The Decline Continued : जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के केस न छोड़ने पर मनोज झा का तंज, कहा- संवैधानिक नैतिकता का हो रहा पतन ?

The Decline Continued : जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के केस न छोड़ने पर मनोज झा का तंज, कहा- संवैधानिक नैतिकता का हो रहा पतन

The Decline Continued : जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के केस न छोड़ने पर मनोज झा का तंज, कहा- संवैधानिक नैतिकता का हो रहा पतन
The Decline Continued : जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के केस न छोड़ने पर मनोज झा का तंज, कहा- संवैधानिक नैतिकता का हो रहा पतन

नई दिल्ली ।

दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा आबकारी नीति मामले में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के खुद को अलग करने की मांग वाली याचिका खारिज किए जाने के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज हो गई हैं। अदालत के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए आरजेडी सांसद मनोज झा ने न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठाए। सांसद मनोज झा ने समाचार एजेंसी आईएएनएस से बात करते हुए कहा, “मैंने सब कुछ लाइव देखा। एक चीज होती है जिसे संवैधानिक नैतिकता कहते हैं। मेरा मानना ​​है कि खुद को अलग करने के लिए पर्याप्त कारण थे। अगर आप उन कारणों को नजरअंदाज करते हैं, तो यह न्यायिक ढांचे के लिए भी एक अच्छा संकेत नहीं है।” उन्होंने कहा कि हम क्या कह सकते हैं, लेकिन जिन लोगों ने हमारा संविधान बनाया, उनके लिए ‘संवैधानिक नैतिकता’ एक अहम पहलू है। हाल के दिनों में हम साफ तौर पर इसका पतन देख रहे हैं। मैं इस घटना को उसी क्रम का एक हिस्सा मानता हूं।
पश्चिम बंगाल में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के एक बयान पर भी मनोज झा ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि योगी आदित्यनाथ ने ममता बनर्जी पर आरोप लगाया था कि वे इफ्तार पार्टियों का आयोजन करती हैं, लेकिन “जय श्री राम” के नारे लगाने पर रोक लगाती हैं। इस सब झूठ और भ्रम फैलाने की भी एक सीमा होती है। इतिहास की गलत व्याख्या और व्हाट्सऐप फॉरवर्ड पर निर्भरता ऐसी ही समस्याओं को जन्म देती है।

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मनोज झा ने स्वामी विवेकानंद के संदर्भ में दिए गए

एक कथन पर भी सवाल उठाया और कहा कि एक छोटे बच्चे को भी सही ऐतिहासिक तथ्य पता होते हैं। उन्होंने सांस्कृतिक समझ की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि राजनीतिक बयानबाजी में तथ्यों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।
संस्कृत भाषा को लेकर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की टिप्पणी पर आरजेडी सांसद मनोज झा ने कहा, “मैं पूछना चाहता हूँ कि क्या उन्होंने यह बात संस्कृत में कही या नहीं? अगर उन्होंने यह बात संस्कृत में नहीं कही, तो यह सब मह दिखावा और प्रतीकात्मकता है। किसी भी भाषा का प्रचार-प्रसार इस बात पर निर्भर करता है कि लोग उसे कितना अपनाते हैं और वह कितनी आसानी से स्वीकार की जाती है। भाषाएं और शब्द किसी सरकार की मदद से नहीं बढ़ते।”

News Editor- (Jyoti Parjapati)

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