
नई दिल्ली।
पश्चिम बंगाल में जनवरी से जून 2026 के बीच 18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों की अस्पतालों में हुई करीब 60 हजार डिलीवरी के आंकड़ों ने बाल विवाह, नाबालिग गर्भावस्था और बाल सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चिंता बढ़ा दी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार राज्य के विभिन्न जिलों में बड़ी संख्या में ऐसी डिलीवरी दर्ज की गई हैं, जिनमें प्रसव के समय लड़कियों की उम्र 18 वर्ष से कम बताई गई। हालांकि इन आंकड़ों का सही संदर्भ समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि इनमें केवल अस्पतालों में दर्ज प्रसव शामिल हैं और इनसे अपने आप यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सभी मामले बाल विवाह से जुड़े थे।
बताए गए आंकड़ों के मुताबिक छह महीने की अवधि में राज्य में करीब 60 हजार अंडरएज डिलीवरी दर्ज की गईं। यह संख्या जनवरी से जून 2026 के बीच अस्पतालों में दर्ज मामलों से संबंधित बताई जा रही है। आंकड़ों ने इसलिए भी ध्यान आकर्षित किया है क्योंकि 18 वर्ष से कम उम्र में गर्भावस्था कई सामाजिक, स्वास्थ्य और बाल संरक्षण से जुड़े सवाल खड़े करती है।
जिलेवार आंकड़ों में मुर्शिदाबाद सबसे ऊपर बताया गया है। यहां छह महीने की अवधि में 12,847 ऐसी डिलीवरी दर्ज होने की जानकारी सामने आई है, जिनमें लड़कियों की उम्र 18 वर्ष से कम बताई गई। इसके बाद दक्षिण 24 परगना में 4,178 और पूर्व बर्धमान में 3,777 मामले दर्ज होने की बात कही गई है। मालदा, पश्चिम मेदिनीपुर और कुछ अन्य जिले भी ऐसे मामलों की संख्या के लिहाज से चर्चा में हैं।
मुर्शिदाबाद के आंकड़े विशेष रूप से चर्चा का विषय बने हुए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार जिले में दर्ज 12,847 मामलों ने राज्य के कुल आंकड़े में बड़ा हिस्सा बनाया है। हालांकि किसी जिले में मामलों की संख्या अधिक होने के कई कारण हो सकते हैं। इनमें आबादी का आकार, स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच, अस्पतालों में प्रसव की दर और सरकारी रिकॉर्डिंग की व्यवस्था जैसे पहलू शामिल हो सकते हैं। इसलिए केवल संख्या के आधार पर जिलों के बीच सीधी तुलना करना उचित नहीं होगा।
सबसे कम उम्र से जुड़े मामलों ने भी चिंता बढ़ाई है। उपलब्ध जिला आंकड़ों के अनुसार मुर्शिदाबाद में 15 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के 253 मामले दर्ज बताए गए हैं। इसके अलावा रामपुरहाट में 86, मालदा में 81, पूर्व बर्धमान में 77 और उत्तर दिनाजपुर में 75 मामले सामने आने की जानकारी दी गई है। पश्चिम मेदिनीपुर में 63 और दक्षिण 24 परगना में 59 मामले दर्ज बताए गए हैं।
15 वर्ष से कम उम्र में गर्भावस्था का मामला बाल संरक्षण और स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से विशेष ध्यान मांगता है। ऐसे मामलों में संबंधित लड़की की उम्र, पारिवारिक परिस्थितियों, विवाह की स्थिति और उसकी सुरक्षा से जुड़े पहलुओं की जांच आवश्यक होती है। साथ ही यह भी पता लगाना जरूरी होता है कि मामला बाल विवाह से जुड़ा है या किसी अन्य परिस्थिति से।
बाल विवाह और नाबालिग गर्भावस्था को केवल स्वास्थ्य से जुड़े विषय के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसका संबंध बच्चों की शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य, सुरक्षा और भविष्य से भी है। कम उम्र में विवाह या गर्भावस्था के कारण कई लड़कियों की पढ़ाई प्रभावित हो सकती है और उन्हें सामाजिक तथा आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
बताई गई जानकारी के अनुसार पश्चिम बंगाल सरकार ने ऐसे मामलों की पहचान और जांच को लेकर कदम उठाने की बात कही है। घर-घर जाकर संदिग्ध मामलों की जानकारी जुटाने और स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड की जांच करने की योजना का उल्लेख किया गया है। इसके माध्यम से यह पता लगाने का प्रयास किया जा सकता है कि कम उम्र में प्रसव के पीछे परिस्थितियां क्या थीं और संबंधित लड़की की उम्र की पुष्टि किस तरह होती है।
सरकार की ओर से नाबालिग लड़कियों के पति को नोटिस जारी कर उम्र से जुड़े दस्तावेज मांगने की बात भी सामने आई है। यदि जांच के दौरान किसी मामले में बाल विवाह की पुष्टि होती है तो संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। हालांकि प्रत्येक मामले में वास्तविक परिस्थितियों की जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही कानूनी स्थिति स्पष्ट होगी।
बाल विवाह के मामलों में बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 महत्वपूर्ण कानून है। इसके अलावा नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराध से जुड़े मामलों में पॉक्सो कानून के प्रावधान लागू हो सकते हैं। किसी मामले में कौन-सा कानून लागू होगा, यह घटना की वास्तविक परिस्थितियों और जांच में सामने आए तथ्यों पर निर्भर करता है।
पश्चिम बंगाल में बाल विवाह को लेकर पहले भी आंकड़े सामने आते रहे हैं। राज्य सरकार के दस्तावेज में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 यानी एनएफएचएस-5 के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि 20 से 24 वर्ष की उम्र की 41.6 प्रतिशत महिलाओं की शादी 18 वर्ष की उम्र से पहले हुई थी। यह आंकड़ा पुराने सर्वेक्षण की अवधि से संबंधित है और इसे 2026 के अस्पताल रिकॉर्ड के साथ सीधे समान नहीं माना जा सकता।

वर्तमान में सामने आए करीब 60 हजार मामलों को समझने के लिए स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड की प्रकृति को देखना भी जरूरी है। यदि आंकड़े केवल अस्पतालों में दर्ज डिलीवरी के हैं तो घर पर हुए प्रसव इसमें शामिल नहीं हो सकते। ऐसे में अस्पताल रिकॉर्ड को राज्य में होने वाली सभी नाबालिग डिलीवरी का पूर्ण आंकड़ा मानना उचित नहीं होगा।
इसी तरह यह भी जरूरी है कि कुल संख्या के साथ संबंधित आयु वर्ग की कुल आबादी, अस्पताल में प्रसव का अनुपात और जिलेवार स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता को देखा जाए। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि अलग-अलग जिलों में मामलों की संख्या में इतना अंतर क्यों है।
मुर्शिदाबाद के बाद दक्षिण 24 परगना और पूर्व बर्धमान के आंकड़े भी महत्वपूर्ण बताए जा रहे हैं। दक्षिण 24 परगना में 4,178 और पूर्व बर्धमान में 3,777 अंडरएज डिलीवरी दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। मालदा और पश्चिम मेदिनीपुर समेत अन्य जिलों में भी ऐसे मामलों की मौजूदगी बताई गई है। इससे स्पष्ट होता है कि मामला केवल एक जिले तक सीमित नहीं है।
इन आंकड़ों के सामने आने के बाद बाल विवाह की रोकथाम के लिए कानून के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता की जरूरत पर भी चर्चा बढ़ी है। परिवारों को बाल विवाह के कानूनी और सामाजिक प्रभावों की जानकारी देना, बच्चों की शिक्षा जारी रखना और जोखिम वाले मामलों की समय रहते पहचान करना महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
विशेषज्ञों के लिए भी इन आंकड़ों का विश्लेषण कई स्तरों पर जरूरी होगा। केवल अस्पतालों में दर्ज डिलीवरी की संख्या से बाल विवाह की वास्तविक स्थिति का पूरा आकलन नहीं किया जा सकता। इसके लिए विवाह की उम्र, गर्भधारण की उम्र, ग्रामीण-शहरी स्थिति, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और सामाजिक परिस्थितियों से जुड़े आंकड़ों को एक साथ देखना होगा।
सरकार के सामने अब चुनौती यह है कि उपलब्ध मामलों की वास्तविक परिस्थितियों की पहचान की जाए और जरूरतमंद नाबालिगों को स्वास्थ्य एवं बाल संरक्षण सेवाओं से जोड़ा जाए। जहां कानून का उल्लंघन सामने आए, वहां जांच के बाद नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है।
छह महीने में करीब 60 हजार अंडरएज डिलीवरी के बताए गए आंकड़ों ने पश्चिम बंगाल में बाल विवाह और नाबालिग गर्भावस्था के मुद्दे को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। मुर्शिदाबाद में 12,847, दक्षिण 24 परगना में 4,178 और पूर्व बर्धमान में 3,777 मामलों की जानकारी सामने आई है। हालांकि इन आंकड़ों की पूरी तस्वीर समझने के लिए आधिकारिक रिकॉर्ड, रिपोर्टिंग पद्धति और अन्य संबंधित आंकड़ों का विस्तृत अध्ययन आवश्यक होगा। फिलहाल ये आंकड़े बाल सुरक्षा, स्वास्थ्य और बाल विवाह की रोकथाम से जुड़े प्रयासों की समीक्षा की जरूरत की ओर संकेत करते हैं।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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