Slap incident : वाराणसी में कानून बनाम रसूख की टकराहट, थप्पड़ कांड ने पुलिस व्यवस्था उठाए सवाल ?

Slap incident : वाराणसी में कानून बनाम रसूख की टकराहट, थप्पड़ कांड ने पुलिस व्यवस्था उठाए सवाल

Slap incident : वाराणसी में कानून बनाम रसूख की टकराहट, थप्पड़ कांड ने पुलिस व्यवस्था उठाए सवाल
Slap incident : वाराणसी में कानून बनाम रसूख की टकराहट, थप्पड़ कांड ने पुलिस व्यवस्था उठाए सवाल

उत्तर प्रदेश की आध्यात्मिक राजधानी वाराणसी एक बार फिर कानून, सत्ता और रसूख की टकराहट को लेकर चर्चा के केंद्र में है। बाबा विश्वनाथ की नगरी में घटित यह घटना न केवल स्थानीय प्रशासन, बल्कि पूरे पुलिस तंत्र की कार्यशैली और सामाजिक संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े करती है। सरेराह एक दरोगा को थप्पड़ मारे जाने की यह घटना जितनी चौंकाने वाली है, उतनी ही चिंताजनक भी।

घटना वाराणसी के नो-व्हीकल जोन क्षेत्र की है, जहां सुरक्षा और यातायात नियमों का सख्ती से पालन कराया जाता है। ड्यूटी पर तैनात एक दरोगा ने नियमों के तहत बाइक सवार युवक को नो-व्हीकल जोन में जाने से रोका। लेकिन नियम मानने के बजाय युवक ने खुद को भाजपा पार्षद का बेटा बताते हुए दरोगा को सरेआम थप्पड़ जड़ दिया। युवक का नाम हिमांशु श्रीवास्तव बताया जा रहा है, जो एक भाजपा पार्षद का पुत्र है।

सबसे गंभीर पहलू यह है कि यह घटना किसी सुनसान जगह पर नहीं, बल्कि सार्वजनिक सड़क पर हुई। वहां मौजूद लोगों के सामने वर्दीधारी पुलिसकर्मी के साथ इस तरह का व्यवहार न केवल पुलिस का अपमान है, बल्कि कानून के राज पर भी सीधा प्रहार है। वर्दी पर पड़ा यह “थप्पड़ का दाग” पूरे सिस्टम की साख पर सवाल बनकर उभरा है।

घटना के तुरंत बाद मौके पर मौजूद अन्य पुलिसकर्मियों ने युवक को घेर लिया और उसे चौक थाने ले जाया गया। यहां तक तो लगा कि कानून अपना काम करेगा, लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे मामले को और अधिक विवादास्पद बना दिया। थाने पर भाजपा नेताओं और समर्थकों का जमावड़ा लग गया। राजनीतिक दबाव, आरोप-प्रत्यारोप और हंगामे का दौर शुरू हो गया। धीरे-धीरे यह मामला कानून से ज्यादा रसूख और प्रभाव का रूप लेने लगा।

यह सवाल उठना लाज़मी है कि यदि यही हरकत कोई आम नागरिक करता, तो क्या तस्वीर यही होती? क्या तब भी थाने पर राजनीतिक भीड़ जुटती? क्या तब भी “मैं किसका बेटा हूं” जैसी दलीलें असर दिखातीं? यही वह बिंदु है जहां कानून और रसूख आमने-सामने खड़े नजर आते हैं।

पुलिस व्यवस्था का मूल उद्देश्य आम नागरिक को सुरक्षा देना और कानून का निष्पक्ष पालन कराना है। लेकिन जब पुलिसकर्मी ही सार्वजनिक रूप से अपमानित होने लगें और उसके बाद भी मामला प्रभाव और पहचान के इर्द-गिर्द घूमने लगे, तो आम जनता का भरोसा डगमगाना स्वाभाविक है। लोग यह सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि क्या कानून सबके लिए बराबर है, या फिर कुछ लोगों के लिए नियम अलग हैं?

इस पूरे घटनाक्रम ने पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। वाराणसी जैसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील शहर में, जहां वीआईपी मूवमेंट, पर्यटन और धार्मिक आयोजन लगातार होते रहते हैं, वहां पुलिस का मनोबल मजबूत होना बेहद जरूरी है। लेकिन जब एक दरोगा को सरेराह थप्पड़ मारा जाए और बाद में राजनीतिक दबाव का माहौल बने, तो यह मनोबल पर सीधा असर डालता है।

Slap incident : वाराणसी में कानून बनाम रसूख की टकराहट, थप्पड़ कांड ने पुलिस व्यवस्था उठाए सवाल
Slap incident : वाराणसी में कानून बनाम रसूख की टकराहट, थप्पड़ कांड ने पुलिस व्यवस्था उठाए सवाल

सोशल मीडिया और जनचर्चाओं में यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर इस घटना में “गिरी साख” किसकी है? दरोगा की, जो अपना कर्तव्य निभा रहा था? या फिर पुलिस कमिश्नर और पूरे प्रशासन की, जो अपने अधीनस्थ की गरिमा और सम्मान की रक्षा करने में कितना सक्षम है? यह बहस इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि पुलिस की साख केवल वर्दी से नहीं, बल्कि निष्पक्ष कार्रवाई से बनती है।

कुछ लोग इसे “नुक्कड़ नाटक” जैसा माहौल बता रहे हैं, जहां पुलिस व्यवस्था के नाम पर सरकारी तंत्र खुद तमाशा बनता नजर आया। थाने को न्याय और कानून का केंद्र होना चाहिए, न कि राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का मंच। लेकिन इस घटना के बाद जो तस्वीर सामने आई, उसने व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर कर दिया।

वाराणसी जैसे धार्मिक और सांस्कृतिक शहर में ऐसी घटनाएं केवल कानून व्यवस्था का मुद्दा नहीं रहतीं, बल्कि सामाजिक संदेश भी देती हैं। जब रसूख के आगे नियम कमजोर पड़ते दिखें, तो समाज में गलत उदाहरण स्थापित होता है। युवा वर्ग यह सीखता है कि पहचान और प्रभाव के दम पर कुछ भी किया जा सकता है, चाहे सामने कानून क्यों न खड़ा हो।

हालांकि यह भी जरूरी है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और दोषी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए, चाहे उसकी राजनीतिक पहचान कुछ भी हो। अगर कानून को अपनी विश्वसनीयता बनाए रखनी है, तो उसे बिना भेदभाव के लागू करना होगा। पुलिस प्रशासन को भी यह संदेश देना होगा कि वर्दी का सम्मान सर्वोपरि है और ड्यूटी पर तैनात किसी भी अधिकारी के साथ दुर्व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

इस घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम सच में “कानून के राज” की ओर बढ़ रहे हैं या फिर रसूख और प्रभाव अब भी व्यवस्था पर भारी हैं। बाबा विश्वनाथ की नगरी में जहां हर गली “हर हर महादेव” के उद्घोष से गूंजती है, वहीं अगर कानून की साख गिरती दिखे, तो यह चिंता का विषय है।

अंत में यही कहा जा सकता है कि यह मामला सिर्फ एक थप्पड़ तक सीमित नहीं है। यह पूरे सिस्टम के आत्ममंथन का समय है। पुलिस, प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व—सभी को यह तय करना होगा कि प्राथमिकता कानून की होगी या रसूख की। क्योंकि अगर आज जवाबदेही तय नहीं हुई, तो कल वर्दी पर लगे ऐसे दाग और गहरे हो सकते हैं। बाकी सब, हर हर महादेव।

News Editor- (Jyoti Parjapati)

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