Silence prevailed : बाराबंकी के किंतूर गांव से जुड़ा अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी का ऐतिहासिक पुश्तैनी रिश्ता और पसरा सन्नाटा ?

Silence prevailed : बाराबंकी के किंतूर गांव से जुड़ा अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी का ऐतिहासिक पुश्तैनी रिश्ता और पसरा सन्नाटा

Silence prevailed : बाराबंकी के किंतूर गांव से जुड़ा अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी का ऐतिहासिक पुश्तैनी रिश्ता और पसरा सन्नाटा
Silence prevailed : बाराबंकी के किंतूर गांव से जुड़ा अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी का ऐतिहासिक पुश्तैनी रिश्ता और पसरा सन्नाटा

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले की सिरौली गौसपुर तहसील में स्थित किंतूर गांव

इन दिनों अचानक चर्चा का केंद्र बन गया है। वजह है ईरान की 1979 की इस्लामी क्रांति के जनक और पहले सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी से जुड़ा उसका ऐतिहासिक संबंध। जैसे ही ईरान से जुड़ी बड़ी खबरें सोशल मीडिया और टीवी चैनलों के माध्यम से गांव तक पहुंचीं, यहां का माहौल एकदम बदल गया। रोजमर्रा की चहल-पहल की जगह खामोशी ने ले ली और लोग अपने-अपने घरों में बैठकर समाचार देखने लगे।

खुमैनी का पुश्तैनी नाता बाराबंकी के इसी किंतूर गांव से बताया जाता है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार उनके दादा सैयद अहमद मूसवी 19वीं सदी के शुरुआती दौर में यहां के निवासी थे। कहा जाता है कि वे लगभग 1830 के आसपास अवध के नवाब के साथ यात्रा पर निकले और बाद में ईरान के खुमैन शहर में जाकर बस गए। खुमैन में बसने के बाद भी परिवार ने अपनी भारतीय जड़ों को नहीं भुलाया। यही कारण था कि उनके नाम के साथ ‘हिंदी’ उपनाम जुड़ा रहा, जो इस बात का संकेत था कि उनकी मूल उत्पत्ति हिंदुस्तान से है।

किंतूर गांव में आज भी ‘सैयद वाड़ा’ नाम से जाना जाने वाला इलाका मौजूद है, जहां काजमी परिवार के लोग रहते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यही वह इलाका है जहां कभी खुमैनी के पूर्वजों का घर हुआ करता था। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि कुछ पुराने दस्तावेज, वंशावली से जुड़े कागजात और पुश्तैनी मकानों के अवशेष आज भी इस ऐतिहासिक रिश्ते की गवाही देते हैं। हालांकि समय के साथ बहुत कुछ बदल गया है, लेकिन स्मृतियां अब भी जीवित हैं।

1978-79 के दौर में जब ईरान में शाह का शासन था और खुमैनी के नेतृत्व में विरोध तेज हो रहा था, तब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी हुए। उस समय शाह के समर्थकों द्वारा खुमैनी को ‘भारतीय मूल का मुल्ला’ कहकर उनकी छवि धूमिल करने की कोशिश की गई थी। लेकिन यह रणनीति उलटी पड़ गई। इससे उनकी लोकप्रियता और बढ़ी, क्योंकि समर्थकों ने इसे उनके खिलाफ साजिश के रूप में देखा। अंततः 1979 में ईरान की इस्लामी क्रांति सफल हुई और खुमैनी देश के सर्वोच्च नेता बने।

किंतूर गांव के लोगों के लिए यह रिश्ता सिर्फ इतिहास की बात नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव का विषय है। स्थानीय निवासी सैय्यद निहाल मियां ने नम आंखों से कहा कि यह सिर्फ ईरान का नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का नुकसान है। उनके मुताबिक, खुमैनी को लोग एक बड़े धार्मिक और राजनीतिक नेता के रूप में जानते थे, जिनका प्रभाव सीमाओं से परे था। गांव के कई लोग उन्हें अपने ‘मूल से जुड़ा हुआ व्यक्तित्व’ मानते हैं।

Silence prevailed : बाराबंकी के किंतूर गांव से जुड़ा अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी का ऐतिहासिक पुश्तैनी रिश्ता और पसरा सन्नाटा
Silence prevailed : बाराबंकी के किंतूर गांव से जुड़ा अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी का ऐतिहासिक पुश्तैनी रिश्ता और पसरा सन्नाटा

डॉ. रेहान काजमी ने भी दुख व्यक्त करते हुए कहा कि यह एक ऐतिहासिक क्षति है।

उन्होंने बताया कि किंतूर और ईरान के बीच यह संबंध वर्षों से चर्चा का विषय रहा है। कई शोधकर्ता और पत्रकार भी समय-समय पर गांव आकर इस संबंध की पड़ताल करते रहे हैं। गांव के कुछ परिवार आज भी अपने वंश वृक्ष में इस कड़ी को सहेजकर रखते हैं और आने वाली पीढ़ियों को इसके बारे में बताते हैं।

खबर फैलते ही गांव में एक अलग तरह का सन्नाटा छा गया। चौराहों पर होने वाली सामान्य बातचीत की जगह लोग गंभीर चर्चा करते नजर आए। कई घरों में टीवी पर समाचार चैनल चल रहे थे और लोग घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए थे। बुजुर्ग आपस में बैठकर पुराने किस्से दोहरा रहे थे कि कैसे उनके पूर्वजों ने इस ऐतिहासिक संबंध के बारे में बताया था। युवाओं के लिए यह जानकारी सोशल मीडिया के माध्यम से नई थी, लेकिन बुजुर्गों के लिए यह वर्षों पुरानी स्मृति का हिस्सा रही है।

किंतूर का यह संबंध न सिर्फ एक परिवार या गांव की कहानी है, बल्कि यह उस दौर की झलक भी देता है जब भारत और ईरान के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक संबंधों का आदान-प्रदान हुआ करता था। 18वीं और 19वीं सदी में कई विद्वान, सूफी और धार्मिक व्यक्तित्व एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र की यात्रा करते थे। सैयद अहमद मूसवी का ईरान जाना भी उसी परंपरा का हिस्सा माना जाता है।

आज जब वैश्विक घटनाएं कुछ ही मिनटों में दुनिया के कोने-कोने तक पहुंच जाती हैं, तब एक छोटे से गांव का नाम अंतरराष्ट्रीय चर्चा में आना अपने आप में अनोखी बात है। किंतूर के लोग इस ऐतिहासिक जुड़ाव को गर्व और संवेदना, दोनों भावनाओं के साथ याद कर रहे हैं। उनके लिए यह सिर्फ अतीत की कहानी नहीं, बल्कि पहचान का एक हिस्सा है।

गांव के कई लोग मानते हैं कि इस संबंध को शोध और दस्तावेजीकरण के माध्यम से और विस्तार से सामने लाया जाना चाहिए। इससे न केवल स्थानीय इतिहास को पहचान मिलेगी, बल्कि भारत और ईरान के बीच सांस्कृतिक रिश्तों की एक अनूठी मिसाल भी सामने आएगी। फिलहाल किंतूर में पसरा सन्नाटा इस बात का प्रतीक है कि इतिहास कभी पूरी तरह पीछे नहीं छूटता; वह समय-समय पर वर्तमान में लौटकर लोगों को अपनी जड़ों की याद दिलाता रहता है।

News Editor- (Jyoti Parjapati)

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