उन नागरिकों को भी आवेदन करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिनका नाम अभी तक मतदाता सूची में दर्ज नहीं है।
राजस्थान के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवीन महाजन के अनुसार, 14 अक्टूबर 2026 तक राज्यभर में नए मतदाता पंजीकरण के लिए फॉर्म-6 के माध्यम से कुल 4 लाख 80 हजार 893 आवेदन प्राप्त हुए हैं। इन आंकड़ों से पता चलता है कि प्रदेश में बड़ी संख्या में नागरिक मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने के लिए आगे आ रहे हैं।
प्राप्त आवेदनों में सबसे बड़ी भागीदारी पहली बार मतदान करने की तैयारी कर रहे युवाओं की है। आंकड़ों के मुताबिक, 18 से 19 वर्ष आयु वर्ग के 2 लाख 67 हजार 946 युवाओं ने मतदाता बनने के लिए आवेदन किया है। वहीं, 20 वर्ष या उससे अधिक आयु वर्ग के 2 लाख 12 हजार 947 नागरिकों ने भी फॉर्म-6 भरकर मतदाता सूची में नाम शामिल कराने की पहल की है।
ये आंकड़े इस बात का संकेत देते हैं कि युवा मतदाता लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने के लिए उत्साहित हैं। हालांकि, आवेदन प्राप्त होना और मतदाता सूची में नाम दर्ज होना दो अलग-अलग चरण हैं। सभी आवेदनों का नियमानुसार सत्यापन किए जाने के बाद ही पात्र आवेदकों के नाम मतदाता सूची में शामिल किए जाएंगे।
पहली बार वोट डालने वाले युवाओं पर विशेष ध्यान
मतदाता सूची के पुनरीक्षण में युवा वर्ग की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। 18 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद प्रत्येक पात्र नागरिक को मतदान का अधिकार प्राप्त होता है। इसके बावजूद कई बार जानकारी के अभाव, समय पर आवेदन नहीं करने, निवास संबंधी दस्तावेजों या अन्य कारणों से युवाओं के नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो पाते।
इसी को ध्यान में रखते हुए निर्वाचन आयोग की ओर से पंजीकरण प्रक्रिया को बढ़ावा दिया जा रहा है। राजस्थान में चल रहे अभियान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पात्र नागरिकों को मतदाता बनने का अवसर मिले और वे चुनाव के दौरान अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकें।
एक जनवरी 2027 तक 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले युवाओं के लिए अग्रिम आवेदन की सुविधा भी महत्वपूर्ण है। इससे पात्रता की निर्धारित तिथि तक पहुंचने वाले युवा समय रहते पंजीकरण प्रक्रिया शुरू कर सकेंगे। इससे अंतिम समय में आवेदन का दबाव कम करने और मतदाता सूची को समय पर अपडेट करने में सहायता मिलने की उम्मीद है।
हालांकि, आवेदन करते समय नागरिकों को अपने विवरण सही तरीके से भरने चाहिए। नाम, जन्मतिथि, पता और अन्य आवश्यक जानकारियों में गलती होने पर आवेदन के सत्यापन में परेशानी हो सकती है। इसलिए आवेदन जमा करने के बाद उसकी स्थिति और मतदाता सूची में नाम दर्ज होने की जानकारी प्राप्त करना भी जरूरी है।
SIR प्रक्रिया के दौरान 31 लाख से अधिक नाम हटाए जाने पर विवाद
राजस्थान में मतदाता सूची को लेकर मौजूदा चर्चा की एक प्रमुख वजह पहले हुई एसआईआर प्रक्रिया भी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस प्रक्रिया के दौरान प्रदेश में 31 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए थे। नाम हटाए जाने की संख्या को लेकर राजनीतिक स्तर पर सवाल उठे और मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया पर बहस शुरू हुई।

शुरुआती दौर में कांग्रेस की ओर से भाजपा नेताओं पर सुनियोजित तरीके से मतदाताओं के नाम कटवाने के लिए आवेदन देने के आरोप लगाए गए थे। इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी भी हुई। बाद में प्रशासनिक स्तर पर इस संबंध में स्पष्टीकरण दिए जाने की बात सामने आई।
मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का मामला संवेदनशील इसलिए भी है, क्योंकि मतदान का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि किसी अपात्र व्यक्ति का नाम सूची में दर्ज है, तो नियमों के अनुसार उसे हटाना आवश्यक हो सकता है। वहीं, किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से हटने या दर्ज नहीं होने से उसके मतदान के अधिकार पर असर पड़ सकता है।
इसी कारण मतदाता सूची के पुनरीक्षण में पारदर्शिता, निर्धारित नियमों का पालन और नागरिकों को अपनी आपत्ति दर्ज कराने का अवसर देना महत्वपूर्ण माना जाता है। निर्वाचन प्रक्रिया की विश्वसनीयता के लिए यह भी आवश्यक है कि नाम जोड़ने और हटाने से संबंधित कार्रवाई उचित सत्यापन के आधार पर हो।
पंचायत और निकाय चुनावों में पुरानी मतदाता सूची के इस्तेमाल पर सवाल
एसआईआर को लेकर विवाद के बीच राजस्थान में पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान इस्तेमाल की जा रही मतदाता सूचियों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। सामाजिक संगठनों का कहना है कि मतदाता सूची के अलग-अलग संस्करणों के इस्तेमाल से भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। इस मुद्दे पर मजदूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस) से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे ने चिंता जताई है।
निखिल डे के अनुसार, राजस्थान में एसआईआर के तहत करीब 45 लाख नाम काटे जाने की बात सामने आई थी, जबकि वर्तमान में चल रहे पंचायतीराज चुनावों और हालिया शहरी निकाय चुनावों में एसआईआर से पहले तैयार की गई मतदाता सूची का इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने इस स्थिति पर सवाल उठाते हुए मतदाता सूची के इस्तेमाल में स्पष्टता की आवश्यकता बताई।
उनका सवाल है कि यदि एसआईआर के बाद तैयार की गई सूची को स्वीकार किया गया है, तो पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों में उससे पहले की सूची का उपयोग क्यों किया जा रहा है। वहीं, यदि एसआईआर के बाद की सूची में त्रुटियों या अन्य कारणों से बदलाव की जरूरत थी, तो उसके बारे में स्पष्ट जानकारी सामने आनी चाहिए।
यह सवाल केवल प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध मतदाताओं के अधिकार और चुनावी व्यवस्था की पारदर्शिता से भी है। अलग-अलग चुनावों में अलग-अलग मतदाता सूचियों का उपयोग होने पर नागरिकों के बीच भ्रम पैदा हो सकता है। ऐसे में यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि किस चुनाव के लिए कौन-सी सूची मान्य है और उसमें नाम दर्ज कराने या सुधार कराने की प्रक्रिया क्या है।
हालांकि, पंचायत, शहरी निकाय और विधानसभा या लोकसभा चुनावों के लिए मतदाता सूची तैयार करने तथा उनका उपयोग करने की प्रक्रिया में कानूनी और प्रशासनिक अंतर हो सकते हैं। इसलिए इस मामले में संबंधित चुनावी नियमों और आधिकारिक निर्देशों के आधार पर स्थिति स्पष्ट किया जाना जरूरी है।
पारदर्शिता और सही पंजीकरण होगी बड़ी चुनौती
राजस्थान में एसएसआर की प्रक्रिया ऐसे समय में शुरू हो रही है, जब मतदाता सूची की शुद्धता और नागरिकों के मताधिकार को लेकर राजनीतिक तथा सामाजिक स्तर पर बहस जारी है। एक ओर निर्वाचन आयोग के सामने पात्र नागरिकों के नाम जोड़ने और गलतियों को सुधारने की जिम्मेदारी है, तो दूसरी ओर यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि किसी पात्र मतदाता का नाम अनावश्यक रूप से सूची से बाहर न रहे।
प्रदेश में अब तक मिले 4 लाख 80 हजार 893 आवेदन इस अभियान में नागरिकों की भागीदारी को दर्शाते हैं। इनमें 2 लाख 67 हजार 946 युवा आवेदकों की संख्या विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यदि इन आवेदनों का समय पर सत्यापन और नियमानुसार निस्तारण होता है, तो बड़ी संख्या में नए मतदाता लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुड़ सकेंगे।
आने वाले दिनों में इस अभियान की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि निर्वाचन अधिकारी आवेदन प्रक्रिया को कितना सरल और पारदर्शी बनाते हैं, नागरिकों की शिकायतों का समाधान किस तरह किया जाता है और मतदाता सूची में संशोधन की जानकारी कितनी स्पष्टता से उपलब्ध कराई जाती है।
फिलहाल, राजस्थान में मतदाता सूची को अपडेट करने की तैयारी के साथ ही एसआईआर के दौरान हटाए गए नामों और पंचायत-निकाय चुनावों में पुरानी सूची के इस्तेमाल को लेकर बहस जारी है। ऐसे में निर्वाचन आयोग और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों के लिए जरूरी होगा कि वे नियमों के अनुरूप प्रक्रिया पूरी करें और मतदाता सूची से जुड़े सवालों पर स्पष्ट जानकारी उपलब्ध कराएं, ताकि पात्र नागरिकों का मतदान का अधिकार सुरक्षित रहे और चुनावी व्यवस्था के प्रति लोगों का विश्वास मजबूत हो सके।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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