Success : चाय लेने गए सिपाही को मिली एसडीएम बनने की खबर, श्याम बाबू की संघर्ष और सफलता की कहानी बनी मिसाल ?

Success : चाय लेने गए सिपाही को मिली एसडीएम बनने की खबर, श्याम बाबू की संघर्ष और सफलता की कहानी बनी मिसाल
Success : चाय लेने गए सिपाही को मिली एसडीएम बनने की खबर, श्याम बाबू की संघर्ष और सफलता की कहानी बनी मिसाल

बलिया।

मेहनत, लगन और दृढ़ इच्छाशक्ति के दम पर मुश्किल से मुश्किल लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के श्याम बाबू की कहानी भी इसी बात का उदाहरण है। पुलिस की वर्दी पहनकर वर्षों तक ड्यूटी करने के साथ उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की। आखिरकार वर्ष 2019 में घोषित उत्तर प्रदेश पीसीएस-2016 के परिणाम में उन्होंने 52वीं रैंक हासिल की और डिप्टी कलेक्टर के पद पर चयनित हुए। उनकी सफलता की कहानी इसलिए भी चर्चा में आई, क्योंकि जिस दिन परिणाम आया, उस दिन वह प्रयागराज में पुलिस मुख्यालय में हेड कांस्टेबल के रूप में तैनात थे। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अधिकारी के लिए चाय लेने जाते समय उन्हें चयन की सूचना मिली और चाय लेकर लौटने पर उन्होंने अधिकारी को बताया कि उनका चयन डिप्टी कलेक्टर के पद पर हो गया है। यह खबर सुनकर अधिकारी ने खड़े होकर उन्हें सलामी दी।

श्याम बाबू की कहानी उन युवाओं के लिए प्रेरणा देती है, जो आर्थिक कठिनाइयों और नौकरी की जिम्मेदारियों के बीच अपने सपनों को पूरा करने का प्रयास करते हैं। हालांकि, उनकी कहानी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि बाद में जाति प्रमाणपत्र के सत्यापन से जुड़े विवाद के कारण उनकी नियुक्ति निरस्त कर दी गई थी। इसलिए उनकी सफलता के साथ इस पूरे घटनाक्रम को जानना भी जरूरी है।

बलिया के छोटे से गांव से शुरू हुआ सफर

श्याम बाबू मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की बैरिया तहसील के इब्राहिमाबाद गांव के निवासी हैं। उनका परिवार साधारण आर्थिक पृष्ठभूमि से जुड़ा था। उनके पिता धर्मनाथ गांव में किराने की छोटी दुकान चलाते थे। परिवार की जिम्मेदारियों और सीमित संसाधनों के बीच श्याम बाबू ने अपनी पढ़ाई जारी रखी। उपलब्ध समाचार रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने वर्ष 2001 में हाईस्कूल और वर्ष 2003 में इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की।

वर्ष 2005 में उनका चयन उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाही के पद पर हो गया। परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उन्होंने नौकरी को जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार किया, लेकिन पढ़ाई और आगे बढ़ने की इच्छा को समाप्त नहीं होने दिया। पुलिस की ड्यूटी के साथ उन्होंने निजी तौर पर पढ़ाई जारी रखी और वर्ष 2008 में स्नातक की डिग्री हासिल की। इसके बाद परास्नातक की पढ़ाई भी पूरी की।

नौकरी के साथ जारी रखी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी

पुलिस विभाग में नौकरी करते हुए पढ़ाई के लिए समय निकालना आसान नहीं था। ड्यूटी का समय, विभागीय जिम्मेदारियां और परिवार की अपेक्षाओं के बीच उन्होंने अपने लक्ष्य पर ध्यान बनाए रखा। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने स्नातक की पढ़ाई के बाद ही पीसीएस की तैयारी शुरू कर दी थी, लेकिन वर्ष 2013 के बाद वह परीक्षा को लेकर अधिक गंभीर हुए। प्रयागराज में तैनाती के दौरान उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए बेहतर माहौल मिला और उन्होंने अपनी मेहनत तेज कर दी।

श्याम बाबू ने पीसीएस परीक्षा में सफलता पाने के लिए लगातार प्रयास किए। शुरुआती असफलताओं के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी। नौकरी के साथ पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी जारी रखी। इसी दौरान उन्होंने यूजीसी नेट की परीक्षा भी उत्तीर्ण की। उनकी यह उपलब्धि बताती है कि नियमित मेहनत और समय का सही उपयोग करके नौकरी के साथ भी उच्च शिक्षा हासिल की जा सकती है।

Success : चाय लेने गए सिपाही को मिली एसडीएम बनने की खबर, श्याम बाबू की संघर्ष और सफलता की कहानी बनी मिसाल
Success : चाय लेने गए सिपाही को मिली एसडीएम बनने की खबर, श्याम बाबू की संघर्ष और सफलता की कहानी बनी मिसाल

पीसीएस-2016 में मिली 52वीं रैंक

श्याम बाबू के जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ फरवरी 2019 में आया, जब उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की पीसीएस-2016 परीक्षा का अंतिम परिणाम घोषित हुआ। 23 फरवरी 2019 को जारी परिणाम में उन्होंने 52वीं रैंक हासिल की। उनका चयन डिप्टी कलेक्टर के पद पर हुआ। लगभग 14 वर्षों तक पुलिस विभाग में सेवा देने के बाद प्रशासनिक अधिकारी बनने की खबर से उनके परिवार और गांव में खुशी का माहौल बन गया।यह उपलब्धि केवल उनकी व्यक्तिगत सफलता नहीं थी, बल्कि उन युवाओं के लिए भी संदेश थी जो सीमित संसाधनों के कारण बड़े सपने देखने से हिचकते हैं। श्याम बाबू ने दिखाया कि सरकारी नौकरी मिलने के बाद भी सीखने और आगे बढ़ने का रास्ता बंद नहीं होता।

चाय वाला प्रसंग बना चर्चा का विषय

उनकी सफलता से जुड़ा एक प्रसंग मीडिया में काफी चर्चित हुआ। बताया गया कि परिणाम आने के दिन श्याम बाबू पुलिस मुख्यालय में हेड कांस्टेबल के रूप में ड्यूटी कर रहे थे। इसी दौरान अधिकारी ने उन्हें चाय लाने के लिए भेजा। जब वह चाय लेने जा रहे थे, तभी उन्हें फोन पर पीसीएस परीक्षा में चयन की जानकारी मिली।

चयन की खबर सुनकर उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वह चाय लेकर वापस अधिकारी के पास पहुंचे और उन्हें बताया कि उनका चयन डिप्टी कलेक्टर के पद पर हो गया है। मीडिया रिपोर्टों में इस घटना का उल्लेख है कि अधिकारी ने उनकी उपलब्धि पर खुशी जताई और खड़े होकर उन्हें सलामी दी। यह प्रसंग उस बदलाव का प्रतीक बन गया, जिसमें वर्षों तक वरिष्ठ अधिकारियों को सलाम करने वाला एक पुलिसकर्मी स्वयं प्रशासनिक अधिकारी बनने की राह पर पहुंच गया था।

सफलता के बाद नियुक्ति को लेकर सामने आया विवाद

श्याम बाबू की कहानी का एक महत्वपूर्ण और जरूरी पहलू वर्ष 2020 में सामने आया। पीसीएस-2016 में अनुसूचित जनजाति श्रेणी के प्रमाणपत्र के आधार पर चयनित होने के बाद उनके जाति प्रमाणपत्र की वैधता को चुनौती दी गई थी। इस मामले में जांच और अपील की प्रक्रिया चली। अगस्त 2020 में प्रकाशित समाचार रिपोर्टों के अनुसार, जांच में प्रमाणपत्र को अमान्य पाए जाने के बाद शासन ने उनकी नियुक्ति निरस्त करने का आदेश जारी किया। उस समय उनकी तैनाती संतकबीर नगर में उप जिलाधिकारी (परिवीक्षाधीन) के रूप में थी।

इस घटनाक्रम के कारण उनकी सफलता की कहानी एक अलग मोड़ पर पहुंच गई। इसलिए श्याम बाबू के संघर्ष और पीसीएस परीक्षा में मिली उपलब्धि का उल्लेख करते समय नियुक्ति निरस्त होने की इस बाद की घटना को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

युवाओं के लिए क्या है इस कहानी का संदेश?

श्याम बाबू का सफर बताता है कि परिस्थितियां कठिन हों, नौकरी की जिम्मेदारियां हों या संसाधनों की कमी, शिक्षा और मेहनत के जरिए आगे बढ़ने का प्रयास जारी रखा जा सकता है। उनकी कहानी का प्रेरणादायक पक्ष यह है कि उन्होंने पुलिस की नौकरी करते हुए भी अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ी और प्रतियोगी परीक्षा में उल्लेखनीय रैंक हासिल की।

हालांकि, किसी भी सरकारी पद पर चयन के लिए मेहनत के साथ पात्रता और दस्तावेजों की वैधता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। श्याम बाबू के मामले में सामने आया प्रमाणपत्र विवाद इस बात की याद दिलाता है कि सफलता की प्रक्रिया में नियमों और निर्धारित मानकों का पालन अनिवार्य है।

कुल मिलाकर, बलिया के श्याम बाबू का जीवन-सफर संघर्ष, शिक्षा, महत्वाकांक्षा और प्रशासनिक चयन की एक चर्चित कहानी है। चाय लेकर लौटने और अधिकारी को अपने चयन की जानकारी देने वाला प्रसंग आज भी लोगों के बीच प्रेरक किस्से के रूप में सुनाया जाता है, लेकिन उनकी पूरी कहानी जानने के लिए बाद में हुई नियुक्ति निरस्तीकरण की कार्रवाई को भी समझना जरूरी है।

 

News Editor- (Jyoti Parjapati)

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