Appeal Intensifies : तालाब संरक्षण और हरित क्षेत्र निर्माण की मांग को लेकर प्रशासन से कार्रवाई की अपील तेज

फतेहपुर जिले में पर्यावरण संरक्षण और जल संकट को लेकर सामाजिक संगठनों ने एक बार फिर आवाज बुलंद की है। पर्यावरण पहरूवा एवं बुंदेलखंड राष्ट्र समिति के केंद्रीय अध्यक्ष प्रवीण पांडेय ने जिलाधिकारी फतेहपुर को मांग पत्र सौंपकर जनपद के बचे हुए तालाबों को संरक्षित करने और उनके आसपास हरित क्षेत्र विकसित करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यदि अब भी तालाबों को बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में जल संकट और अधिक गंभीर रूप ले सकता है।
प्रवीण पांडेय ने अपने मांग पत्र में नगर पालिका फतेहपुर, बिंदकी और नगर पंचायत खागा, जहानाबाद, हाथगांव, बहुआ, असोथर, धाता, खखरेरू और किशनपुर समेत सभी ग्राम पंचायतों में स्थित तालाबों को संरक्षित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि तालाब केवल जल संग्रहण के साधन नहीं हैं, बल्कि ये पर्यावरण संतुलन बनाए रखने, भूजल स्तर सुधारने और स्थानीय पारिस्थितिकी को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने प्रशासन से राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तालाबों एवं जलाशयों के संरक्षण को लेकर जारी दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन कराने की मांग की। मांग पत्र में तालाबों के चारों ओर 10 मीटर क्षेत्र को ग्रीन जोन घोषित करने और वहां बड़े स्तर पर वृक्षारोपण कराने की अपील की गई। साथ ही लगाए जाने वाले पौधों की सुरक्षा के लिए मजबूत ट्री गार्ड लगाने की मांग भी उठाई गई ताकि पौधे सुरक्षित रह सकें और हरित क्षेत्र स्थायी रूप से विकसित हो सके।
प्रवीण पांडेय ने कहा कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण, अतिक्रमण और लापरवाही के कारण जिले के कई तालाब समाप्त हो चुके हैं। जो तालाब बचे हैं, वे भी गंदगी, प्लास्टिक कचरे और अवैध कब्जों की समस्या से जूझ रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते इन जल स्रोतों को नहीं बचाया गया तो भूजल स्तर तेजी से गिरता जाएगा और ग्रामीण तथा शहरी दोनों क्षेत्रों में पेयजल संकट गहरा सकता है।
उन्होंने प्रशासन से मांग की कि तालाबों के आसपास हो रहे अवैध निर्माणों और अतिक्रमणों को तत्काल हटाया जाए। साथ ही गंदे नालों और सीवर के पानी को तालाबों में जाने से रोका जाए ताकि जल स्रोत प्रदूषित न हों। उन्होंने वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देने और प्रत्येक तालाब की नियमित निगरानी के लिए प्रशासनिक व्यवस्था तैयार करने की भी मांग की।
प्रवीण पांडेय ने कहा कि तालाब भारतीय संस्कृति और परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। गांवों और कस्बों में सदियों से तालाब न केवल जल संरक्षण का माध्यम रहे बल्कि सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों के केंद्र भी रहे हैं। लेकिन आधुनिक विकास की दौड़ में इन प्राकृतिक धरोहरों की लगातार अनदेखी की गई है। उन्होंने कहा कि जल संकट से बचने के लिए पारंपरिक जल स्रोतों का संरक्षण बेहद जरूरी है।

उन्होंने जनसामान्य से भी तालाब बचाओ अभियान में सक्रिय भागीदारी की अपील की। उन्होंने कहा कि केवल प्रशासनिक प्रयासों से पर्यावरण संरक्षण संभव नहीं है, बल्कि समाज को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। लोगों को तालाबों में कचरा फेंकने से बचना चाहिए और वृक्षारोपण अभियानों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना चाहिए।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि तालाब भूजल रिचार्ज के सबसे प्रभावी माध्यमों में से एक हैं। बारिश का पानी तालाबों में जमा होकर धीरे-धीरे जमीन में समाता है, जिससे आसपास के क्षेत्रों में जल स्तर बना रहता है। यदि तालाब खत्म हो जाते हैं तो हैंडपंप, कुएं और ट्यूबवेल भी सूखने लगते हैं। यही कारण है कि आज कई क्षेत्रों में पानी की भारी समस्या देखने को मिल रही है।
प्रवीण पांडेय लंबे समय से जल, जंगल और जमीन से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं। उन्हें जल संरक्षण के क्षेत्र में किए गए कार्यों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित भी किया जा चुका है। उनकी पुस्तक जलनिधियों को जीने दो को जलशक्ति मंत्रालय के जल विज्ञान संस्थान द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम स्थान का सम्मान मिला था। यह पुस्तक जल स्रोतों के संरक्षण और पर्यावरणीय चुनौतियों पर आधारित है।
वह बुंदेलखंड राष्ट्र समिति के केंद्रीय अध्यक्ष के रूप में क्षेत्रीय जल संकट और पर्यावरणीय समस्याओं को लेकर लगातार अभियान चला रहे हैं। गंगा, यमुना और पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण के लिए उन्होंने कई पद यात्राएं और जनजागरण अभियान भी संचालित किए हैं। सामाजिक संगठनों का कहना है कि ऐसे प्रयासों से लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ रही है।
फतेहपुर सहित बुंदेलखंड क्षेत्र लंबे समय से जल संकट की समस्या से जूझ रहा है। गर्मियों में कई गांवों में पेयजल की भारी किल्लत हो जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि पुराने तालाबों और जल स्रोतों को पुनर्जीवित किया जाए तो काफी हद तक इस संकट को कम किया जा सकता है। इसी कारण पर्यावरण कार्यकर्ता लगातार तालाब संरक्षण की मांग उठा रहे हैं।
स्थानीय नागरिकों ने भी प्रशासन से तालाब संरक्षण के लिए ठोस कार्रवाई करने की मांग की है। लोगों का कहना है कि कई तालाबों की जमीन पर अवैध कब्जे हो चुके हैं और कुछ तालाब कूड़ा डालने की जगह बन गए हैं। यदि प्रशासन सख्त कदम उठाए तो इन जल स्रोतों को दोबारा जीवित किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि तालाबों के आसपास हरित क्षेत्र विकसित करने से पर्यावरण को कई लाभ होंगे। पेड़-पौधे न केवल वातावरण को शुद्ध करेंगे बल्कि मिट्टी कटाव रोकने, तापमान नियंत्रित रखने और जैव विविधता को सुरक्षित रखने में भी मदद करेंगे। ग्रीन जोन विकसित होने से स्थानीय लोगों को स्वच्छ वातावरण भी मिलेगा।
फिलहाल प्रवीण पांडेय द्वारा सौंपे गए मांग पत्र को लेकर प्रशासनिक स्तर पर चर्चा शुरू हो गई है। अब देखना यह होगा कि जिले के तालाबों को बचाने और उनके आसपास हरित क्षेत्र विकसित करने की दिशा में प्रशासन कितनी तेजी से कदम उठाता है। पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि यदि समय रहते प्रभावी कार्रवाई की गई तो आने वाली पीढ़ियों के लिए जल स्रोतों और पर्यावरण को सुरक्षित रखा जा सकेगा।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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