Raised a demand : हापुड़ के नान गांव में सरकारी भूमि पर कथित अवैध कब्जे के आरोप, ग्रामीणों ने जांच और कार्रवाई की मांग उठाई

हापुड़। जनपद हापुड़ के नान गांव में सरकारी भूमि पर कथित अवैध कब्जे का मामला सामने आया है। ग्रामीणों का आरोप है कि गांव के बीच स्थित एक पुरानी सरकारी जमीन, जहां कभी जलभराव के लिए प्राकृतिक जोहड़ (तालाबनुमा जल स्रोत) हुआ करता था, उस पर धीरे-धीरे मिट्टी डालकर कब्जा कर लिया गया है। ग्रामीणों ने प्रशासन से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई करने तथा सरकारी भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने की मांग की है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, गांव के मध्य स्थित यह जोहड़ कई वर्षों से अस्तित्व में था और इसका क्षेत्रफल लगभग ढाई से तीन बीघा बताया जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के मौसम में गांव का अतिरिक्त पानी इसी जोहड़ में एकत्र होता था, जिससे जल निकासी की व्यवस्था बनी रहती थी। उनका दावा है कि समय के साथ इस जोहड़ को मिट्टी और मलबा डालकर भरा गया और बाद में कथित रूप से उस पर प्लॉट बनाकर कब्जा कर लिया गया।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि पुराने राजस्व अभिलेखों और ग्राम समाज की भूमि से संबंधित दस्तावेजों की जांच कराई जाए तो वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है। उनका आरोप है कि जिस भूमि का उपयोग पहले सार्वजनिक हित और जल संरक्षण के लिए होता था, वह अब निजी उपयोग में लाई जा रही है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है।
कुछ ग्रामीणों ने बताया कि जोहड़ गांव की जल निकासी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा था। उनके अनुसार, इसके भर जाने से वर्षा के दौरान जलभराव की समस्या बढ़ सकती है और आसपास के क्षेत्रों में पानी निकासी प्रभावित हो सकती है। उनका कहना है कि गांव में प्राकृतिक जल स्रोतों का संरक्षण भविष्य की आवश्यकता है और यदि ऐसे जलाशयों पर कब्जा होता है तो पर्यावरणीय संतुलन भी प्रभावित हो सकता है।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में धीरे-धीरे जोहड़ की भूमि पर मिट्टी डाली गई। इसके बाद कथित रूप से भूमि को समतल कर छोटे-छोटे प्लॉट के रूप में विकसित किया गया। ग्रामीणों का आरोप है कि यह प्रक्रिया लंबे समय तक चलती रही, लेकिन समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी।
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले में राजस्व विभाग द्वारा भूमि का सीमांकन कराया जाए। यदि जांच में यह भूमि सरकारी या ग्राम समाज की पाई जाती है और उस पर अवैध कब्जा सिद्ध होता है, तो नियमानुसार अतिक्रमण हटाकर भूमि को उसके मूल स्वरूप में बहाल किया जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि गांवों में जोहड़, तालाब और अन्य पारंपरिक जल स्रोत केवल जल संचयन के साधन नहीं होते, बल्कि भूजल स्तर बनाए रखने और वर्षा जल के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे जल स्रोतों का संरक्षण पर्यावरण और कृषि दोनों के लिए आवश्यक माना जाता है।

उत्तर प्रदेश सरकार समय-समय पर सरकारी भूमि, तालाबों और ग्राम समाज की संपत्तियों को अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए अभियान चलाती रही है। ऐसे मामलों में राजस्व अभिलेख, खतौनी, नक्शा और अन्य सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर जांच की जाती है। यदि किसी सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा पाया जाता है, तो संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई की जाती है।
ग्रामीणों ने मांग की है कि नान गांव के इस मामले में भी निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो सरकारी भूमि को कब्जामुक्त कराकर सार्वजनिक उपयोग के लिए सुरक्षित किया जाए। उनका कहना है कि गांव की सार्वजनिक संपत्तियां पूरे समाज की धरोहर हैं और उनका संरक्षण सभी की जिम्मेदारी है।
फिलहाल संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि संबंधित भूमि का वर्तमान राजस्व रिकॉर्ड क्या दर्शाता है और क्या इस संबंध में किसी विभागीय जांच की प्रक्रिया शुरू की गई है।
ग्रामीणों को उम्मीद है कि प्रशासन मामले का संज्ञान लेकर राजस्व विभाग से मौके का निरीक्षण कराएगा, अभिलेखों का सत्यापन करेगा और तथ्यों के आधार पर उचित निर्णय लेगा। यदि भूमि सरकारी पाई जाती है तो उसे अतिक्रमण मुक्त कराकर उसके मूल स्वरूप में विकसित करने की दिशा में आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं।
यह मामला प्रशासनिक जांच का विषय है। जांच पूरी होने और संबंधित विभागों की आधिकारिक रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि भूमि की वास्तविक स्थिति क्या है तथा कथित अतिक्रमण के आरोप कितने सही हैं। ग्रामीणों ने निष्पक्ष जांच, पारदर्शी कार्रवाई और सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग दोहराई है।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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