Push and shove : दमोह प्रेस वार्ता में हंगामा, पत्रकार से कथित धक्का-मुक्की पर मचा विवाद

मध्य प्रदेश के Damoh जिले में आयोजित एक सरकारी प्रेस वार्ता के दौरान उस समय बड़ा विवाद खड़ा हो गया जब प्रभारी मंत्री Inder Singh Parmar से सवाल पूछने पर पत्रकार और मंत्री के बीच तीखी बहस हो गई। इस घटना के बाद पत्रकार समुदाय में भारी आक्रोश फैल गया है और मामले ने प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर गंभीर रूप ले लिया है।
यह घटना सर्किट हाउस दमोह में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान सामने आई, जहां जिले के कई वरिष्ठ जनप्रतिनिधि, विधायक, सांसद और प्रशासनिक अधिकारी मौजूद थे। कार्यक्रम का उद्देश्य सरकार की योजनाओं और विकास कार्यों की जानकारी मीडिया के माध्यम से जनता तक पहुंचाना था। लेकिन सवाल-जवाब के दौरान माहौल अचानक तनावपूर्ण हो गया।
जानकारी के अनुसार पत्रकार अरुण मिश्रा ने प्रधानमंत्री द्वारा ईंधन बचत को लेकर दिए गए संदेश के संदर्भ में प्रभारी मंत्री से सवाल पूछा। पत्रकार ने मंत्री के काफिले में शामिल वाहनों की अधिक संख्या को लेकर प्रश्न उठाया। इसी सवाल पर मंत्री की प्रतिक्रिया तीखी बताई जा रही है और आरोप है कि वे नाराज हो गए तथा पत्रकार के साथ धक्का-मुक्की जैसी स्थिति उत्पन्न हुई।
इस घटना के बाद मौके पर मौजूद अन्य पत्रकारों में भी नाराजगी फैल गई। पत्रकारों का कहना है कि प्रेस वार्ता का उद्देश्य ही जनहित से जुड़े सवालों का जवाब देना होता है, लेकिन यदि सवाल पूछने पर पत्रकारों के साथ अभद्र व्यवहार किया जाएगा तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
घटना के बाद पत्रकार अरुण मिश्रा ने आरोप लगाया कि उन्होंने केवल एक जनहित से जुड़ा प्रश्न पूछा था, लेकिन इसके जवाब में उन्हें अपमानजनक व्यवहार का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि इस तरह की घटनाएं मीडिया की स्वतंत्रता और निष्पक्ष पत्रकारिता पर सवाल खड़े करती हैं।
प्रेस वार्ता के दौरान पत्रकारों ने कर्मचारियों के वेतन भुगतान में देरी का मुद्दा भी उठाया। इस पर प्रभारी मंत्री इंदर सिंह परमार ने कहा कि कर्मचारियों के वेतन में केवल चार से पांच दिन की देरी हो सकती है। हालांकि पत्रकारों ने इस बयान पर सवाल उठाते हुए कहा कि पंचायत, स्वास्थ्य, नगरीय निकाय सहित कई विभागों में कर्मचारियों को महीनों से वेतन नहीं मिला है।

पत्रकारों का कहना है कि जमीनी हकीकत और सरकारी दावों में बड़ा अंतर है, जिसे उजागर करना उनका कर्तव्य है। उन्होंने आरोप लगाया कि सवालों से बचने की बजाय यदि पत्रकारों पर दबाव बनाया जाएगा तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सही संकेत नहीं है।
घटना के बाद जिले के पत्रकार संगठनों में भारी आक्रोश देखा गया। कई पत्रकारों ने कहा कि यदि भविष्य में इस तरह की घटनाएं दोहराई गईं तो वे सरकारी प्रेस वार्ताओं का बहिष्कार करने पर विचार करेंगे। उन्होंने इसे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का अपमान बताया।
पत्रकार संगठनों ने प्रदेश के मुख्यमंत्री Mohan Yadav से मामले में हस्तक्षेप की मांग करते हुए निष्पक्ष जांच की अपील की है। उनका कहना है कि यदि इस घटना पर कार्रवाई नहीं हुई तो मीडिया की स्वतंत्रता प्रभावित होगी और गलत संदेश जाएगा।
स्थानीय स्तर पर भी इस घटना को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। लोगों का कहना है कि प्रेस वार्ता संवाद का माध्यम होती है, न कि टकराव का। यदि जनप्रतिनिधि सवालों से नाराज होने लगें तो लोकतंत्र की मूल भावना कमजोर होती है।
कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जनप्रतिनिधियों को आलोचनात्मक सवालों का सामना शांति और धैर्य से करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जनता की ओर से पूछे गए सवालों का जवाब देना उनकी जिम्मेदारी है।
वहीं प्रशासनिक स्तर पर अभी तक इस मामले में कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। न ही किसी तरह की जांच की पुष्टि की गई है। हालांकि पत्रकार संगठनों के बढ़ते दबाव के कारण यह मामला आगे और तूल पकड़ सकता है।
घटना के बाद पत्रकार समुदाय में असंतोष और आक्रोश बना हुआ है। कई पत्रकारों का कहना है कि वे केवल जनता की समस्याओं को उजागर करते हैं और यदि उन्हें ही दबाने की कोशिश की जाएगी तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।
फिलहाल पूरे मामले को लेकर स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है और अब सभी की नजरें शासन और प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं कि वह इस विवाद को कैसे संभालता है और पत्रकारों के आरोपों पर क्या कदम उठाता है।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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