America caught in the middle : संरक्षणवाद का नया अध्याय: वैश्विक व्यापार और न्यायपालिका के बीच फंसा अमेरिका

वैश्विक अर्थव्यवस्था के वर्तमान पटल पर वाशिंगटन से उठी हालिया लहरों ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों की स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) जेमिसन ग्रिएर द्वारा ‘सेक्शन 301’ के तहत भारत, चीन, जापान और यूरोपीय संघ जैसे प्रमुख सहयोगियों के विरुद्ध शुरू की गई जांच महज एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का एक सोची-समझी कूटनीतिक बिसात है।
न्यायपालिका बनाम कार्यपालिका: शक्ति का संघर्ष
इस संपूर्ण प्रकरण का सबसे रोचक और विवादित पहलू अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का वह हालिया निर्णय है, जिसने पिछले वर्ष लगाए गए टैरिफ को ‘गैरकानूनी’ करार दिया। राष्ट्रपति ट्रंप का न्यायाधीशों के प्रति तीखा रुख और उनके फैसलों को ‘मूर्खतापूर्ण’ बताना यह दर्शाता है कि अमेरिकी प्रशासन वर्तमान में एक आंतरिक संवैधानिक खिंचाव से गुजर रहा है। जब घरेलू अदालतें व्यापारिक बाधाओं को रद्द करती हैं, तो प्रशासन ‘सेक्शन 301’ जैसे पुराने हथियारों का उपयोग कर अपने टैरिफ को एक ‘कानूनी सुरक्षा कवच’ देने का प्रयास करता है। यह जांच वास्तव में उन शुल्कों को तर्कसंगत ठहराने की एक कवायद है, जिन्हें अदालत ने खारिज कर दिया था।
भारत और चीन: एक ही तराजू के दो पलड़े?
अमेरिका की इस सूची में भारत और चीन का साथ होना नई दिल्ली के लिए एक कूटनीतिक चुनौती है। जहां एक ओर अमेरिका भारत को ‘प्रमुख रक्षा साझेदार’ के रूप में देखता है, वहीं व्यापारिक मोर्चे पर वह उसे उसी ‘अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस’ की श्रेणी में खड़ा कर रहा है जिसमें चीन है। यह विरोधाभास दर्शाता है कि ट्रंप प्रशासन के लिए भू-राजनीतिक मित्रता और आर्थिक लाभ दो अलग-अलग ध्रुव हैं। जुलाई की समयसीमा (डेडलाइन) यह संकेत देती है कि अमेरिका गर्मियों तक वैश्विक व्यापार जगत में एक बड़ा ‘टैरिफ शॉक’ देने की तैयारी में है।

चीन के साथ वार्ता: दबाव की कूटनीति
पेरिस में होने वाली आगामी बैठक और उसके बाद बीजिंग में संभावित ट्रंप-जिनपिंग शिखर सम्मेलन के ठीक पहले इस जांच का ऐलान करना ‘दबाव की कूटनीति’ (Pressure Tactics) का हिस्सा है। वार्ता की मेज पर बैठने से पहले अमेरिका अपने प्रतिद्वंद्वियों को यह स्पष्ट कर देना चाहता है कि उसके पास आर्थिक दंड देने की न केवल इच्छाशक्ति है, बल्कि वह इसके लिए कानूनी आधार भी तैयार कर रहा है।
अनिश्चितता का नया दौर
कनाडा को इस जांच से बाहर रखना यह बताता है कि अमेरिका अपने पड़ोसियों के प्रति चयनात्मक (Selective) रुख अपना रहा है, जबकि बाकी दुनिया के लिए वह संरक्षणवाद की दीवारें ऊंची कर रहा है। यदि 10% से 15% तक टैरिफ बढ़ाया जाता है, तो यह न केवल द्विपक्षीय व्यापार को प्रभावित करेगा, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) को भी छिन्न-भिन्न कर सकता है। “जब कूटनीति के तराजू में ‘कानून’ से भारी ‘टैरिफ’ हो जाए, तो मुक्त व्यापार केवल एक किताबी शब्द बनकर रह जाता है।”
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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