Dropped upon meeting : लोकसभा में महिला आरक्षण एवं परिसीमन विधेयक 2026 दो-तिहाई बहुमत न मिलने से गिरा

17 अप्रैल 2026 को भारत की संसद लोकसभा में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन विधेयक पर चर्चा और मतदान हुआ, जिसका नाम था “महिला आरक्षण एवं परिसीमन विधेयक 2026” (संविधान 131वां संशोधन विधेयक, 2026)। यह विधेयक देश की राजनीति में एक बड़े बदलाव का प्रस्ताव लेकर आया था, लेकिन आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल न कर पाने के कारण यह सदन में पारित नहीं हो सका।
इस विधेयक का उद्देश्य महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में अधिक प्रतिनिधित्व देना और साथ ही परिसीमन प्रक्रिया के माध्यम से राजनीतिक संरचना में बदलाव करना था। लेकिन इस प्रस्ताव को लेकर सदन में गहरी राजनीतिक असहमति देखने को मिली, जिसके चलते यह गिर गया।
लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 543 है, और इस महत्वपूर्ण मतदान में 528 सांसद उपस्थित रहे। मतदान के दौरान 298 सांसदों ने विधेयक के पक्ष में वोट दिया, जबकि 230 सांसदों ने इसके खिलाफ मतदान किया। संवैधानिक संशोधन विधेयक होने के कारण इसे पास कराने के लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई बहुमत आवश्यक था, जो लगभग 352 से 360 वोटों के बीच होता है। लेकिन सरकार को यह आवश्यक समर्थन प्राप्त नहीं हो सका।
इस तरह यह विधेयक लगभग 65 से अधिक मतों के अंतर से गिर गया। राजनीतिक इतिहास के दृष्टिकोण से यह एक महत्वपूर्ण घटना मानी जा रही है, क्योंकि यह पिछले कई वर्षों में पहली बार हुआ जब किसी संवैधानिक संशोधन बिल को सरकार संसद में पारित नहीं करा सकी।
विधेयक गिरने के बाद राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। विपक्षी दलों ने दावा किया कि वे महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि उन्होंने परिसीमन के साथ इसे जोड़ने का विरोध किया। उनका कहना था कि परिसीमन प्रक्रिया से देश के कुछ क्षेत्रों, विशेषकर दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर राज्यों का प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है।
विपक्ष का तर्क था कि यदि परिसीमन जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को अधिक सीटें मिलेंगी, जबकि कम जनसंख्या वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व घट सकता है। इससे संघीय संतुलन पर असर पड़ने की आशंका जताई गई।
दूसरी ओर, सरकार का पक्ष था कि महिला आरक्षण विधेयक का उद्देश्य महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाना है और परिसीमन के साथ इसे जोड़ने से प्रतिनिधित्व प्रणाली को अधिक संतुलित और आधुनिक बनाया जा सकता है।

इस पूरे विवाद के बीच राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विधेयक केवल महिला सशक्तिकरण का मुद्दा नहीं था, बल्कि इसमें देश की संघीय संरचना और क्षेत्रीय संतुलन जैसे संवेदनशील मुद्दे भी जुड़े हुए थे। यही कारण रहा कि इस पर सहमति बनाना कठिन हो गया।
मतदान प्रक्रिया के दौरान सदन में भारी बहस देखने को मिली। कई सांसदों ने इसे ऐतिहासिक अवसर बताया, जबकि कुछ ने इसे जल्दबाजी में उठाया गया कदम करार दिया। चर्चा के दौरान महिला प्रतिनिधित्व, लोकतांत्रिक संतुलन और राज्यों के अधिकारों जैसे मुद्दे प्रमुख रूप से उठाए गए।
इस विधेयक के गिरने के बाद इसके साथ जुड़े अन्य संबंधित विधेयक भी आगे नहीं बढ़ाए जा सके। इससे यह स्पष्ट हो गया कि सरकार को अभी इस मुद्दे पर व्यापक राजनीतिक सहमति बनाने की आवश्यकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि महिला आरक्षण का मुद्दा भारत की राजनीति में लंबे समय से चर्चा में रहा है। इससे पहले भी कई बार इस तरह के प्रयास किए गए हैं, लेकिन विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक कारणों से इसे पूरी तरह लागू नहीं किया जा सका।
परिसीमन का मुद्दा भी उतना ही संवेदनशील है, क्योंकि यह सीधे तौर पर लोकसभा और विधानसभा सीटों के पुनर्वितरण से जुड़ा हुआ है। इस प्रक्रिया का प्रभाव देश के राजनीतिक संतुलन पर गहरा पड़ सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी कहना है कि इस विधेयक के गिरने से आगामी चुनावी राजनीति पर भी असर पड़ सकता है। विभिन्न दल अब इसे अपने-अपने दृष्टिकोण से जनता के बीच ले जाने का प्रयास करेंगे।
सत्तारूढ़ दल ने जहां इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया, वहीं विपक्ष ने इसे राजनीतिक असंतुलन पैदा करने वाला प्रस्ताव करार दिया। इस मतभेद ने सदन में स्पष्ट रूप से दो अलग-अलग दृष्टिकोणों को उजागर किया।
इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि महिला प्रतिनिधित्व का मुद्दा आज भी भारतीय राजनीति में पूरी तरह से हल नहीं हो पाया है। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी अभी भी अपेक्षाकृत कम है, जिसे बढ़ाने की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि 17 अप्रैल 2026 का दिन भारतीय संसदीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में दर्ज हो गया है। महिला आरक्षण एवं परिसीमन विधेयक का गिरना यह दर्शाता है कि संवैधानिक संशोधनों के लिए केवल राजनीतिक इच्छा ही नहीं, बल्कि व्यापक सहमति और संतुलन भी आवश्यक होता है।
भविष्य में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या सरकार और विपक्ष मिलकर इस मुद्दे पर कोई नया समाधान निकाल पाते हैं या यह विवाद आगे भी राजनीतिक बहस का विषय बना रहेगा।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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